ऋग्वेद से सुभाषित

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यह स्रोत 6 विषयों में फैले 20 सुभाषित प्रदान करता है।

नवीनतम अद्यतन: 22 सित॰ 2026

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22 सित॰ 2026
अथर्ववेद

सुत्रामाणं पृथिवीं द्यामनेहसं सुशर्माणमदितिं सुप्रणीतिम् । दैवीं नावं स्वरित्रामनागसो अस्रवन्तीमा रुहेमा स्वस्तये॥

sutrāmāṇaṃ pṛthivīṃ dyām anehasaṃ suśarmāṇam aditiṃ supraṇītim । daivīṃ nāvaṃ svaritrām anāgaso asravantīm ā ruhemā svastaye ॥

अथर्ववेद का यह मन्त्र पृथ्वी, द्युलोक और अदिति को सुरक्षित दिव्य नौका के रूप में देखता है, जो मनुष्य को कल्याण की ओर ले जाती है।

प्रकृतिकल्याण
10 सित॰ 2026
ऋग्वेद

स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः। स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु॥

svasti na indro vṛddhaśravāḥ svasti naḥ pūṣā viśvavedāḥ । svasti nas tārkṣyo ariṣṭanemiḥ svasti no bṛhaspatir dadhātu ॥

ऋग्वेद का यह स्वस्ति-मन्त्र इन्द्र, पूषा, तार्क्ष्य और बृहस्पति से हम सबके कल्याण की कामना करता है।

कल्याणभक्तिआध्यात्मिकता
27 अग॰ 2026
ऋग्वेद

तन्तुं तन्वन्रजसो भानुमन्विहि ज्योतिष्मतः पथो रक्ष धिया कृतान्। अनुल्बणं वयत जोगुवामपो मनुर्भव जनया दैव्यं जनम्॥

tantuṃ tanvan rajaso bhānum anv ihi jyotiṣmataḥ patho rakṣa dhiyā kṛtān । anulbaṇaṃ vayata joguvām apo manur bhava janayā daivyaṃ janam ॥

ऋग्वेद का यह मन्त्र बुद्धि से निर्मित ज्योतिर्मय मार्गों की रक्षा और सच्चा मनुष्य बनकर दैवी गुणों से युक्त जन के निर्माण का आह्वान करता है।

विद्याकर्तव्यचरित्रआध्यात्मिकता
17 अग॰ 2026
ऋग्वेद

समानी व आकूतिः समाना हृदयानि वः। समानमस्तु वो मनो यथा वः सुसहासति॥

samānī va ākūtiḥ samānā hṛdayāni vaḥ । samānam astu vo mano yathā vaḥ susahāsati ॥

ऋग्वेद का अंतिम मंत्र समान संकल्प, समान हृदय और समान मन की कामना करता है, जिससे सब परस्पर सौहार्द के साथ मिलकर रह सकें।

एकतासामंजस्य
10 अग॰ 2026
ऋग्वेद

भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवा भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः। स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवांसस्तनूभिर्व्यशेम देवहितं यदायुः॥

bhadraṃ karṇebhiḥ śṛṇuyāma devā bhadraṃ paśyemākṣabhir yajatrāḥ । sthirair aṅgais tuṣṭuvāṃsas tanūbhir vyaśema devahitaṃ yad āyuḥ ॥

ऋग्वेद की यह प्रार्थना शुभ सुनने और देखने, स्थिर अंगों के साथ स्तुति करने तथा देवों द्वारा निर्धारित आयु को पूर्ण करने की कामना करती है।

कल्याणभक्ति
30 जुल॰ 2026
ऋग्वेद

शं नो द्यावापृथिवी पूर्वहूतौ शमन्तरिक्षं दृशये नो अस्तु। शं न ओषधीर्वनिनो भवन्तु शं नो रजसस्पतिरस्तु जिष्णुः॥

śaṁ no dyāvāpṛthivī pūrvahūtau śam antarikṣaṁ dṛśaye no astu । śaṁ na oṣadhīr vanino bhavantu śaṁ no rajasas patir astu jiṣṇuḥ ॥

ऋग्वेद का यह मन्त्र द्युलोक, पृथ्वी, अन्तरिक्ष, औषधियों, वृक्षों और अन्तरिक्ष के विजयशील अधिपति से स्थायी मंगल की प्रार्थना करता है।

प्रकृतिकल्याणआध्यात्मिकता
30 जून 2026
ऋग्वेद

समानो मन्त्रः समितिः समानी समानं मनः सह चित्तमेषाम्। समानं मन्त्रमभि मन्त्रये वः समानेन वो हविषा जुहोमि॥

samāno mantraḥ samitiḥ samānī samānaṁ manaḥ saha cittameṣām । samānaṁ mantram abhi mantraye vaḥ samānena vo haviṣā juhomi ॥

ऋग्वेद का यह मंत्र समान संकल्प, सौहार्दपूर्ण सभा, एकचित्त मन और साझा उद्देश्य से मिलकर कार्य करने की प्रेरणा देता है।

एकतासामंजस्यआध्यात्मिकता
26 जून 2026
ऋग्वेद

सं गच्छध्वं सं वदध्वं सं वो मनांसि जानताम्। देवा भागं यथा पूर्वे संजानाना उपासते॥

saṃ gacchadhvaṃ saṃ vadadhvaṃ saṃ vo manāṃsi jānatām । devā bhāgaṃ yathā pūrve saṃjānānā upāsate ॥

ऋग्वेद का यह मंत्र साथ चलने, साथ बोलने और विचारों में सामंजस्य रखते हुए एकता से कर्म करने की प्रेरणा देता है।

एकतासामंजस्यकर्तव्य
5 जून 2026
ऋग्वेद

मधु वाता ऋतायते मधु क्षरन्ति सिन्धवः। माध्वीर्नः सन्त्वोषधीः॥

madhu vātā ṛtāyate madhu kṣaranti sindhavaḥ । mādhvīr naḥ santv oṣadhīḥ ॥

ऋग्वेद का यह मंत्र वायु, नदियों, औषधियों और वनस्पतियों को मधुरता, पोषण, आरोग्य और सामंजस्य के स्रोत के रूप में देखता है।

प्रकृतिसंरक्षणसामंजस्यकल्याण
25 मई 2026
ऋग्वेद

शं नो देवः सविता त्रायमाणः शं नो भवन्तूषसो विभातीः। शं नः पर्जन्यो भवतु प्रजाभ्यः शं नः क्षेत्रस्य पतिरस्तु शम्भुः॥

śaṃ no devaḥ savitā trāyamāṇaḥ śaṃ no bhavantūṣaso vibhātīḥ । śaṃ naḥ parjanyo bhavatu prajābhyaḥ śaṃ naḥ kṣetrasya patir astu śambhuḥ ॥

ऋग्वेद का यह मंत्र सविता, उषा, पर्जन्य और क्षेत्रपति से समस्त प्रजा, कृषि और धरती के लिए मंगल, हरियाली और समृद्धि की कामना करता है।

प्रकृतिकृषिकल्याणसामंजस्यसमृद्धि
22 मई 2026
ऋग्वेद

वनस्पते शतवल्शो वि रोह सहस्रवल्शा वि वयं रुहेम। यं त्वामयं स्वधितिस्तेजमानः प्रणिनाय महते सौभगाय॥

vanaspate śatavalśo vi roha sahasravalśā vi vayaṁ ruhema । yaṁ tvāmayaṁ svadhitistejamānaḥ praṇināya mahate saubhagāya ॥

ऋग्वेद का यह मंत्र प्रकृति और मानव के गहरे सह-अस्तित्व को रेखांकित करते हुए वनस्पति के साथ-साथ समाज की प्रगति की कामना करता है।

प्रकृतिसंरक्षणकृषिकल्याण
11 मई 2026
ऋग्वेद

अग्निर्मूर्धा दिवः ककुत्पतिः पृथिव्या अयम्। अपां रेतांसि जिन्वति॥

agnirmūrdhā divaḥ kakutpatiḥ pṛthivyā ayam । apāṁ retāṁsi jinvati ॥

एक वैदिक मंत्र जो अग्नि को द्युलोक की सर्वोच्च शक्ति और पदार्थ के भीतर ऊर्जा को जागृत करने वाले मूल तत्व के रूप में वर्णित करता है।

प्रकृतिऊर्जाशक्ति
16 अप्रैल 2026
ऋग्वेद

व्युच्छन्ती हि रश्मिभिर्विश्वमाभासि रोचनम्। ता त्वामुषर्वसूयवो गीर्भिः कण्वा अहूषत॥

vyucchantī hi raśmibhir viśvam ābhāsi rocanam । tā tvām uṣar vasūyavo gīrbhiḥ kaṇvā ahūṣata ॥

ऋग्वेद का यह मंत्र नारी शक्ति और ज्ञान की महिमा का वर्णन करता है, जो अज्ञान के अंधकार को मिटाकर सम्पूर्ण विश्व को आलोकित करती है।

नारीशक्तिसम्मानशक्ति
13 अप्रैल 2026
ऋग्वेद

इन्द्रं वर्धन्तो अप्तुरः कृण्वन्तो विश्वमार्यम्। अपघ्नन्तो अराव्णः॥

indraṁ vardhanto apturaḥ kṛṇvanto viśvamāryam । apaghnanto arāvṇaḥ ॥

ऋग्वेद का यह मंत्र समाज की कल्याणकारी शक्तियों को बढ़ाने और अन्यायपूर्ण शक्तियों का प्रतिरोध कर पूरे विश्व को श्रेष्ठ बनाने का एक ओजस्वी वैदिक आह्वान है।

धर्मसाहसचरित्रएकता
13 मार्च 2026
ऋग्वेद

आ नो भद्राः क्रतवो यन्तु विश्वतोऽदब्धासो अपरीतास उद्भिदः। देवा नो यथा सदमिद् वृधे असन्नप्रायुवो रक्षितारो दिवे दिवे॥

ā no bhadrāḥ kratavo yantu viśvato'dabdhāso aparītāsa udbhidhaḥ । devā no yathā sadamid vṛdhe asann aprāyuvo rakṣitāro dive dive ॥

ऋग्वेद की यह सार्वभौमिक प्रार्थना हमें चारों दिशाओं से शुभ और प्रेरणादायक विचारों को ग्रहण करने की प्रेरणा देती है।

ज्ञानविद्याआध्यात्मिकता
11 मार्च 2026
ऋग्वेद

स्वस्ति पन्थामनुचरेम सूर्याचन्द्रमसाविव। पुनर्ददाताघ्नता जानता सङ्गमेमहि॥

svasti panthām anucarema sūryācandramasāviva । punardadatāghnatā jānatā saṅgamemahi ॥

सूर्य और चंद्रमा के समान सदैव कल्याणकारी मार्ग पर चलने और परस्पर सद्भाव के साथ उन्नति की ओर अग्रसर होने का ऋग्वैदिक आह्वान।

सामंजस्यएकताकल्याणअहिंसा
2 मार्च 2026
ऋग्वेद

न वा उ मां वृजने वारयन्ते न पर्वतासो यदहं मनस्ये। मम स्वनात् कृधुकर्णो भयात एवेदनु द्यून्किरणः समेजात्॥

na vā u māṃ vṛjane vārayante na parvatāso yad ahaṃ manasye । mama svanāt kṛdhukarṇo bhayāta eved anu dyūn kiraṇaḥ samejāt ॥

ऋग्वेद का यह मंत्र अदम्य इच्छाशक्ति और आत्मविश्वास की महिमा का गान करता है, जो बड़े से बड़े पहाड़ों जैसी बाधाओं को भी पार करने में सक्षम है।

आत्मविश्वाससाहसदृढ़ता
11 फ़र॰ 2026
ऋग्वेद

यस्येमे हिमवन्तो महित्वा यस्य समुद्रं रसया सहाहुः। यस्येमाः प्रदिशो यस्य बाहू कस्मै देवाय हविषा विधेम॥

yasyeme himavanto mahitvā yasya samudraṃ rasayā sahāhuḥ । yasyemāḥ pradiśo yasya bāhū kasmai devāya haviṣā vidhema ॥

राष्ट्र की महिमा का गान करता यह मंत्र हमें देश के प्रति सर्वस्व समर्पण करने की प्रेरणा देता है।

भक्तिआध्यात्मिकताप्रकृति
29 जन॰ 2026
अथर्ववेद

एको बहूनामसि मन्य ईडिता विशं विशं युद्धाय सं शिशाधि। अकृत्तरुक्त्वया युजा वयं द्युमन्तं घोषं विजयाय कृण्मसि॥

eko bahūnāmasi manya īḍitā viśaṃ viśaṃ yuddhāya saṃ śiśādhi । akṛttaruk tvayā yujā vayaṃ dyumantaṃ ghoṣaṃ vijayāya kṛṇmasi ॥

मन्यु सूक्त का यह मंत्र अनुशासित युद्ध-ऊर्जा, सामूहिक साहस और विवेकपूर्ण दिशा में प्राप्त सम्मानजनक विजय का आह्वान करता है।

साहसनेतृत्वशक्तिअनुशासन
15 जन॰ 2026
ऋग्वेद

अस्माकमिन्द्रः समृतेषु ध्वजेष्वस्माकं या इषवस्ता जयन्तु। अस्माकं वीरा उत्तरे भवन्त्वस्माँ उ देवा अवता हवेषु॥

asmākam indraḥ samṛteṣu dhvajeṣv asmākaṁ yā iṣavas tā jayantu । asmākaṁ vīrā uttare bhavantv asmā̃ u devā avatā haveṣu ॥

यह वैदिक प्रार्थना संघर्ष में साहस, समुदाय की रक्षा और ऊँचे उठे ध्वजों के नीचे विजय के लिए इन्द्र का आह्वान करती है।

साहसशक्तिभक्ति