कन्यानां सम्प्रदानञ्च कुमाराणाञ्च रक्षणम्। राष्ट्रस्य सङ्ग्रहे नित्यं विधानमिदमाचरेत्॥
kanyānāṃ sampradānañca kumārāṇāñca rakṣaṇam । rāṣṭrasya saṅgrahe nityaṃ vidhānam idam ācaret ॥
प्रधानमंत्री का संदेशजब चौतरफा विकास के साथ हर देशवासी के जीवन में सकारात्मक परिवर्तन सुनिश्चित होता है, तब राष्ट्र की प्रगति को भी नई गति मिलती है। इसी प्रेरक भावना के साथ हम भारत के सामर्थ्य को निरंतर मजबूती देने में जुटे हुए हैं।
कन्यानां सम्प्रदानञ्च कुमाराणाञ्च रक्षणम् का अर्थ
कन्याओं के हितों की समुचित व्यवस्था करना, नई पीढ़ी के संरक्षण एवं विकास को सुनिश्चित करना तथा राष्ट्र की एकता, सुरक्षा, समृद्धि और सुव्यवस्थित संचालन के लिए निरन्तर आवश्यक प्रबन्ध करना - ये प्रत्येक जनप्रतिनिधि के नित्य कर्तव्य हैं।
शब्दार्थ
- कन्यानाम्kanyānām
कन्याओं का
कन्या
- सम्प्रदानम्sampradānam
सम्प्रदान
सम् + प्र + √दा
- चca
और
- कुमाराणाम्kumārāṇām
कुमारों का
कुमार
- रक्षणम्rakṣaṇam
रक्षण
√रक्ष्
- राष्ट्रस्यrāṣṭrasya
राष्ट्र के
√राज्
- सङ्ग्रहेsaṅgrahe
संग्रह में
सम् + √ग्रह्
- नित्यम्nityam
सदा
नित्य
- विधानम् इदम्vidhānam idam
यह विधान
वि + √धा
- आचरेत्ācaret
आचरण करे
आ + √चर्
व्याख्या
यह प्रविष्टि मनुस्मृति के दो अर्धश्लोकों को मिलाकर एक नागरिक शिक्षा के रूप में प्रस्तुत करती है। शाब्दिक रूप से ‘कन्यानां सम्प्रदानम्’ कन्याओं को विवाह में देने और ‘कुमाराणां रक्षणम्’ कुमारों की रक्षा की बात करता है। साथ दिया गया अर्थ इन ऐतिहासिक रूप से विशिष्ट कर्तव्यों को कन्याओं के हित तथा नई पीढ़ी के संरक्षण और विकास के व्यापक आधुनिक भाव में प्रस्तुत करता है। दूसरा अर्धांश ‘राष्ट्रस्य सङ्ग्रह’ की ओर जाता है, अर्थात राष्ट्र को निरंतर सँभालने, सुरक्षित रखने और सुव्यवस्थित करने का कर्तव्य। आधुनिक अनुप्रयोग के रूप में पोस्ट परिवार और समाज के उत्तरदायित्वों को जनकल्याण तथा राष्ट्र-व्यवस्था से जोड़ता है। यह विस्तार संस्कृत के शाब्दिक कथन से व्यापक है, पर उस आग्रह से जुड़ा है कि इन दायित्वों और राष्ट्र के संचालन पर निरंतर ध्यान दिया जाना चाहिए।
स्रोत और पाठभेद
मूल पोस्ट
मनुस्मृति से और सुभाषित
स्रोत पृष्ठ देखेंयथा खात्वा खनित्रेण भूतले वारि विन्दति। तथा गुरुगतां विद्यां शुश्रूषुरधिगच्छति॥
yathā khātvā khanitreṇa bhūtale vāri vindati । tathā gurugatāṃ vidyāṃ śuśrūṣuradhigacchati ॥
जिस प्रकार धरती को गहराई तक खोदने पर ही जल मिलता है, उसी प्रकार गुरु में विद्यमान ज्ञान केवल शुश्रूषा — समर्पित सेवा और सच्ची श्रवण-जिज्ञासा — से ही प्राप्त होता है।
सर्वं परवशं दुःखं सर्वमात्मवशं सुखम्। एतद् विद्यात् समासेन लक्षणं सुखदुःखयोः॥
sarvaṁ paravaśaṁ duḥkhaṁ sarvam ātmavaśaṁ sukham । etad vidyāt samāsena lakṣaṇaṁ sukha-duḥkhayoḥ ॥
पराधीनता सुख को दूसरों के हाथों में छोड़ देती है, जबकि आत्मवशता वह स्वतंत्रता और स्थिरता देती है जिससे कल्याण बढ़ता है।
सुशासन पर और सुभाषित
विषय पृष्ठ देखेंनित्यं परिचरेच्चैव तद्वै सुकृतमुत्तमम्। कीर्तिं पुण्यं यशो लोकान् प्राप्स्यसे राजसत्तम॥
nityaṃ paricareccaiva tadvai sukṛtamuttamam । kīrtiṃ puṇyaṃ yaśo lokān prāpsyase rājasattama ॥
नित्य सेवा को श्रेष्ठ पुण्य कर्म बताया गया है, जिससे कीर्ति, यश और उत्तम लोकों की प्राप्ति होती है।
स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः संसिद्धिं लभते नरः। स्वकर्मनिरतः सिद्धिं यथा विन्दति तच्छृणु॥
sve sve karmaṇyabhirataḥ saṁsiddhiṁ labhate naraḥ । svakarmanirataḥ siddhiṁ yathā vindati tacchṛṇu ॥
भगवद् गीता बताती है कि अपने कर्म में निष्ठा मनुष्य को सिद्धि की ओर ले जाती है।
उपदिशति लोकवृत्तं वितरति वित्तं विनोदयति चित्तम्। उत्तम्भयति महत्त्वं विद्या हृद्या सुराजसेवेव॥
upadiśati lokavṛttaṁ vitarati vittaṁ vinodayati cittam । uttambhayati mahattvaṁ vidyā hṛdyā surājaseveva ॥
हरिहर विद्या को लोक-व्यवहार, समृद्धि, प्रसन्नता और महत्त्व प्रदान करने वाली बताते हैं।