विद्या वितर्को विज्ञानं - सफलता के छह गुण

9 फ़र॰ 2026

विद्या वितर्को विज्ञानं स्मृतिस्तत्परता क्रिया। यस्यैते षड्गुणास्तस्य नासाध्यमतिवर्तते॥

vidyā vitarko vijñānaṃ smṛtis tatparatā kriyā । yasyaite ṣaḍguṇās tasya nāsādhyam ativartate ॥

प्रधानमंत्री का संदेश

अद्भुत प्रतिभा के धनी हमारे विद्यार्थियों में अपने सपनों को सच करने की पूरी क्षमता है। 'परीक्षा पे चर्चा' का उद्देश्य भी यही है कि कैसे वे अपनी प्रतिभा और कौशल का सार्थक इस्तेमाल कर सकते हैं।

विद्या वितर्को विज्ञानं स्मृतिस्तत्परता का अर्थ

विद्या, तर्कशक्ति, विज्ञान, स्मृति-शक्ति, तत्परता और कार्यशीलता, ये छह जिसके पास हैं, उसके लिए कुछ भी असाध्य नहीं।

शब्दार्थ

विद्याvidyā

विद्या

√विद्

वितर्कःvitarkaḥ

वितर्क

वि + √तर्क्

विज्ञानम्vijñānam

विज्ञान

वि + √ज्ञा

स्मृतिःsmṛtiḥ

स्मृति

√स्मृ

तत्परताtatparatā

तत्परता

तद् + पर

क्रियाkriyā

क्रिया

√कृ

यस्यyasya

जिसमें

यद्

एतेete

ये

एतद्

षड्गुणाःṣaḍguṇāḥ

छह गुण

षष् + गुण

न असाध्यम्nāsādhyam

कुछ भी असाध्य नहीं

अ + √साध्

अतिवर्ततेativartate

उससे परे रहता

अति + √वृत्

व्याख्या

चरक संहिता का यह श्लोक, जो मूल रूप से एक चिकित्सक के गुणों के संदर्भ में कहा गया था, उत्कृष्टता के लिए एक सार्वभौमिक मार्गदर्शिका के रूप में कार्य करता है। यह छह आवश्यक गुणों को सूचीबद्ध करता है: विद्या (ज्ञान), वितर्क (तर्कशक्ति/विश्लेषणात्मक शक्ति), विज्ञान (विशिष्ट ज्ञान), स्मृति, तत्परता और क्रिया (कार्यशीलता)। जब कोई व्यक्ति इन छह आंतरिक शक्तियों को विकसित कर लेता है, तो उसमें किसी भी बाधा को पार करने की क्षमता आ जाती है। यह इस बात पर जोर देता है कि सफलता भाग्य का खेल नहीं है, बल्कि बौद्धिक गहराई और दुनिया के साथ सक्रिय जुड़ाव का परिणाम है।

मूल पोस्ट

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चरक संहिता से और सुभाषित

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28 सित॰ 2026
चरक संहिता

सुखोपविष्टास्ते तत्र पुण्यां चक्रुः कथामिमाम्। धर्मार्थकाममोक्षाणामारोग्यं मूलमुत्तमम्॥

sukhopaviṣṭās te tatra puṇyāṃ cakruḥ kathām imām । dharmārthakāmamokṣāṇām ārogyaṃ mūlam uttamam ॥

चरक संहिता आरोग्य को धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष इन चारों पुरुषार्थों की प्राप्ति का सर्वोत्तम आधार बताती है।

स्वास्थ्यधर्मसमृद्धिआध्यात्मिकता
23 सित॰ 2026
चरक संहिता

हिताहितं सुखं दुःखमायुस्तस्य हिताहितम्। मानं च तच्च यत्रोक्तमायुर्वेदः स उच्यते॥

hitāhitaṃ sukhaṃ duḥkham āyus tasya hitāhitam । mānaṃ ca tac ca yatroktam āyurvedaḥ sa ucyate ॥

चरक संहिता आयुर्वेद को हित-अहित, सुख-दुःख, जीवन के अनुकूल-प्रतिकूल तत्त्वों और आयु के मान का ज्ञान बताती है।

स्वास्थ्यकल्याण

विद्या पर और सुभाषित

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7 अक्टू॰ 2026
महाभारत

नित्यं परिचरेच्चैव तद्वै सुकृतमुत्तमम्। कीर्तिं पुण्यं यशो लोकान् प्राप्स्यसे राजसत्तम॥

nityaṃ paricareccaiva tadvai sukṛtamuttamam । kīrtiṃ puṇyaṃ yaśo lokān prāpsyase rājasattama ॥

नित्य सेवा को श्रेष्ठ पुण्य कर्म बताया गया है, जिससे कीर्ति, यश और उत्तम लोकों की प्राप्ति होती है।

कर्तव्यकर्मसफलता
6 अक्टू॰ 2026
समराङ्गणसूत्रधार

ज्ञानवांश्च तथा वाग्मी कर्मस्वपि च निष्ठितः। एवं युक्तोऽपि न श्रेयान् यदि शीलविवर्जितः॥

jñānavāṃśca tathā vāgmī karmasvapi ca niṣṭhitaḥ । evaṃ yukto'pi na śreyān yadi śīlavivarjitaḥ ॥

ज्ञान, वाक्पटुता और कर्मकुशलता होने पर भी सदाचार से रहित व्यक्ति श्रेष्ठ नहीं होता।

विद्यासामर्थ्यचरित्रनैतिकता
30 सित॰ 2026
भगवद् गीता

स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः संसिद्धिं लभते नरः। स्वकर्मनिरतः सिद्धिं यथा विन्दति तच्छृणु॥

sve sve karmaṇyabhirataḥ saṁsiddhiṁ labhate naraḥ । svakarmanirataḥ siddhiṁ yathā vindati tacchṛṇu ॥

भगवद् गीता बताती है कि अपने कर्म में निष्ठा मनुष्य को सिद्धि की ओर ले जाती है।

कर्मकर्तव्यसफलता