विदुर नीति से सुभाषित

विदुर नीति के ज्ञान, नेतृत्व, निर्णय, पुरुषार्थ और चरित्र संबंधी श्लोक संस्कृत पाठ तथा हिन्दी-अंग्रेज़ी अर्थ सहित पढ़ें।

विदुर नीति महाभारत के उद्योग पर्व में चिंतित राजा धृतराष्ट्र को विदुर द्वारा दिया गया परामर्श है, जब कुरु संघर्ष युद्ध की ओर बढ़ रहा था। यह संवाद राजनीतिक संकट में स्थित है, किंतु उसके विचार व्यक्तिगत आचरण, विवेक, वाणी, मैत्री, समृद्धि और ज्ञानी व्यक्ति के स्वभाव तक विस्तृत हैं।

विदुर ऐसे सलाहकार के रूप में बोलते हैं जो नैतिक सिद्धांत और उसकी अवहेलना के परिणाम दोनों समझता है। इसलिए उनका परामर्श स्पष्ट दृष्टि, योग्य व्यक्तियों का चयन, विचार के बाद कर्म, आश्रितों की रक्षा तथा क्रोध, अहंकार और पक्षपात से बचने पर विशेष बल देता है।

सत्ता को संबोधित विवेक

संवाद का प्रसंग महत्वपूर्ण है: धृतराष्ट्र उचित परामर्श को बार-बार पहचानते हैं, किंतु पुत्र-मोह के विरुद्ध कर्म नहीं कर पाते। इस प्रकार विदुर नीति दिखाती है कि जब इच्छा और भय निर्णय पर हावी हों, तब केवल उचित बात जान लेना पर्याप्त नहीं होता।

यहाँ चुने गए पद्य निरंतर पुरुषार्थ, आत्मज्ञान, उचित निर्णय, धर्मसम्मत समृद्धि, धैर्य और ज्ञानी तथा समर्थ व्यक्ति की पहचान पर बल देते हैं।

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इस संग्रह में विदुर नीति के श्लोक

इन पद्यों को विदुर नीति के अंतर्गत रखते हुए महाभारत के साथ उनका मूल संबंध भी सुरक्षित रखा गया है।

नवीनतम अद्यतन: 21 सित॰ 2026

21 सित॰ 2026
विदुर नीति

एको धर्मः परं श्रेयः क्षमैका शान्तिरुत्तमा। विद्यैका परमा तृप्तिरहिंसैका सुखावहा॥

eko dharmaḥ paraṁ śreyaḥ kṣamaikā śāntir uttamā । vidyaikā paramā tṛptir ahiṁsaikā sukhāvahā ॥

महाभारत की विदुर नीति का यह श्लोक चार गुणों को उनके फल से जोड़ता है: धर्म परम कल्याण देता है, क्षमा उत्तम शांति, विद्या सच्ची तृप्ति और अहिंसा स्थाई सुख।

धर्मशांतिविद्याअहिंसा
1 सित॰ 2026
विदुर नीति

यस्य कृत्यं न जानन्ति मन्त्रं वा मन्त्रितं परे। कृतमेवास्य जानन्ति स वै पण्डित उच्यते॥

yasya kṛtyaṃ na jānanti mantraṃ vā mantritaṃ pare । kṛtam evāsya jānanti sa vai paṇḍita ucyate ॥

महाभारत का यह श्लोक उसे पण्डित कहता है जिसकी मन्त्रणा और कार्य पूर्ण होने तक दूसरों को ज्ञात नहीं होते।

ज्ञानकर्म
12 अग॰ 2026
विदुर नीति

चक्षुषा मनसा वाचा कर्मणा च चतुर्विधम्। प्रसादयति यो लोकं तं लोकोऽनुप्रसीदति॥

cakṣuṣā manasā vācā karmaṇā ca caturvidham । prasādayati yo lokaṁ taṁ loko'nuprasīdati ॥

विदुर नीति सिखाती है कि जो व्यक्ति दृष्टि, विचार, वाणी और कर्म से लोगों को प्रसन्न करता है, उसे लोगों का सद्भाव भी प्राप्त होता है।

सामंजस्यकर्म
11 अग॰ 2026
विदुर नीति

अष्टौ गुणाः पुरुषं दीपयन्ति प्रज्ञा सुशीलत्वदमौ श्रुतं च। पराक्रमश्च बहुभाषिता च दानं यथाशक्ति कृतज्ञता च॥

aṣṭau guṇāḥ puruṣaṁ dīpayanti prajñā suśīlatva-damau śrutaṁ ca । parākramaś ca bahubhāṣitā ca dānaṁ yathāśakti kṛtajñatā ca ॥

विदुर नीति का यह श्लोक प्रज्ञा, सदाचार, संयम, ज्ञान, पराक्रम, दान और कृतज्ञता के साथ स्थापित पाठ में मितभाषिता को मनुष्य का प्रकाशक गुण बताता है।

ज्ञानचरित्रअनुशासनविद्यासाहस
24 जुल॰ 2026
विदुर नीति

कर्मणा मनसा वाचा यदभीक्ष्णं निषेवते। तदेवापहरत्येनं तस्मात्कल्याणमाचरेत्॥

karmaṇā manasā vācā yadabhīkṣṇaṃ niṣevate । tadevāpaharatyenaṃ tasmātkalyāṇamācaret ॥

विदुर नीति सिखाती है कि कर्म, मन और वाणी से बार-बार जिस विषय का अभ्यास किया जाता है, वही मनुष्य को अपनी दिशा में ले जाता है; इसलिए कल्याणकारी आचरण करना चाहिए।

कर्मनैतिकताअनुशासन
20 जुल॰ 2026
विदुर नीति

प्राप्यापदं न व्यथते कदाचिदुद्योगमन्विच्छति चाप्रमत्तः। दुःखं च काले सहते महात्मा धुरन्धरस्तस्य जिताः सपत्नाः॥

prāpyāpadaṁ na vyathate kadācidudyogamanvicchati cāpramattaḥ । duḥkhaṁ ca kāle sahate mahātmā dhurandharastasya jitāḥ sapatnāḥ ॥

विदुर नीति का यह श्लोक संकट में अविचल रहकर सावधानीपूर्वक पुरुषार्थ करने और दुःख सहते हुए विजय पाने की शिक्षा देता है।

दृढ़तासाहसअनुशासनसफलता
10 जुल॰ 2026
विदुर नीति

हितं यत्सर्वभूतानामात्मानश्च सुखावहम्। तत्कुर्यादीश्वरे ह्येतन्मूलं सर्वार्थसिद्धये॥

hitaṃ yat sarvabhūtānām ātmānaśca sukhāvaham । tat kuryād īśvare hy etan mūlaṃ sarvārthasiddhaye ॥

महाभारत का यह श्लोक सिखाता है कि वही कर्म श्रेष्ठ है जो सभी प्राणियों के लिए हितकारी हो, आत्मा को शांति दे और ईश्वर-समर्पण से जुड़ा हो।

निःस्वार्थ सेवाधर्मनैतिकताआध्यात्मिकता
29 जून 2026
विदुर नीति

देशाचारान् समयाञ्जातिधर्मान् बुभूषते यस्तु परावरज्ञः। स तत्र तत्राधिगतः सदैव महाजनस्याधिपत्यं करोति॥

deśācārān samayāñ jātidharmān bubhūṣate yastu parāvarajñaḥ । sa tatra tatrādhigataḥ sadaiva mahājanasyādhipatyaṁ karoti ॥

विदुर नीति का यह श्लोक बताता है कि स्थानीय आचार, सामाजिक मर्यादाओं और समुदायों की समझ से विश्वास, सम्मान और प्रभाव प्राप्त होता है।

ज्ञानसंस्कृतिसम्मानचरित्र
9 जून 2026
विदुर नीति

आर्यकर्मणि रज्यन्ते भूतिकर्माणि कुर्वते। हितं च नाभ्यसूयन्ति स वै पण्डित उच्यते॥

āryakarmaṇi rajyante bhūtikarmāṇi kurvate । hitaṃ ca nābhyasūyanti sa vai paṇḍita ucyate ॥

विदुर नीति का यह श्लोक बताता है कि सच्ची बुद्धिमत्ता श्रेष्ठ कर्मों में रुचि, लोककल्याण के प्रति समर्पण और हितकारी कार्यों के प्रति निष्कपट सम्मान में है।

ज्ञाननैतिकताचरित्रकर्तव्य
3 जून 2026
विदुर नीति

धूमायन्ते व्यपेतानि ज्वलन्ति सहितानि च। धृतराष्ट्रोल्मुकानीव ज्ञातयो भरतर्षभ॥

dhūmāyante vyapetāni jvalanti sahitāni ca । dhṛtarāṣṭrolmukānīva jñātayo bharatarṣabha ॥

विदुर नीति का यह श्लोक बिखरी और संगठित लकड़ियों के रूपक से बताता है कि सामूहिकता सुप्त शक्ति को प्रकट और प्रभावी बना देती है।

एकताशक्तिसफलता
2 जून 2026
विदुर नीति

निश्चित्य यः प्रक्रमते नान्तर्वसति कर्मणः। अवन्ध्यकालो वश्यात्मा स वै पण्डित उच्यते॥

niścitya yaḥ prakramate nāntarvasati karmaṇaḥ । avandhyakālo vaśyātmā sa vai paṇḍita ucyate ॥

विदुर नीति का यह श्लोक सच्चे बुद्धिमान व्यक्ति को वह मानता है जो विचारपूर्वक कार्य आरम्भ करे, उसे पूरा करे, समय का सदुपयोग करे और आत्म-संयम बनाए रखे।

ज्ञानअनुशासनदृढ़तासफलता
15 मई 2026
विदुर नीति

यथाशक्ति चिकीर्षन्ति यथाशक्ति च कुर्वते। न किञ्चिदवमन्यन्ते नराः पण्डितबुद्धयः॥

yathāśakti cikīrṣanti yathāśakti ca kurvate । na kiñcidavamanyante narāḥ paṇḍitabuddhayaḥ ॥

विदुर नीति का यह श्लोक बताता है कि सच्ची बुद्धिमत्ता वही है जो यथाशक्ति लक्ष्य निर्धारित करे, अनुशासित कर्म करे और किसी भी बात को तुच्छ न समझे।

ज्ञानसामर्थ्यअनुशासनचरित्र
28 अप्रैल 2026
विदुर नीति

उत्थानं संयमो दाक्ष्यमप्रमादो धृतिः स्मृतिः। समीक्ष्य च समारम्भो विद्धिमूलं भवस्य तु॥

utthānaṁ saṁyamo dākṣyam apramādo dhṛtiḥ smṛtiḥ । samīkṣya ca samārambho viddhi mūlaṁ bhavasya tu ॥

विदुर नीति का यह श्लोक उन्नति के उन सात आधारभूत स्तंभों का वर्णन करता है जो व्यक्ति और राष्ट्र की समृद्धि के लिए अनिवार्य हैं।

अनुशासनसामर्थ्यसफलतादृढ़ताज्ञान
8 अप्रैल 2026
विदुर नीति

आत्मज्ञानं समारम्भस्तितिक्षा धर्मनित्यता। यमर्था नापकर्षन्ति स वै पण्डित उच्यते॥

ātmajñānaṁ samārambhas titikṣā dharmanityatā । yam arthā nāpakarṣanti sa vai paṇḍita ucyate ॥

विदुर नीति का यह श्लोक एक बुद्धिमान व्यक्ति के गुणों का वर्णन करता है: आत्मज्ञान, दृढ़ निश्चय, सहनशीलता और प्रलोभनों से ऊपर उठकर जनकल्याण के मार्ग पर अडिग रहना।

ज्ञानआत्मज्ञानचरित्रधर्मदृढ़ता
3 फ़र॰ 2026
विदुर नीति

श्रीर्मङ्गलात् प्रभवति प्रागल्भ्यात् सम्प्रवर्धते। दाक्ष्यात् तु कुरुते मूलं संयमात् प्रतितिष्ठति॥

śrīrmaṅgalāt prabhavati prāgalbhyāt sampravardhate । dākṣyāt tu kurute mūlaṃ saṃyamāt pratitiṣṭhati ॥

विदुर नीति का यह श्लोक बताता है कि कैसे श्री (लक्ष्मी) शुभ कर्मों से जन्म लेती है और संयम से स्थिर होती है।

समृद्धिसामर्थ्यअनुशासनआत्मविश्वास
31 दिस॰ 2025
विदुर नीति

यथा यथा हि पुरुषः कल्याणे कुरुते मनः। तथा तथाऽस्य सर्वार्थाः सिद्ध्यन्ते नात्र संशयः॥

yathā yathā hi puruṣaḥ kalyāṇe kurute manaḥ । tathā tatha'sya sarvārthāḥ siddhyante nātra saṁśayaḥ ॥

मन जितना कल्याणकारी विचारों की ओर मुड़ता है, आचरण और उसके परिणाम उतने ही उस शुभ संकल्प के अनुरूप होने लगते हैं।

कर्मचरित्रसफलता
24 दिस॰ 2025
विदुर नीति

यस्य कृत्यं न विघ्नन्ति शीतमुष्णं भयं रतिः। समृद्धिरसमृद्धिर्वा स वै पण्डित उच्यते॥

yasya kṛtyaṁ na vighnanti śītamuṣṇaṁ bhayaṁ ratiḥ । samṛddhir asamṛddhir vā sa vai paṇḍita ucyate ॥

सच्चा ज्ञानी सर्दी-गर्मी, भय-इच्छा और संपत्ति-विपत्ति के बीच भी अपने कर्तव्य से विचलित नहीं होता।

ज्ञानदृढ़ताचरित्रअनुशासन
11 दिस॰ 2025
विदुर नीति

सुदुर्बलं नावजानाति कञ्चिद् युक्तो रिपुं सेवते बुद्धिपूर्वम्। न विग्रहं रोचयते बलस्थैः काले च यो विक्रमते स धीरः॥

sudurbalaṃ nāvajānāti kañcid yukto ripuṃ sevate buddhipūrvam । na vigrahaṃ rocayate balasthaiḥ kāle ca yo vikramate sa dhīraḥ ॥

सुदुर्बलं नावजानाति श्लोक के अनुसार सच्चा वीर वही है जो बुद्धि और विवेक से काम लेता है और उचित समय पर ही अपना शौर्य दिखाता है।

ज्ञानसाहसनैतिकताअनुशासन