जीवन पर संस्कृत श्लोक

जीवन से जुड़ा संस्कृत ज्ञान अत्यंत व्यावहारिक है। वह पूछता है कि हम दूसरों से कैसे बोलें, क्रोध का सामना कैसे करें, निर्णय कैसे लें, विद्या और धन का उपयोग कैसे करें, स्वतंत्रता और पराधीनता में भेद कैसे समझें और सामान्य आचरण में सत्य को कैसे बनाए रखें।

ये श्लोक सुख का कोई एक सूत्र नहीं देते। साथ पढ़ने पर वे विचार, आत्मसंयम, करुणा, उदार संबंधों और ऐसे आचरण से निर्मित जीवन की रूपरेखा प्रस्तुत करते हैं जिसे हम स्वयं भी दूसरों से पाने की अपेक्षा रख सकें।

इस संग्रह का प्रत्येक श्लोक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा X पर साझा किया गया था।

इन श्लोकों को आचरण के मार्गदर्शक की तरह पढ़ें—हर शिक्षा एक स्थायी दार्शनिक विचार को जीवन के सामान्य निर्णयों से जोड़ती है।

1

श्रूयतां धर्मसर्वस्वं श्रुत्वा चैवावधार्यताम्। आत्मनः प्रतिकूलानि परेषां न समाचरेत्॥

śrūyatāṃ dharmasarvasvaṃ śrutvā caivāvadhāryatām । ātmanaḥ pratikūlāni pareṣāṃ na samācaret ॥

अर्थ

जीवन को श्रेष्ठ बनाने के लिए सदैव उत्तम और अनुकरणीय बातों को सुनें तथा उनका पालन करें। जो व्यवहार हमें स्वयं के लिए अच्छा न लगे, वैसा व्यवहार दूसरों के साथ कभी न करें।

2

प्रियवाक्यप्रदानेन सर्वे तुष्यन्ति जन्तवः। तस्मात् तदेव वक्तव्यं वचने का दरिद्रता॥

priyavākyapradānena sarve tuṣyanti jantavaḥ । tasmāt tadeva vaktavyaṁ vacane kā daridratā ॥

अर्थ

मीठी वाणी बोलने से सभी व्यक्ति प्रसन्न और संतुष्ट होते हैं। इसलिए सदैव मधुर वचन ही बोलने चाहिए। जब वाणी हमारे अधीन है और इसका कोई मूल्य भी नहीं देना पड़ता तो फिर मीठे वचन बोलने में दरिद्रता कैसी ?

3

अयं निजः परो वेति गणना लघुचेतसाम्। उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम्॥

ayaṁ nijaḥ paro veti gaṇanā laghucetasām । udāracaritānāṁ tu vasudhaiva kuṭumbakam ॥

अर्थ

उदार और विशाल हृदय वाले लोग संकीर्ण सोच से ऊपर उठकर समस्त संसार को अपना परिवार मानते हैं। उनके लिए कोई भी पराया नहीं होता, बल्कि प्रत्येक व्यक्ति अपना ही होता है और यही भावना प्रेम, एकता और सौहार्द का आधार बनती है।

4

सहसा विदधीत न क्रियामविवेकः परमापदां पदम्। वृणते हि विमृश्यकारिणं गुणलुब्धाः स्वयमेव सम्पदः॥

sahasā vidadhīta na kriyām avivekaḥ paramāpadāṃ padam । vṛṇate hi vimṛśyakāriṇaṃ guṇalubdhāḥ svayameva sampadaḥ ॥

अर्थ

किसी भी कार्य को बिना सोचे-समझे नहीं करना चाहिए, क्योंकि बिना विचार किए काम को करना, बड़ी विपत्तियों का कारण होता है। इसके विपरीत, जो व्यक्ति अच्छी तरह सोच-विचार कर काम करता है, गुणों की सफलता और लक्ष्मी स्वयं ढूंढते हुए उसका चुनाव करती हैं।

5

सत्यमेव जयति नानृतं सत्येन पन्था विततो देवयानः। येनाक्रमन्त्यृषयो ह्याप्तकामा यत्र तत्सत्यस्य परमं निधानम्॥

satyameva jayati nānṛtaṃ satyena panthā vitato devayānaḥ । yenākramantyṛṣayo hyāptakāmā yatra tatsatyasya paramaṃ nidhānam ॥

अर्थ

सत्य की ही जीत होती है, असत्य की नहीं। सत्य के द्वारा ही वह देवयान मार्ग (दिव्य मार्ग) विस्तृत होता है, जिससे होकर पूर्णकाम (जिनकी इच्छाएँ पूर्ण हो चुकी हों) ऋषि उस स्थान तक पहुँचते हैं जहाँ सत्य का परम निधान (खजाना) है।

6

गुणो भूषयते रूपं शीलं भूषयते कुलम्। सिद्धिर्भूषयते विद्यां भोगो भूषयते धनम्॥

guṇo bhūṣayate rūpaṁ śīlaṁ bhūṣayate kulam । siddhir bhūṣayate vidyāṁ bhogo bhūṣayate dhanam ॥

अर्थ

गुणों से सुन्दरता में चार चांद लग जाते हैं, आचरण से कुल की प्रतिष्ठा बढ़ती है, सिद्धि से विद्या की शोभा बढ़ती है और धन का मूल्य उसके सदुपयोग से बढ़ता है।

7

सर्वं परवशं दुःखं सर्वमात्मवशं सुखम्। एतद् विद्यात् समासेन लक्षणं सुखदुःखयोः॥

sarvaṁ paravaśaṁ duḥkhaṁ sarvam ātmavaśaṁ sukham । etad vidyāt samāsena lakṣaṇaṁ sukha-duḥkhayoḥ ॥

अर्थ

सुख और दुःख की संक्षेप में परिभाषा यही है कि परावलम्बन से सदा दुःख एवं स्वावलम्बन से सदा सुख ही मिलता है।

8

क्रोधः प्राणहरः शत्रुः क्रोधो मित्रमुखो रिपुः। क्रोधो ह्यसिर्महातीक्ष्णः सर्वं क्रोधोऽपकर्षति॥

krodhaḥ prāṇaharaḥ śatruḥ krodho mitramukho ripuḥ । krodho hy asir mahātīkṣṇaḥ sarvaṃ krodho ’pakarṣati ॥

अर्थ

क्रोध प्राणघातक शत्रु है तथा मित्र के रूप में व्यवहार करने वाले शत्रु के समान है। तीक्ष्ण तलवार के समान यह क्रोध सब प्रकार से अवनति का कारण बनता है।

9

अहिंसा परमो धर्मस्तथाऽहिंसा परन्तपः। अहिंसा परमं सत्यं यतो धर्मः प्रवर्तते॥

ahiṃsā paramo dharmastathā’hiṃsā parantapaḥ । ahiṃsā paramaṃ satyaṃ yato dharmaḥ pravartate ॥

अर्थ

अहिंसा सबसे बड़ा धर्म है, अहिंसा ही सबसे बड़ा तप है और अहिंसा ही परम सत्य है, जिससे धर्म की स्थापना होती है।

10

आत्मज्ञानं समारम्भस्तितिक्षा धर्मनित्यता। यमर्था नापकर्षन्ति स वै पण्डित उच्यते॥

ātmajñānaṁ samārambhas titikṣā dharmanityatā । yam arthā nāpakarṣanti sa vai paṇḍita ucyate ॥

अर्थ

जो व्यक्ति अपनी योग्यता से भली-भांति परिचित हो, आत्मनिर्भर होकर कल्याणकारी कर्म करने में तत्पर हो, विपरीत परिस्थितियों को धैर्यपूर्वक सहन करता हो और सदा सदाचार का पालन करता हो, जिसे लोभ अपने मार्ग से विचलित नहीं कर पाता, वही वास्तव में बुद्धिमान कहलाता है।