सामंजस्य पर सुभाषित

17 सुभाषित इस विषय पर

यह विषय 6 स्रोतों से आए 17 सुभाषितों को एक साथ लाता है।

नवीनतम अद्यतन: 5 अक्टू॰ 2026

2 अक्टू॰ 2026
भगवद् गीता

अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च। निर्ममो निरहङ्कारः समदुःखसुखः क्षमी॥

adveṣṭā sarvabhūtānāṃ maitraḥ karuṇa eva ca । nirmamo nirahaṅkāraḥ samaduḥkhasukhaḥ kṣamī ॥

भगवद् गीता द्वेष और अहंकार से मुक्त, सभी प्राणियों के प्रति मैत्री रखने वाले और सुख-दुःख में सम रहने वाले व्यक्ति के गुण बताती है।

चरित्रविनम्रतासामंजस्य
15 सित॰ 2026
अथर्ववेद

सहृदयं सांमनस्यमविद्वेषं कृणोमि वः। अन्यो अन्यमभि हर्यत वत्सं जातमिवाघ्न्या॥

sahṛdayaṁ sāṃmanasyam avidveṣaṁ kṛṇomi vaḥ । anyo anyam abhi haryata vatsaṁ jātam ivāghnyā ॥

अथर्ववेद का यह मंत्र सहृदयता, सांमनस्य और द्वेषमुक्त जीवन का आह्वान करते हुए नवजात बछड़े के प्रति गाय के स्नेह को आदर्श बनाता है।

एकतासामंजस्यअहिंसा
11 सित॰ 2026
गरुड पुराण

सद्भिरेव सहासीत सद्भिः कुर्वीत सङ्गतिम्। सद्भिर्विवादं मैत्रीं च नासद्भिः किञ्चिदाचरेत्॥

sadbhir eva sahāsīta sadbhiḥ kurvīta saṅgatim । sadbhir vivādaṃ maitrīṃ ca nāsadbhiḥ kiṃcid ācaret ॥

गरुड पुराण का यह श्लोक सज्जनों के साथ रहने, संवाद करने और मैत्री रखने की सीख देता है।

नैतिकताचरित्रसामंजस्य
17 अग॰ 2026
ऋग्वेद

समानी व आकूतिः समाना हृदयानि वः। समानमस्तु वो मनो यथा वः सुसहासति॥

samānī va ākūtiḥ samānā hṛdayāni vaḥ । samānam astu vo mano yathā vaḥ susahāsati ॥

ऋग्वेद का अंतिम मंत्र समान संकल्प, समान हृदय और समान मन की कामना करता है, जिससे सब परस्पर सौहार्द के साथ मिलकर रह सकें।

एकतासामंजस्य
12 अग॰ 2026
विदुर नीति

चक्षुषा मनसा वाचा कर्मणा च चतुर्विधम्। प्रसादयति यो लोकं तं लोकोऽनुप्रसीदति॥

cakṣuṣā manasā vācā karmaṇā ca caturvidham । prasādayati yo lokaṁ taṁ loko'nuprasīdati ॥

विदुर नीति सिखाती है कि जो व्यक्ति दृष्टि, विचार, वाणी और कर्म से लोगों को प्रसन्न करता है, उसे लोगों का सद्भाव भी प्राप्त होता है।

सामंजस्यकर्म
23 जुल॰ 2026
बृहदारण्यकोपनिषद्

यश्चायमस्मिन्नाकाशे तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषः सर्वानुभूः। यश्चायमस्मिन्नात्मनि तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषः सर्वानुभूः॥

yaścāyamasminnākāśe tejomayo'mṛtamayaḥ puruṣaḥ sarvānubhūḥ । yaścāyamasminnātmani tejomayo'mṛtamayaḥ puruṣaḥ sarvānubhūḥ ॥

बृहदारण्यकोपनिषद् से निर्मित यह संयुक्त पाठ आकाश में स्थित तेजोमय, अमृतमय सत्ता और आत्मा में उपस्थित उसी सत्य की एकता व्यक्त करता है।

आध्यात्मिकतासामंजस्य
14 जुल॰ 2026
शिव पुराण

प्रभया हि विनायद्वद्भानुरेष न विद्यते। प्रभा च भानुना तेन सुतरां तदुपाश्रया॥

prabhayā hi vināyadvadbhānureṣa na vidyate । prabhā ca bhānunā tena sutarāṃ tadupāśrayā ॥

यह संस्कृत सुभाषित सूर्य और उसके प्रकाश के माध्यम से अस्तित्व, शक्ति और अभिव्यक्ति की गहरी परस्पर निर्भरता को समझाता है।

ज्ञानसामंजस्यआध्यात्मिकताऊर्जा
30 जून 2026
ऋग्वेद

समानो मन्त्रः समितिः समानी समानं मनः सह चित्तमेषाम्। समानं मन्त्रमभि मन्त्रये वः समानेन वो हविषा जुहोमि॥

samāno mantraḥ samitiḥ samānī samānaṁ manaḥ saha cittameṣām । samānaṁ mantram abhi mantraye vaḥ samānena vo haviṣā juhomi ॥

ऋग्वेद का यह मंत्र समान संकल्प, सौहार्दपूर्ण सभा, एकचित्त मन और साझा उद्देश्य से मिलकर कार्य करने की प्रेरणा देता है।

एकतासामंजस्यआध्यात्मिकता
26 जून 2026
ऋग्वेद

सं गच्छध्वं सं वदध्वं सं वो मनांसि जानताम्। देवा भागं यथा पूर्वे संजानाना उपासते॥

saṃ gacchadhvaṃ saṃ vadadhvaṃ saṃ vo manāṃsi jānatām । devā bhāgaṃ yathā pūrve saṃjānānā upāsate ॥

ऋग्वेद का यह मंत्र साथ चलने, साथ बोलने और विचारों में सामंजस्य रखते हुए एकता से कर्म करने की प्रेरणा देता है।

एकतासामंजस्यकर्तव्य
5 जून 2026
ऋग्वेद

मधु वाता ऋतायते मधु क्षरन्ति सिन्धवः। माध्वीर्नः सन्त्वोषधीः॥

madhu vātā ṛtāyate madhu kṣaranti sindhavaḥ । mādhvīr naḥ santv oṣadhīḥ ॥

ऋग्वेद का यह मंत्र वायु, नदियों, औषधियों और वनस्पतियों को मधुरता, पोषण, आरोग्य और सामंजस्य के स्रोत के रूप में देखता है।

प्रकृतिसंरक्षणसामंजस्यकल्याण
25 मई 2026
ऋग्वेद

शं नो देवः सविता त्रायमाणः शं नो भवन्तूषसो विभातीः। शं नः पर्जन्यो भवतु प्रजाभ्यः शं नः क्षेत्रस्य पतिरस्तु शम्भुः॥

śaṃ no devaḥ savitā trāyamāṇaḥ śaṃ no bhavantūṣaso vibhātīḥ । śaṃ naḥ parjanyo bhavatu prajābhyaḥ śaṃ naḥ kṣetrasya patir astu śambhuḥ ॥

ऋग्वेद का यह मंत्र सविता, उषा, पर्जन्य और क्षेत्रपति से समस्त प्रजा, कृषि और धरती के लिए मंगल, हरियाली और समृद्धि की कामना करता है।

प्रकृतिकृषिकल्याणसामंजस्यसमृद्धि
19 मई 2026
अथर्ववेद

जनं बिभ्रती बहुधा विवाचसं नानाधर्माणं पृथिवी यथौकसम्। सहस्रं धारा द्रविणस्य मे दुहां ध्रुवेव धेनुरनपस्फुरन्ती॥

janaṁ bibhratī bahudhā vivācasaṁ nānādharmāṇaṁ pṛthivī yathaukasam । sahasraṁ dhārā draviṇasya me duhāṁ dhruveva dhenuranapasphurantī ॥

भूमि सूक्त का यह मंत्र पृथ्वी को विविध भाषाओं, परंपराओं और आस्थाओं वाले मानव-समुदाय के साझा घर के रूप में प्रणाम करता है।

विविधताएकताप्रकृतिसामंजस्य
13 मई 2026
शिव पुराण

एवं परस्परापेक्षा शक्तिशक्तिमतोः स्थिता। न शिवेन विना शक्तिर्न शक्त्या विना शिवः॥

evaṁ parasparāpekṣā śaktiśaktimatoḥ sthitā । na śivena vinā śaktirna śaktyā vinā śivaḥ ॥

शक्ति और सामर्थ्य परस्पर पूरक हैं — जैसे शिव के बिना शक्ति नहीं और शक्ति के बिना शिव नहीं, वैसे ही सामर्थ्य और ऊर्जा के समन्वय से ही सृजन, प्रगति और सफलता संभव होती है।

शक्तिसामर्थ्यसामंजस्यआध्यात्मिकता
14 अप्रैल 2026
पञ्चतन्त्र

अयं निजः परो वेति गणना लघुचेतसाम्। उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम्॥

ayaṁ nijaḥ paro veti gaṇanā laghucetasām । udāracaritānāṁ tu vasudhaiva kuṭumbakam ॥

संकुचित मनुष्य लोगों को अपना और पराया मानता है, जबकि उदार हृदय वाला पूरे विश्व को एक परिवार समझता है।

एकताज्ञाननैतिकतासामंजस्य
11 मार्च 2026
ऋग्वेद

स्वस्ति पन्थामनुचरेम सूर्याचन्द्रमसाविव। पुनर्ददाताघ्नता जानता सङ्गमेमहि॥

svasti panthām anucarema sūryācandramasāviva । punardadatāghnatā jānatā saṅgamemahi ॥

सूर्य और चंद्रमा के समान सदैव कल्याणकारी मार्ग पर चलने और परस्पर सद्भाव के साथ उन्नति की ओर अग्रसर होने का ऋग्वैदिक आह्वान।

सामंजस्यएकताकल्याणअहिंसा
3 मार्च 2026
महाभारत

निर्वनो वध्यते व्याघ्रो निर्व्याघ्रं छिद्यते वनम्। तस्माद् व्याघ्रो वनं रक्षेद् वनं व्याघ्रं च पालयेत्॥

nirvano vadhyate vyāghro nirvyāghraṃ chidyate vanam । tasmād vyāghro vanaṃ rakṣed vanaṃ vyāghraṃ ca pālayet ॥

महाभारत का यह श्लोक बाघ और वन के बीच के अन्योन्याश्रित संबंधों को दर्शाता है, जो वन्यजीव संरक्षण की आवश्यकता पर बल देता है।

प्रकृतिसंरक्षणसामंजस्य
6 जन॰ 2026
चाणक्य नीति

प्रियवाक्यप्रदानेन सर्वे तुष्यन्ति जन्तवः। तस्मात् तदेव वक्तव्यं वचने का दरिद्रता॥

priyavākyapradānena sarve tuṣyanti jantavaḥ । tasmāt tadeva vaktavyaṁ vacane kā daridratā ॥

प्रिय और मधुर वचन सभी को प्रसन्न करते हैं। यह श्लोक हमें सिखाता है कि जब मधुर वचन बोलने में कुछ खर्च नहीं होता, तो बोलने में कंजूसी क्यों करनी चाहिए?

नैतिकताचरित्रसामंजस्य