आ नो भद्राः - विश्व से कल्याणकारी विचार

13 मार्च 2026

आ नो भद्राः क्रतवो यन्तु विश्वतोऽदब्धासो अपरीतास उद्भिदः। देवा नो यथा सदमिद् वृधे असन्नप्रायुवो रक्षितारो दिवे दिवे॥

ā no bhadrāḥ kratavo yantu viśvato'dabdhāso aparītāsa udbhidhaḥ । devā no yathā sadamid vṛdhe asann aprāyuvo rakṣitāro dive dive ॥

आ नो भद्राः क्रतवो का अर्थ

हमारे पास चारों दिशाओं से ऐसे शुभ और प्रेरणादायक विचार आएँ जो हमें उत्साह, ऊर्जा और आगे बढ़ने की शक्ति प्रदान करें। वे विचार अडिग, अविजित और उन्नति के मार्ग को खोलने वाले हों। देवता प्रतिदिन हमारे जीवन में वृद्धि, प्रगति और नवोत्साह का संचार करें तथा हमें हर दिन सुरक्षित रखते हुए आगे बढ़ने की प्रेरणा दें।

शब्दार्थ

आā

इधर

नःnaḥ

हमारे लिए

अस्मद्

भद्राःbhadrāḥ

कल्याणकारी

भद्र

क्रतवःkratavaḥ

क्रतु, संकल्पशक्तियाँ

क्रतु

यन्तुyantu

आएँ

√इ

विश्वतःviśvataḥ

सब ओर से

विश्व

अदब्धासःadabdhāsaḥ

अखण्डित

अ + √दभ्

अपरीतासःaparītāsaḥ

अबाधित

अ + परि + √इ

उद्भिदःudbhidaḥ

उद्भेदन करते हुए

उद् + √भिद्

देवाःdevāḥ

देवगण

√दिव्

यथाyathā

जिससे

सदम् इत्sadam it

सदा ही

वृधेvṛdhe

वृद्धि के लिए

√वृध्

असन्asan

हों

√अस्

अप्रायुवःaprāyuvaḥ

अनवरत

अ + प्र + √यु

रक्षितारःrakṣitāraḥ

रक्षक

√रक्ष्

दिवे दिवेdive dive

दिन-प्रतिदिन

दिव्

व्याख्या

ऋग्वेद का यह मंत्र भारतीय संस्कृति की उदारता और उसके 'खुलेपन' का सबसे बड़ा प्रमाण है। यह प्रार्थना सिखाती है कि हमें किसी एक विचार या संकीर्णता में बँधने के बजाय विश्वभर से आने वाले श्रेष्ठ विचारों (भद्राः क्रतवो) का स्वागत करना चाहिए। 'विश्वतः' शब्द यह स्पष्ट करता है कि सत्य और ज्ञान की कोई भौगोलिक सीमा नहीं होती। जब हम चारों दिशाओं से आने वाले शुभ विचारों के लिए अपना मन खुला रखते हैं, तभी हमारा सर्वांगीण विकास संभव है। यह मंत्र केवल व्यक्तिगत उन्नति के लिए नहीं, बल्कि एक प्रगतिशील और सुरक्षित समाज के निर्माण का आधार है जहाँ ज्ञान का प्रकाश हर ओर से आता है।

मूल पोस्ट

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ऋग्वेद से और सुभाषित

स्रोत पृष्ठ देखें
22 सित॰ 2026
अथर्ववेद

सुत्रामाणं पृथिवीं द्यामनेहसं सुशर्माणमदितिं सुप्रणीतिम् । दैवीं नावं स्वरित्रामनागसो अस्रवन्तीमा रुहेमा स्वस्तये॥

sutrāmāṇaṃ pṛthivīṃ dyām anehasaṃ suśarmāṇam aditiṃ supraṇītim । daivīṃ nāvaṃ svaritrām anāgaso asravantīm ā ruhemā svastaye ॥

अथर्ववेद का यह मन्त्र पृथ्वी, द्युलोक और अदिति को सुरक्षित दिव्य नौका के रूप में देखता है, जो मनुष्य को कल्याण की ओर ले जाती है।

प्रकृतिकल्याण
10 सित॰ 2026
ऋग्वेद

स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः। स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु॥

svasti na indro vṛddhaśravāḥ svasti naḥ pūṣā viśvavedāḥ । svasti nas tārkṣyo ariṣṭanemiḥ svasti no bṛhaspatir dadhātu ॥

ऋग्वेद का यह स्वस्ति-मन्त्र इन्द्र, पूषा, तार्क्ष्य और बृहस्पति से हम सबके कल्याण की कामना करता है।

कल्याणभक्तिआध्यात्मिकता
27 अग॰ 2026
ऋग्वेद

तन्तुं तन्वन्रजसो भानुमन्विहि ज्योतिष्मतः पथो रक्ष धिया कृतान्। अनुल्बणं वयत जोगुवामपो मनुर्भव जनया दैव्यं जनम्॥

tantuṃ tanvan rajaso bhānum anv ihi jyotiṣmataḥ patho rakṣa dhiyā kṛtān । anulbaṇaṃ vayata joguvām apo manur bhava janayā daivyaṃ janam ॥

ऋग्वेद का यह मन्त्र बुद्धि से निर्मित ज्योतिर्मय मार्गों की रक्षा और सच्चा मनुष्य बनकर दैवी गुणों से युक्त जन के निर्माण का आह्वान करता है।

विद्याकर्तव्यचरित्रआध्यात्मिकता

ज्ञान पर और सुभाषित

विषय पृष्ठ देखें
6 अक्टू॰ 2026
समराङ्गणसूत्रधार

ज्ञानवांश्च तथा वाग्मी कर्मस्वपि च निष्ठितः। एवं युक्तोऽपि न श्रेयान् यदि शीलविवर्जितः॥

jñānavāṃśca tathā vāgmī karmasvapi ca niṣṭhitaḥ । evaṃ yukto'pi na śreyān yadi śīlavivarjitaḥ ॥

ज्ञान, वाक्पटुता और कर्मकुशलता होने पर भी सदाचार से रहित व्यक्ति श्रेष्ठ नहीं होता।

विद्यासामर्थ्यचरित्रनैतिकता
29 सित॰ 2026
सुभाषितरत्नभाण्डागारम्

उद्यमः साहसं धैर्यं बुद्धिः शक्तिः पराक्रमः। षडेते यत्र वर्तन्ते तत्र दैवं सहायकृत्॥

udyamaḥ sāhasaṃ dhairyaṃ buddhiḥ śaktiḥ parākramaḥ । ṣaḍete yatra vartante tatra daivaṃ sahāyakṛt ॥

उद्यम, साहस, धैर्य, बुद्धि, शक्ति और पराक्रम से युक्त व्यक्ति को दैव का सहयोग भी प्राप्त होता है।

दृढ़तासाहसविद्याशक्ति
28 सित॰ 2026
चरक संहिता

सुखोपविष्टास्ते तत्र पुण्यां चक्रुः कथामिमाम्। धर्मार्थकाममोक्षाणामारोग्यं मूलमुत्तमम्॥

sukhopaviṣṭās te tatra puṇyāṃ cakruḥ kathām imām । dharmārthakāmamokṣāṇām ārogyaṃ mūlam uttamam ॥

चरक संहिता आरोग्य को धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष इन चारों पुरुषार्थों की प्राप्ति का सर्वोत्तम आधार बताती है।

स्वास्थ्यधर्मसमृद्धिआध्यात्मिकता