एष प्रभावो रक्षायाः कथितस्ते युधिष्ठिर। जयदः सुखदश्चैव पुत्रारोग्यधनप्रदः॥
eṣa prabhāvo rakṣāyāḥ kathitas te yudhiṣṭhira । jayadaḥ sukhadaś caiva putrārogyadhanapradaḥ ॥
एष प्रभावो रक्षायाः कथितस्ते का अर्थ
रक्षा सूत्र के प्रभावों का वर्णन करते हुए कहा गया है कि यह जय, सुख, संतति, आरोग्य एवं ऐश्वर्य प्रदान करने वाला है।
शब्दार्थ
- एषःeṣaḥ
यह
एतद्
निरन्तर पाठ में प्रभावः से पहले अन्तिम विसर्ग का लोप होता है।
- प्रभावःprabhāvaḥ
प्रभाव, शुभ शक्ति या फल
प्र + √भू
रक्षायाः से पहले सन्धि होकर प्रभावो रक्षायाः बनता है।
- रक्षायाःrakṣāyāḥ
रक्षा-बन्ध या रक्षा सूत्र का
रक्षा
- कथितःkathitaḥ
बताया गया है
√कथ्
सन्धि: कथितः + ते = कथितस्ते।
- तेte
तुम्हें
युष्मद्
- युधिष्ठिरyudhiṣṭhira
हे युधिष्ठिर
सम्बोधन एकवचन; युधिष्ठिर का नाम श्लोक में स्पष्ट है।
- जयदःjayadaḥ
जय देने वाला
जय + द
- सुखदःsukhadaḥ
सुख देने वाला
सुख + द
च के साथ सन्धि होकर सुखदश्च बनता है।
- च एवcaiva
और निश्चय ही
सन्धि: च + एव = चैव।
- पुत्रारोग्यधनप्रदःputrārogyadhanapradaḥ
सन्तति, आरोग्य और धन देने वाला
पुत्र + आरोग्य + धन + प्रद
पुत्र, आरोग्य, धन और प्रद से बना समास।
व्याख्या
यह श्लोक सीधे युधिष्ठिर को सम्बोधित करते हुए 'रक्षा' के 'प्रभाव', अर्थात् उसकी शुभ शक्ति या फल, का सार बताता है। इस अध्याय में 'रक्षा' सामान्य अर्थ की सुरक्षा नहीं, बल्कि रक्षाबन्धन-विधि में बाँधा जाने वाला रक्षा-बन्ध अथवा सूत्र है। दूसरी पंक्ति में छोटे-छोटे समास उसके वरदान गिनाते हैं: 'जयद', विजय देने वाला; 'सुखद', सुख देने वाला; और 'पुत्रारोग्यधनप्रद', सन्तति, आरोग्य तथा धन प्रदान करने वाला। '-द' और '-प्रद' की पुनरावृत्ति इस पंक्ति को औपचारिक आशीर्वचन जैसा स्वर देती है। इन फलों में सफलता, मानसिक सुख, परिवार की निरन्तरता, शारीरिक स्वास्थ्य और भौतिक समृद्धि सभी समाहित हैं। भविष्य महापुराण के आसपास के प्रसंग में श्रीकृष्ण युधिष्ठिर को रक्षाबन्धन की विधि समझा रहे हैं। पहले शची द्वारा इन्द्र के लिए बाँधी गई रक्षा से जुड़ी कथा आती है और फिर श्रावण पूर्णिमा के अनुष्ठान का विधान बताया जाता है। दिया गया अर्थ ठीक रूप से 'रक्षा' को रक्षा सूत्र के रूप में पहचानता है और श्लोक के सभी फलों को संक्षेप में प्रस्तुत करता है। स्वयं यह श्लोक आधुनिक भाई-बहन के उत्सव की परिभाषा नहीं देता; इसका तात्कालिक विषय अनुष्ठानिक रक्षा सूत्र में मानी गई मंगलकारी शक्ति है।
मूल पोस्ट
सफलता पर और सुभाषित
विषय पृष्ठ देखेंनित्यं परिचरेच्चैव तद्वै सुकृतमुत्तमम्। कीर्तिं पुण्यं यशो लोकान् प्राप्स्यसे राजसत्तम॥
nityaṃ paricareccaiva tadvai sukṛtamuttamam । kīrtiṃ puṇyaṃ yaśo lokān prāpsyase rājasattama ॥
नित्य सेवा को श्रेष्ठ पुण्य कर्म बताया गया है, जिससे कीर्ति, यश और उत्तम लोकों की प्राप्ति होती है।
स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः संसिद्धिं लभते नरः। स्वकर्मनिरतः सिद्धिं यथा विन्दति तच्छृणु॥
sve sve karmaṇyabhirataḥ saṁsiddhiṁ labhate naraḥ । svakarmanirataḥ siddhiṁ yathā vindati tacchṛṇu ॥
भगवद् गीता बताती है कि अपने कर्म में निष्ठा मनुष्य को सिद्धि की ओर ले जाती है।
सुखोपविष्टास्ते तत्र पुण्यां चक्रुः कथामिमाम्। धर्मार्थकाममोक्षाणामारोग्यं मूलमुत्तमम्॥
sukhopaviṣṭās te tatra puṇyāṃ cakruḥ kathām imām । dharmārthakāmamokṣāṇām ārogyaṃ mūlam uttamam ॥
चरक संहिता आरोग्य को धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष इन चारों पुरुषार्थों की प्राप्ति का सर्वोत्तम आधार बताती है।