प्रभया हि विनायद्वद् - सूर्य और प्रकाश

14 जुल॰ 2026

प्रभया हि विनायद्वद्भानुरेष न विद्यते। प्रभा च भानुना तेन सुतरां तदुपाश्रया॥

prabhayā hi vināyadvadbhānureṣa na vidyate । prabhā ca bhānunā tena sutarāṃ tadupāśrayā ॥

प्रभया हि विनायद्वद्भानुरेष न का अर्थ

जिस प्रकार सूर्य अपने प्रकाश के बिना दृष्टिगोचर नहीं होता, उसी प्रकार प्रकाश भी सूर्य के बिना अस्तित्व में नहीं रह सकता। इस प्रकार सूर्य और प्रकाश का सम्पूर्ण अस्तित्व एवं शक्ति एक-दूसरे पर पूर्णतः आश्रित हैं।

शब्दार्थ

प्रभयाprabhayā

प्रभा से

प्र + √भा

हि विनाhi vinā

बिना ही

यद्वत्yadvat

जैसे

भानुः एषःbhānur eṣaḥ

यह सूर्य

√भा

न विद्यतेna vidyate

नहीं होता

√विद्

प्रभा चprabhā ca

और प्रभा

प्र + √भा

भानुना तेनbhānunā tena

उसी सूर्य से

√भा

सुतराम्sutarām

और भी अधिक

तदुपाश्रयाtadupāśrayā

उस पर आश्रित

तद् + उप + √श्रि

व्याख्या

यह श्लोक एक सरल किन्तु सटीक चित्र प्रस्तुत करता है—सूर्य अपनी प्रभा से पहचाना जाता है, और प्रभा स्वयं सूर्य से अलग कोई स्वतंत्र आधार नहीं रखती। ‘प्रभा’ अर्थात प्रकाश या तेज, ‘भानु’ अर्थात सूर्य को संसार के लिए दृश्य बनाता है; साथ ही वही प्रकाश सूर्य को ही अपना आश्रय मानता है। इसलिए यह बात निर्बलता की नहीं, परस्पर निर्भरता की है: शक्ति तब सार्थक होती है जब वह प्रकट होती है, और अभिव्यक्ति तब स्थिर रहती है जब वह अपने स्रोत से जुड़ी रहती है। जीवन में यह रूपक हमें बताता है कि पहचान और कर्म, स्रोत और अभिव्यक्ति, सामर्थ्य और सेवा अक्सर अलग-अलग नहीं होते। जो बाहर चमकता है उसे भीतर के आधार से जुड़ा रहना चाहिए, और जो भीतर से शक्तिशाली है वह अपने प्रभावों से ही दिखाई देता है।

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शिव पुराण से और सुभाषित

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13 मई 2026
शिव पुराण

एवं परस्परापेक्षा शक्तिशक्तिमतोः स्थिता। न शिवेन विना शक्तिर्न शक्त्या विना शिवः॥

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2 अक्टू॰ 2026
भगवद् गीता

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