तन्तुं तन्वन्रजसो भानुमन्विहि ज्योतिष्मतः पथो रक्ष धिया कृतान्। अनुल्बणं वयत जोगुवामपो मनुर्भव जनया दैव्यं जनम्॥
tantuṃ tanvan rajaso bhānum anv ihi jyotiṣmataḥ patho rakṣa dhiyā kṛtān । anulbaṇaṃ vayata joguvām apo manur bhava janayā daivyaṃ janam ॥
तन्तुं तन्वन्रजसो भानुमन्विहि ज्योतिष्मतः का अर्थ
मनुष्य को अपनी परम्पराओं और ज्ञान को आगे बढ़ाते हुए श्रेष्ठ कर्म करने चाहिए। उसे बुद्धि से निर्मित न्यायपूर्ण और प्रकाशमय मार्ग का अनुसरण करना चाहिए। श्रेष्ठ जनों के सदाचार को जीवन में अपनाकर निरन्तर विचारशील रहना चाहिए और दिव्य गुणों से सम्पन्न जनों का निर्माण करना चाहिए।
शब्दार्थ
- तन्तुम्tantum
तन्तु को, धागे को
तन्तु
- तन्वन्tanvan
तानता या बुनता हुआ
√तन्
- रजसःrajasaḥ
अन्तरिक्ष या प्रकाशमय आकाश के
रजस्
- भानुम्bhānum
प्रकाश को, सूर्य को
भानु
- अनु इहिanv ihi
अनुसरण करो, पीछे चलो
अनु + √इ
सन्धि: अनु + इहि = अन्विहि।
- ज्योतिष्मतःjyotiṣmataḥ
ज्योतिर्मय, प्रकाश से युक्त
ज्योतिस् + मतुप्
- पथःpathaḥ
मार्गों को
पथिन्
- रक्षrakṣa
रक्षा करो
√रक्ष्
- धियाdhiyā
बुद्धि, चिन्तन या पवित्र प्रज्ञा से
धी
- कृतान्kṛtān
बनाए हुए, निर्मित
√कृ
- अनुल्बणम्anulbaṇam
सुगठित, उलझन या दोष से रहित
अन् + उल्बण
- वयतvayata
बुनो, विस्तार करो
√वे
मध्यम पुरुष बहुवचन आज्ञार्थ।
- जोगुवाम्joguvām
बार-बार आह्वान या स्तुति करने वालों के
एक दुरूह वैदिक रूप, जिसे सामान्यतः षष्ठी बहुवचन माना जाता है।
- अपःapaḥ
कर्मों को, पवित्र कार्यों को
अपस्
- मनुः भवmanur bhava
मनु बनो, सच्चे मनुष्य बनो
मनु; √भू
सन्धि: मनुः + भव = मनुर्भव।
- जनयjanaya
उत्पन्न करो, निर्माण करो
√जन्
- दैव्यम्daivyam
दैवी, दिव्य गुणों से युक्त
देव
- जनम्janam
जन को, मनुष्य को
जन
व्याख्या
इस मन्त्र में तन्तु, प्रकाश और मनुष्य-निर्माण के बिम्ब एक क्रम में विकसित होते हैं। 'तन्तु' और उसे तानने अथवा बुनने की क्रिया ऐसे कर्म का संकेत देती है जो आगे बढ़ता और जोड़ता है, जबकि 'भानु' तथा 'ज्योतिष्मत्' प्रकाश और ज्योतिर्मय मार्गों की ओर ले जाते हैं। ये मार्ग 'धिया कृतान्', अर्थात् बुद्धि, चिन्तन या पवित्र प्रज्ञा से निर्मित हैं, और 'रक्ष' की आज्ञा उनकी रक्षा करने को कहती है। अन्तिम वचन 'मनुर्भव जनया दैव्यं जनम्' विशेष रूप से स्मरणीय है: मनु बनो, सच्चे अर्थ में मनुष्य बनो, और दैवी गुणों से युक्त जन को उत्पन्न करो। इस प्रकार मन्त्र प्रकाशमय मार्ग की रक्षा से आगे बढ़कर श्रेष्ठ मानवीय गुणों को स्वयं धारण करने और अगली पीढ़ी में विकसित करने तक पहुँचता है। ऋग्वेद १०.५३ के मूल प्रसंग में यह अग्नि से सम्बद्ध वैदिक यज्ञ-मन्त्र है, और पारम्परिक व्याख्याएँ इसके तन्तु, मार्ग और कर्म को यज्ञ तथा पवित्र अनुष्ठान से जोड़ती हैं। दिया गया अर्थ इसी बिम्ब को आज के जीवन में परम्परा और ज्ञान को आगे बढ़ाने, बुद्धि से बने न्यायपूर्ण मार्ग पर चलने तथा दिव्य चरित्र वाले लोगों का निर्माण करने के रूप में पढ़ता है। यह प्रत्येक वैदिक पद का शाब्दिक अनुवाद नहीं, बल्कि एक व्यापक आधुनिक अनुप्रयोग है; विशेषतः 'जोगुवामपो' का पद-विन्यास दुरूह है। फिर भी इसका मुख्य नैतिक आग्रह मन्त्र की आज्ञात्मक शक्ति के निकट रहता है: विचारपूर्वक कर्म करो, प्रकाशमय मार्ग की रक्षा करो, पूर्ण मनुष्य बनो और दूसरों में श्रेष्ठ गुण विकसित करो।
मूल पोस्ट
ऋग्वेद से और सुभाषित
स्रोत पृष्ठ देखेंसुत्रामाणं पृथिवीं द्यामनेहसं सुशर्माणमदितिं सुप्रणीतिम् । दैवीं नावं स्वरित्रामनागसो अस्रवन्तीमा रुहेमा स्वस्तये॥
sutrāmāṇaṃ pṛthivīṃ dyām anehasaṃ suśarmāṇam aditiṃ supraṇītim । daivīṃ nāvaṃ svaritrām anāgaso asravantīm ā ruhemā svastaye ॥
अथर्ववेद का यह मन्त्र पृथ्वी, द्युलोक और अदिति को सुरक्षित दिव्य नौका के रूप में देखता है, जो मनुष्य को कल्याण की ओर ले जाती है।
स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः। स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु॥
svasti na indro vṛddhaśravāḥ svasti naḥ pūṣā viśvavedāḥ । svasti nas tārkṣyo ariṣṭanemiḥ svasti no bṛhaspatir dadhātu ॥
ऋग्वेद का यह स्वस्ति-मन्त्र इन्द्र, पूषा, तार्क्ष्य और बृहस्पति से हम सबके कल्याण की कामना करता है।
विद्या पर और सुभाषित
विषय पृष्ठ देखेंनित्यं परिचरेच्चैव तद्वै सुकृतमुत्तमम्। कीर्तिं पुण्यं यशो लोकान् प्राप्स्यसे राजसत्तम॥
nityaṃ paricareccaiva tadvai sukṛtamuttamam । kīrtiṃ puṇyaṃ yaśo lokān prāpsyase rājasattama ॥
नित्य सेवा को श्रेष्ठ पुण्य कर्म बताया गया है, जिससे कीर्ति, यश और उत्तम लोकों की प्राप्ति होती है।
ज्ञानवांश्च तथा वाग्मी कर्मस्वपि च निष्ठितः। एवं युक्तोऽपि न श्रेयान् यदि शीलविवर्जितः॥
jñānavāṃśca tathā vāgmī karmasvapi ca niṣṭhitaḥ । evaṃ yukto'pi na śreyān yadi śīlavivarjitaḥ ॥
ज्ञान, वाक्पटुता और कर्मकुशलता होने पर भी सदाचार से रहित व्यक्ति श्रेष्ठ नहीं होता।
शुचित्वं त्यागिता शौर्यं सामान्यं सुखदुःखयोः। दाक्षिण्यं चानुरक्तिश्च सत्यता च सुहृद्गुणाः॥
śucitvaṃ tyāgitā śauryaṃ sāmānyaṃ sukhaduḥkhayoḥ । dākṣiṇyaṃ cānuraktiśca satyatā ca suhṛdguṇāḥ ॥
निर्मलता, त्याग, साहस, सुख-दुःख में समान भाव, शिष्टता, अनुराग और सत्यता सच्चे मित्र के गुण हैं।