सर्वं परवशं दुःखं सर्वमात्मवशं सुखम्। एतद् विद्यात् समासेन लक्षणं सुखदुःखयोः॥
sarvaṁ paravaśaṁ duḥkhaṁ sarvam ātmavaśaṁ sukham । etad vidyāt samāsena lakṣaṇaṁ sukha-duḥkhayoḥ ॥
सर्वं परवशं दुःखं सर्वमात्मवशं का अर्थ
सुख और दुःख की संक्षेप में परिभाषा यही है कि परावलम्बन से सदा दुःख एवं स्वावलम्बन से सदा सुख ही मिलता है।
शब्दार्थ
- सर्वम्sarvam
सब कुछ
सर्व
- परवशम्paravaśam
पराधीन
पर + वश
- दुःखम्duḥkham
दुःख है
दुःख
- आत्मवशम्ātmavaśam
आत्माधीन
आत्मन् + वश
- सुखम्sukham
सुख है
सुख
- एतत्etat
यह
एतद्
- विद्यात्vidyāt
जान लेना चाहिए
√विद्
- समासेनsamāsena
संक्षेप में
सम् + √अस्
- लक्षणम्lakṣaṇam
लक्षण
√लक्ष्
- सुखदुःखयोःsukhaduḥkhayoḥ
सुख और दुःख का
सुख + दुःख
व्याख्या
मनुस्मृति की यह शिक्षा जानबूझकर एक कठोर परिभाषा देती है: जो कुछ दूसरे के वश में है वह दुःख है और जो अपने वश में है वह सुख है। ‘परवश’ और ‘आत्मवश’ विशेष रूप से नियंत्रण या अधीनता बताते हैं; साथ दिए अर्थ की आधुनिक पराधीनता, आत्मनिर्भरता और आंतरिक पूर्णता इससे व्यापक अनुप्रयोग हैं। श्लोक इसे ‘लक्षणम्’, अर्थात पहचान, और वह भी ‘समासेन’, संक्षेप में, कहता है। इसलिए इसे अपने अधिकार और कर्मक्षमता पर विचार करने की व्यावहारिक कसौटी बनाया जा सकता है, साथ ही यह समझते हुए कि संस्कृत का सूत्र आधुनिक परस्पर-निर्भरता की भाषा से अधिक निरपेक्ष है।
मूल पोस्ट
मनुस्मृति से और सुभाषित
स्रोत पृष्ठ देखेंकन्यानां सम्प्रदानञ्च कुमाराणाञ्च रक्षणम्। राष्ट्रस्य सङ्ग्रहे नित्यं विधानमिदमाचरेत्॥
kanyānāṃ sampradānañca kumārāṇāñca rakṣaṇam । rāṣṭrasya saṅgrahe nityaṃ vidhānam idam ācaret ॥
मनुस्मृति-आधारित यह शिक्षा कन्याओं के कल्याण, नई पीढ़ी की रक्षा और राष्ट्र की स्थिरता व समृद्धि के लिए सतत प्रबंध को जनप्रतिनिधि का कर्तव्य बताती है।
यथा खात्वा खनित्रेण भूतले वारि विन्दति। तथा गुरुगतां विद्यां शुश्रूषुरधिगच्छति॥
yathā khātvā khanitreṇa bhūtale vāri vindati । tathā gurugatāṃ vidyāṃ śuśrūṣuradhigacchati ॥
जिस प्रकार धरती को गहराई तक खोदने पर ही जल मिलता है, उसी प्रकार गुरु में विद्यमान ज्ञान केवल शुश्रूषा — समर्पित सेवा और सच्ची श्रवण-जिज्ञासा — से ही प्राप्त होता है।
आत्मज्ञान पर और सुभाषित
विषय पृष्ठ देखेंभस्मीकृतस्वार्थसौख्यपरिचर्चितविग्रहाः। स्वराज्ययोगनिर्मग्ना धन्यास्ते वीरयोगिनः॥
bhasmīkṛtasvārthasaukhyaparicarcitavigrahāḥ । svarājyayoganirmagnā dhanyās te vīrayoginaḥ ॥
यह श्लोक उन वीर साधकों को धन्य कहता है जो निजी सुख त्यागकर स्वराज्य की साधना में पूरी तरह समर्पित हैं।
हिताहितं सुखं दुःखमायुस्तस्य हिताहितम्। मानं च तच्च यत्रोक्तमायुर्वेदः स उच्यते॥
hitāhitaṃ sukhaṃ duḥkham āyus tasya hitāhitam । mānaṃ ca tac ca yatroktam āyurvedaḥ sa ucyate ॥
चरक संहिता आयुर्वेद को हित-अहित, सुख-दुःख, जीवन के अनुकूल-प्रतिकूल तत्त्वों और आयु के मान का ज्ञान बताती है।
सुत्रामाणं पृथिवीं द्यामनेहसं सुशर्माणमदितिं सुप्रणीतिम् । दैवीं नावं स्वरित्रामनागसो अस्रवन्तीमा रुहेमा स्वस्तये॥
sutrāmāṇaṃ pṛthivīṃ dyām anehasaṃ suśarmāṇam aditiṃ supraṇītim । daivīṃ nāvaṃ svaritrām anāgaso asravantīm ā ruhemā svastaye ॥
अथर्ववेद का यह मन्त्र पृथ्वी, द्युलोक और अदिति को सुरक्षित दिव्य नौका के रूप में देखता है, जो मनुष्य को कल्याण की ओर ले जाती है।