प्रभया हि विनायद्वद्भानुरेष न विद्यते। प्रभा च भानुना तेन सुतरां तदुपाश्रया॥
prabhayā hi vināyadvadbhānureṣa na vidyate । prabhā ca bhānunā tena sutarāṃ tadupāśrayā ॥
प्रभया हि विनायद्वद्भानुरेष न का अर्थ
जिस प्रकार सूर्य अपने प्रकाश के बिना दृष्टिगोचर नहीं होता, उसी प्रकार प्रकाश भी सूर्य के बिना अस्तित्व में नहीं रह सकता। इस प्रकार सूर्य और प्रकाश का सम्पूर्ण अस्तित्व एवं शक्ति एक-दूसरे पर पूर्णतः आश्रित हैं।
शब्दार्थ
- प्रभयाprabhayā
प्रभा से
प्र + √भा
- हि विनाhi vinā
बिना ही
- यद्वत्yadvat
जैसे
- भानुः एषःbhānur eṣaḥ
यह सूर्य
√भा
- न विद्यतेna vidyate
नहीं होता
√विद्
- प्रभा चprabhā ca
और प्रभा
प्र + √भा
- भानुना तेनbhānunā tena
उसी सूर्य से
√भा
- सुतराम्sutarām
और भी अधिक
- तदुपाश्रयाtadupāśrayā
उस पर आश्रित
तद् + उप + √श्रि
व्याख्या
यह श्लोक एक सरल किन्तु सटीक चित्र प्रस्तुत करता है—सूर्य अपनी प्रभा से पहचाना जाता है, और प्रभा स्वयं सूर्य से अलग कोई स्वतंत्र आधार नहीं रखती। ‘प्रभा’ अर्थात प्रकाश या तेज, ‘भानु’ अर्थात सूर्य को संसार के लिए दृश्य बनाता है; साथ ही वही प्रकाश सूर्य को ही अपना आश्रय मानता है। इसलिए यह बात निर्बलता की नहीं, परस्पर निर्भरता की है: शक्ति तब सार्थक होती है जब वह प्रकट होती है, और अभिव्यक्ति तब स्थिर रहती है जब वह अपने स्रोत से जुड़ी रहती है। जीवन में यह रूपक हमें बताता है कि पहचान और कर्म, स्रोत और अभिव्यक्ति, सामर्थ्य और सेवा अक्सर अलग-अलग नहीं होते। जो बाहर चमकता है उसे भीतर के आधार से जुड़ा रहना चाहिए, और जो भीतर से शक्तिशाली है वह अपने प्रभावों से ही दिखाई देता है।
मूल पोस्ट
शिव पुराण से और सुभाषित
स्रोत पृष्ठ देखेंएवं परस्परापेक्षा शक्तिशक्तिमतोः स्थिता। न शिवेन विना शक्तिर्न शक्त्या विना शिवः॥
evaṁ parasparāpekṣā śaktiśaktimatoḥ sthitā । na śivena vinā śaktirna śaktyā vinā śivaḥ ॥
शक्ति और सामर्थ्य परस्पर पूरक हैं — जैसे शिव के बिना शक्ति नहीं और शक्ति के बिना शिव नहीं, वैसे ही सामर्थ्य और ऊर्जा के समन्वय से ही सृजन, प्रगति और सफलता संभव होती है।
ज्ञान पर और सुभाषित
विषय पृष्ठ देखेंअद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च। निर्ममो निरहङ्कारः समदुःखसुखः क्षमी॥
adveṣṭā sarvabhūtānāṃ maitraḥ karuṇa eva ca । nirmamo nirahaṅkāraḥ samaduḥkhasukhaḥ kṣamī ॥
भगवद् गीता द्वेष और अहंकार से मुक्त, सभी प्राणियों के प्रति मैत्री रखने वाले और सुख-दुःख में सम रहने वाले व्यक्ति के गुण बताती है।
सुखोपविष्टास्ते तत्र पुण्यां चक्रुः कथामिमाम्। धर्मार्थकाममोक्षाणामारोग्यं मूलमुत्तमम्॥
sukhopaviṣṭās te tatra puṇyāṃ cakruḥ kathām imām । dharmārthakāmamokṣāṇām ārogyaṃ mūlam uttamam ॥
चरक संहिता आरोग्य को धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष इन चारों पुरुषार्थों की प्राप्ति का सर्वोत्तम आधार बताती है।
अनादिरप्रमेयश्च अरूपश्च जयाजयः। लोकरूपो जगन्नाथः विश्वकर्मन्नमो नमः॥
anādir aprameyaś ca arūpaś ca jayājayaḥ । lokarūpo jagannāthaḥ viśvakarman namo namaḥ ॥
विश्वकर्माष्टकम् का यह श्लोक अनादि, अप्रमेय और अरूप प्रभु को नमन करता है, जिनका स्वरूप सम्पूर्ण जगत है।