चक्षुषा मनसा वाचा - चार प्रकार के व्यवहार से पारस्परिक सद्भाव

12 अग॰ 2026

चक्षुषा मनसा वाचा कर्मणा च चतुर्विधम्। प्रसादयति यो लोकं तं लोकोऽनुप्रसीदति॥

cakṣuṣā manasā vācā karmaṇā ca caturvidham । prasādayati yo lokaṁ taṁ loko'nuprasīdati ॥

प्रधानमंत्री का संदेश

हमारे युवा साथी देश का भविष्य ही नहीं, वर्तमान की सबसे बड़ी शक्ति भी हैं। उन्होंने अपनी संवेदनशीलता, सेवाभाव और सामर्थ्य से दुनियाभर में अलग पहचान बनाई है।

चक्षुषा मनसा वाचा कर्मणा का अर्थ

जो व्यक्ति अपनी दृष्टि, विचार, वाणी और कर्मों के माध्यम से लोगों का हृदय जीत लेता है, वह ही उनके विश्वास, सम्मान और सद्भाव का पात्र बनता है।

शब्दार्थ

चक्षुषाcakṣuṣā

दृष्टि से

√चक्ष्

मनसाmanasā

मन से

मनस्

वाचाvācā

वाणी से

√वच्

कर्मणाkarmaṇā

कर्म से

√कृ

चca

और

चतुर्विधम्caturvidham

चार प्रकार से

चतुर् + विधा

प्रसादयतिprasādayati

प्रसन्न करता है

प्र + √सद्

यःyaḥ

जो

यद्

लोकम्lokam

लोक को

लोक

तम्tam

उसके प्रति

तद्

लोकःlokaḥ

लोक

लोक

अनुप्रसीदतिanuprasīdati

प्रत्युत्तर में प्रसन्न होता है

अनु + प्र + √सद्

व्याख्या

यह श्लोक चार माध्यम बताता है, जिनसे मनुष्य लोगों में सद्भाव उत्पन्न कर सकता है—दृष्टि या देखने के ढंग से, मन से, वाणी से और कर्म से। 'प्रसादयति' प्रसन्न करने अथवा अनुकूल भाव जगाने का अर्थ देता है, जबकि 'अनुप्रसीदति' बताता है कि वही अनुकूलता प्रत्युत्तर में उस व्यक्ति की ओर लौटती है। इसका केंद्रीय विचार पारस्परिकता है: मनुष्य संसार के प्रति जैसा भाव और व्यवहार रखता है, वह लोगों की प्रतिक्रिया को भी प्रभावित करता है। मन के आंतरिक भाव को वाणी और कर्म जैसे प्रत्यक्ष माध्यमों के साथ रखकर श्लोक पूरे व्यक्तित्व से सद्भाव विकसित करने की शिक्षा देता है। प्रधानमंत्री का संदेश इस शिक्षा को युवाओं की संवेदनशीलता, सेवाभाव और सामर्थ्य से जोड़ता है, जो वर्तमान को भी शक्ति देते हैं और भविष्य को भी दिशा देते हैं।

स्रोत और पाठभेद

मूल पोस्ट

पोस्ट लोड हो रहा है...
इन चयनित श्लोक पृष्ठों में शामिल

विदुर नीति से और सुभाषित

स्रोत पृष्ठ देखें
7 अक्टू॰ 2026
महाभारत

नित्यं परिचरेच्चैव तद्वै सुकृतमुत्तमम्। कीर्तिं पुण्यं यशो लोकान् प्राप्स्यसे राजसत्तम॥

nityaṃ paricareccaiva tadvai sukṛtamuttamam । kīrtiṃ puṇyaṃ yaśo lokān prāpsyase rājasattama ॥

नित्य सेवा को श्रेष्ठ पुण्य कर्म बताया गया है, जिससे कीर्ति, यश और उत्तम लोकों की प्राप्ति होती है।

कर्तव्यकर्मसफलता
5 अक्टू॰ 2026
हितोपदेश

शुचित्वं त्यागिता शौर्यं सामान्यं सुखदुःखयोः। दाक्षिण्यं चानुरक्तिश्च सत्यता च सुहृद्गुणाः॥

śucitvaṃ tyāgitā śauryaṃ sāmānyaṃ sukhaduḥkhayoḥ । dākṣiṇyaṃ cānuraktiśca satyatā ca suhṛdguṇāḥ ॥

निर्मलता, त्याग, साहस, सुख-दुःख में समान भाव, शिष्टता, अनुराग और सत्यता सच्चे मित्र के गुण हैं।

चरित्रनैतिकतासाहस
2 अक्टू॰ 2026
भगवद् गीता

अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च। निर्ममो निरहङ्कारः समदुःखसुखः क्षमी॥

adveṣṭā sarvabhūtānāṃ maitraḥ karuṇa eva ca । nirmamo nirahaṅkāraḥ samaduḥkhasukhaḥ kṣamī ॥

भगवद् गीता द्वेष और अहंकार से मुक्त, सभी प्राणियों के प्रति मैत्री रखने वाले और सुख-दुःख में सम रहने वाले व्यक्ति के गुण बताती है।

चरित्रविनम्रतासामंजस्य

सामंजस्य पर और सुभाषित

विषय पृष्ठ देखें
7 अक्टू॰ 2026
महाभारत

नित्यं परिचरेच्चैव तद्वै सुकृतमुत्तमम्। कीर्तिं पुण्यं यशो लोकान् प्राप्स्यसे राजसत्तम॥

nityaṃ paricareccaiva tadvai sukṛtamuttamam । kīrtiṃ puṇyaṃ yaśo lokān prāpsyase rājasattama ॥

नित्य सेवा को श्रेष्ठ पुण्य कर्म बताया गया है, जिससे कीर्ति, यश और उत्तम लोकों की प्राप्ति होती है।

कर्तव्यकर्मसफलता
2 अक्टू॰ 2026
भगवद् गीता

अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च। निर्ममो निरहङ्कारः समदुःखसुखः क्षमी॥

adveṣṭā sarvabhūtānāṃ maitraḥ karuṇa eva ca । nirmamo nirahaṅkāraḥ samaduḥkhasukhaḥ kṣamī ॥

भगवद् गीता द्वेष और अहंकार से मुक्त, सभी प्राणियों के प्रति मैत्री रखने वाले और सुख-दुःख में सम रहने वाले व्यक्ति के गुण बताती है।

चरित्रविनम्रतासामंजस्य
30 सित॰ 2026
भगवद् गीता

स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः संसिद्धिं लभते नरः। स्वकर्मनिरतः सिद्धिं यथा विन्दति तच्छृणु॥

sve sve karmaṇyabhirataḥ saṁsiddhiṁ labhate naraḥ । svakarmanirataḥ siddhiṁ yathā vindati tacchṛṇu ॥

भगवद् गीता बताती है कि अपने कर्म में निष्ठा मनुष्य को सिद्धि की ओर ले जाती है।

कर्मकर्तव्यसफलता