हिताहितं सुखं दुःखमायुस्तस्य हिताहितम्। मानं च तच्च यत्रोक्तमायुर्वेदः स उच्यते॥
hitāhitaṃ sukhaṃ duḥkham āyus tasya hitāhitam । mānaṃ ca tac ca yatroktam āyurvedaḥ sa ucyate ॥
प्रधानमंत्री का संदेशआयुर्वेद दिवस की सभी देशवासियों को हार्दिक शुभकामनाएं! आयुर्वेद केवल उपचार की पद्धति नहीं, बल्कि स्वस्थ और संतुलित जीवनशैली का एक सशक्त माध्यम है। आइए, अपनी इस समृद्ध विरासत को अपनाने का संकल्प और मजबूत करें।
हिताहितं सुखं दुःखमायुस्तस्य हिताहितम् का अर्थ
जिस शास्त्र में यह बताया गया है कि मनुष्य के लिए कैसी जीवनशैली हितकारी है और कैसी अहितकारी, सुखमय जीवन क्या है और दुःखमय जीवन क्या है, स्वस्थ जीवन और रोगग्रस्त जीवन में क्या अन्तर है तथा दीर्घ और स्वस्थ जीवन के लिए किन बातों को अपनाना चाहिए और किनसे बचना चाहिए, साथ ही आयु के स्वरूप और उसके प्रमाण का भी जहाँ विस्तृत विवेचन किया गया है, उसे आयुर्वेद कहते हैं।
शब्दार्थ
- हिताहितम्hitāhitam
हितकारी और अहितकारी
हित + अहित
- सुखम्sukham
सुखमय
- दुःखम्duḥkham
दुःखमय
- आयुःāyuḥ
जीवन या आयु
निरन्तर पाठ में आयुः + तस्य से आयुस्तस्य बनता है।
- तस्यtasya
उसका; आयु का
- हिताहितम्hitāhitam
उसके लिए हितकर और अहितकर
हित + अहित
- मानम्mānam
माप या परिमाण
√मा
- चca
और
- तत् चtac ca
वह भी
सन्धि: तत् + च = तच्च।
- यत्र उक्तम्yatroktam
जहाँ कहा या समझाया गया है
सन्धि: यत्र + उक्तम् = यत्रोक्तम्।
- आयुर्वेदःāyurvedaḥ
आयुर्वेद, जीवन का ज्ञान
आयुस् + वेद
- सः उच्यतेsa ucyate
वह कहा जाता है
व्याख्या
यह श्लोक आयुर्वेद को उसके व्यापक विषय-क्षेत्र के आधार पर परिभाषित करता है। 'हिताहित' और 'सुख-दुःख' जैसे युग्म जीवन के हितकारी और अहितकारी पक्षों तथा सुखमय और दुःखमय अवस्थाओं को साथ रखकर देखते हैं। इसके बाद जीवन के लिए अनुकूल-प्रतिकूल तत्त्वों और आयु के 'मान', अर्थात् उसकी माप या अवधि, का उल्लेख आता है। इस प्रकार आयुर्वेद केवल रोग होने के बाद उपचार देने वाली पद्धति नहीं, बल्कि जीवन की गुणवत्ता, परिस्थितियों और अवधि का सुव्यवस्थित ज्ञान है। इन संतुलित युग्मों से यह भी स्पष्ट होता है कि कल्याणकारी जीवन के लिए उपयोगी और हानिकारक, दोनों का विवेक आवश्यक है। साथ का संदेश आयुर्वेद दिवस के प्रसंग में इसी व्यापक दृष्टि को स्वस्थ और संतुलित जीवनशैली से जोड़ता है। यह आधुनिक आग्रह श्लोक में आए जीवन के हित-अहित की चिंता के अनुरूप है, जबकि स्वयं श्लोक का मूल उद्देश्य आयुर्वेद के क्षेत्र की संक्षिप्त परिभाषा देना है।
मूल पोस्ट
चरक संहिता से और सुभाषित
स्रोत पृष्ठ देखेंसुखोपविष्टास्ते तत्र पुण्यां चक्रुः कथामिमाम्। धर्मार्थकाममोक्षाणामारोग्यं मूलमुत्तमम्॥
sukhopaviṣṭās te tatra puṇyāṃ cakruḥ kathām imām । dharmārthakāmamokṣāṇām ārogyaṃ mūlam uttamam ॥
चरक संहिता आरोग्य को धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष इन चारों पुरुषार्थों की प्राप्ति का सर्वोत्तम आधार बताती है।
विद्या वितर्को विज्ञानं स्मृतिस्तत्परता क्रिया। यस्यैते षड्गुणास्तस्य नासाध्यमतिवर्तते॥
vidyā vitarko vijñānaṃ smṛtis tatparatā kriyā । yasyaite ṣaḍguṇās tasya nāsādhyam ativartate ॥
विद्या, तर्क, विवेकपूर्ण ज्ञान, स्मृति, तत्परता और सक्रिय प्रयास मिलकर व्यक्ति को कठिन कार्य सिद्ध करने का व्यावहारिक सामर्थ्य देते हैं।
स्वास्थ्य पर और सुभाषित
विषय पृष्ठ देखेंसुखोपविष्टास्ते तत्र पुण्यां चक्रुः कथामिमाम्। धर्मार्थकाममोक्षाणामारोग्यं मूलमुत्तमम्॥
sukhopaviṣṭās te tatra puṇyāṃ cakruḥ kathām imām । dharmārthakāmamokṣāṇām ārogyaṃ mūlam uttamam ॥
चरक संहिता आरोग्य को धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष इन चारों पुरुषार्थों की प्राप्ति का सर्वोत्तम आधार बताती है।
सुत्रामाणं पृथिवीं द्यामनेहसं सुशर्माणमदितिं सुप्रणीतिम् । दैवीं नावं स्वरित्रामनागसो अस्रवन्तीमा रुहेमा स्वस्तये॥
sutrāmāṇaṃ pṛthivīṃ dyām anehasaṃ suśarmāṇam aditiṃ supraṇītim । daivīṃ nāvaṃ svaritrām anāgaso asravantīm ā ruhemā svastaye ॥
अथर्ववेद का यह मन्त्र पृथ्वी, द्युलोक और अदिति को सुरक्षित दिव्य नौका के रूप में देखता है, जो मनुष्य को कल्याण की ओर ले जाती है।
स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः। स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु॥
svasti na indro vṛddhaśravāḥ svasti naḥ pūṣā viśvavedāḥ । svasti nas tārkṣyo ariṣṭanemiḥ svasti no bṛhaspatir dadhātu ॥
ऋग्वेद का यह स्वस्ति-मन्त्र इन्द्र, पूषा, तार्क्ष्य और बृहस्पति से हम सबके कल्याण की कामना करता है।