अस्मे वोऽअस्त्विन्द्रियमस्मे नृम्णमुत क्रतुरस्मे वर्चांसि सन्तु वः। नमो मात्रे पृथिव्यै नमो मात्रै पृथिव्याऽ इयन्ते राड् यन्तासि यमनो ध्रुवोसि धरुणः कृष्यै त्वा क्षेमाय त्वा रय्यै त्वा पोषाय त्वा॥
asme vo'stvindriyam asme nṛmṇam uta kratur asme varcāṃsi santu vaḥ । namo mātre pṛthivyai namo mātre pṛthivyā iyante rāḍ yantāsi yamano dhruvo'si dharuṇaḥ kṛṣyai tvā kṣemāya tvā rayyai tvā poṣāya tvā ॥
अस्मे वोऽअस्त्विन्द्रियमस्मे नृम्णमुत का अर्थ
जिस पृथ्वी से हमें धन और जीवन के लिए उपयोगी साधन प्राप्त होते हैं, उस माता पृथ्वी को हम प्रणाम करते हैं। आप स्थिर, सबको संयम में रखने वाली और धारण करने वाली हैं। हम कृषि-कार्य, समृद्धि तथा अपने पोषण के लिए आपकी शरण में आते हैं।
शब्दार्थ
- अस्मेasme
हमारे लिए
अस्मद्
- इन्द्रियम्indriyam
इन्द्रियबल
इन्द्र
- नृम्णम्nṛmṇam
पौरुष
नृ
- उतuta
और
- क्रतुःkratuḥ
संकल्प
क्रतु
- वर्चांसिvarcāṁsi
तेज
वर्चस्
- सन्तुsantu
हों
√अस्
- नमःnamaḥ
नमस्कार
√नम्
- मात्रे पृथिव्यैmātre pṛthivyai
माता पृथ्वी को
मातृ + पृथिवी
- ध्रुवः असिdhruvo'si
तुम स्थिर हो
√ध्रु + √अस्
- धरुणःdharuṇaḥ
धारण करने वाली
√धृ
- कृष्यै त्वाkṛṣyai tvā
कृषि के लिए तुम्हें
√कृष्
- क्षेमाय त्वाkṣemāya tvā
क्षेम के लिए तुम्हें
√क्षि
- रय्यै त्वाrayyai tvā
धन के लिए तुम्हें
रयि
- पोषाय त्वाpoṣāya tvā
पोषण के लिए तुम्हें
√पुष्
व्याख्या
यह वैदिक मंत्र माता पृथ्वी (पृथ्वी) के प्रति गहरी कृतज्ञता और समर्पण व्यक्त करता है। यह पृथ्वी को केवल एक भौतिक इकाई के रूप में नहीं, बल्कि एक दिव्य प्रदाता के रूप में स्वीकार करता है जो 'ध्रुव' (स्थिर) और 'धरण' (धारण करने वाली) है। यह प्रार्थना स्पष्ट रूप से हमारे आध्यात्मिक कल्याण को हमारी भौतिक आवश्यकताओं—विशेष रूप से 'कृषि', 'क्षेम' (कल्याण) और 'पोष' (पोषण) से जोड़ती है। यह प्राचीन भारतीय दृष्टिकोण को पुष्ट करता है कि हमारा अस्तित्व पृथ्वी के स्वास्थ्य और स्थिरता से अटूट रूप से जुड़ा हुआ है, और सच्ची समृद्धि उसके नियमों के साथ सामंजस्य बिठाकर जीने से आती है। मन्त्र का पूर्वार्ध सामर्थ्यों की याचना है—इन्द्रिय, नृम्ण, क्रतु, वर्चस् अर्थात् इन्द्रियबल, पौरुष, संकल्प और तेज—और तभी पृथ्वी को नमस्कार आरम्भ होता है। अन्तिम शृंखला द्वितीया में की गई समर्पण-पंक्तियाँ हैं, जहाँ 'त्वा' दोहराया गया है: कृषि के लिए, क्षेम के लिए, रयि के लिए, पोषण के लिए। प्रत्येक बताता है कि पृथ्वी के पास किस प्रयोजन से जाया जा रहा है—अतः श्लोक सामर्थ्य की याचना से, श्रद्धा होते हुए, उन विशिष्ट उपयोगों तक जाता है जिनके लिए वह सामर्थ्य अभीष्ट है।
मूल पोस्ट
यजुर्वेद से और सुभाषित
स्रोत पृष्ठ देखेंस्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः। स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु॥
svasti na indro vṛddhaśravāḥ svasti naḥ pūṣā viśvavedāḥ । svasti nas tārkṣyo ariṣṭanemiḥ svasti no bṛhaspatir dadhātu ॥
ऋग्वेद का यह स्वस्ति-मन्त्र इन्द्र, पूषा, तार्क्ष्य और बृहस्पति से हम सबके कल्याण की कामना करता है।
शं नो वातः पवतां शं नस्तपतु सूर्यः। शं नः कनिक्रदद् देवः पर्जन्योऽभिवर्षतु॥
śaṃ no vātaḥ pavatāṃ śaṃ nas tapatu sūryaḥ । śaṃ naḥ kanikradad devaḥ parjanyo 'bhivarṣatu ॥
शुक्ल यजुर्वेद का यह मन्त्र वायु, सूर्य और वर्षा के देवता पर्जन्य से कल्याणकारी होने की प्रार्थना करता है।
भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवा भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः। स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवांसस्तनूभिर्व्यशेम देवहितं यदायुः॥
bhadraṃ karṇebhiḥ śṛṇuyāma devā bhadraṃ paśyemākṣabhir yajatrāḥ । sthirair aṅgais tuṣṭuvāṃsas tanūbhir vyaśema devahitaṃ yad āyuḥ ॥
ऋग्वेद की यह प्रार्थना शुभ सुनने और देखने, स्थिर अंगों के साथ स्तुति करने तथा देवों द्वारा निर्धारित आयु को पूर्ण करने की कामना करती है।
प्रकृति पर और सुभाषित
विषय पृष्ठ देखेंदेव्या यया ततमिदं जगदात्मशक्त्या निश्शेषदेवगणशक्तिसमूहमूर्त्या। तामम्बिकामखिलदेवमहर्षिपूज्यां भक्त्या नताः स्म विदधातु शुभानि सा नः॥
devyā yayā tatamidaṃ jagadātmaśaktyā niśśeṣadevagaṇaśaktisamūhamūrtyā । tāmambikāmakhiladevamaharṣipūjyāṃ bhaktyā natāḥ sma vidadhātu śubhāni sā naḥ ॥
देवी महात्म्यम् की यह प्रार्थना जगत् में व्याप्त और समस्त देवशक्तियों की स्वरूप माँ अम्बिका को नमन करके सबके लिए मंगल माँगती है।
सुखोपविष्टास्ते तत्र पुण्यां चक्रुः कथामिमाम्। धर्मार्थकाममोक्षाणामारोग्यं मूलमुत्तमम्॥
sukhopaviṣṭās te tatra puṇyāṃ cakruḥ kathām imām । dharmārthakāmamokṣāṇām ārogyaṃ mūlam uttamam ॥
चरक संहिता आरोग्य को धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष इन चारों पुरुषार्थों की प्राप्ति का सर्वोत्तम आधार बताती है।
हिताहितं सुखं दुःखमायुस्तस्य हिताहितम्। मानं च तच्च यत्रोक्तमायुर्वेदः स उच्यते॥
hitāhitaṃ sukhaṃ duḥkham āyus tasya hitāhitam । mānaṃ ca tac ca yatroktam āyurvedaḥ sa ucyate ॥
चरक संहिता आयुर्वेद को हित-अहित, सुख-दुःख, जीवन के अनुकूल-प्रतिकूल तत्त्वों और आयु के मान का ज्ञान बताती है।