धूमायन्ते व्यपेतानि - एकता की शक्ति

3 जून 2026

धूमायन्ते व्यपेतानि ज्वलन्ति सहितानि च। धृतराष्ट्रोल्मुकानीव ज्ञातयो भरतर्षभ॥

dhūmāyante vyapetāni jvalanti sahitāni ca । dhṛtarāṣṭrolmukānīva jñātayo bharatarṣabha ॥

प्रधानमंत्री का संदेश

जब नागरिक एकजुटता और आपसी सहयोग के सूत्र में बंधते हैं, तो राष्ट्र की शक्ति कई गुना बढ़ जाती है। भारतवासियों के इसी सामूहिक संकल्प से आज देश उन्नति की नित-नई ऊंचाइयों को छू रहा है।

धूमायन्ते व्यपेतानि ज्वलन्ति सहितानि का अर्थ

जिस प्रकार लकड़ियाँ अलग-अलग होने पर अपनी पूर्ण ऊर्जा प्रकट नहीं कर पातीं, किन्तु एकत्र होने पर प्रज्वलित होकर प्रकाश और ऊष्मा प्रदान करती हैं, उसी प्रकार किसी राज्य की उन्नति, समृद्धि और शक्ति उसके नागरिकों की एकता, पारस्परिक सहयोग तथा सामूहिक संकल्प पर आधारित होती है।

शब्दार्थ

धूमायन्तेdhūmāyante

धुआँ देते हैं

धूम

व्यपेतानिvyapetāni

अलग किए जाने पर

वि + अप + √इ

ज्वलन्तिjvalanti

जलते हैं

√ज्वल्

सहितानिsahitāni

एक साथ होने पर

सह + √धा

चca

और

धृतराष्ट्रdhṛtarāṣṭra

हे धृतराष्ट्र

उल्मुकानिulmukāni

जलती लकड़ियाँ

उल्मुक

इवiva

के समान

ज्ञातयःjñātayaḥ

बन्धुजन

√ज्ञा

भरतर्षभbharatarṣabha

हे भरतश्रेष्ठ

भरत + ऋषभ

व्याख्या

अपने मूल प्रसंग में यह श्लोक विदुर द्वारा धृतराष्ट्र को दिया गया उपदेश है। यहाँ 'ज्ञातयः' शब्द मूल रूप से संबंधियों या कुल-बंधुओं के लिए आया है, और अलग-अलग तथा साथ रखी हुई लकड़ियों की उपमा यह बताती है कि बँटा हुआ परिवार या कुल अपनी शक्ति खो देता है, जबकि एकजुट होकर वही शक्ति प्रकाशमान हो उठती है। यह श्लोक एक सरल लेकिन अत्यंत प्रभावी रूपक देता है: अलग-अलग पड़ी लकड़ियाँ केवल धुआँ देती हैं, पर साथ रखे जाने पर वे तेजस्वी अग्नि बनकर प्रकाश और ऊष्मा देती हैं। यह उपमा एकता को केवल भावनात्मक आदर्श नहीं, बल्कि व्यवहारिक शक्ति के रूप में प्रस्तुत करती है। आधुनिक नागरिक संदर्भ में यही शिक्षा संबंधियों से आगे बढ़कर साझा उत्तरदायित्व से जुड़े नागरिकों पर भी लागू होती है। राष्ट्र के संदर्भ में एकता व्यक्ति की शक्ति को मिटाती नहीं, बल्कि बिखरी हुई शक्तियों को प्रगति, संरक्षण और समृद्धि की सामूहिक ऊर्जा में बदल देती है।

मूल पोस्ट

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विदुर नीति से और सुभाषित

स्रोत पृष्ठ देखें
7 अक्टू॰ 2026
महाभारत

नित्यं परिचरेच्चैव तद्वै सुकृतमुत्तमम्। कीर्तिं पुण्यं यशो लोकान् प्राप्स्यसे राजसत्तम॥

nityaṃ paricareccaiva tadvai sukṛtamuttamam । kīrtiṃ puṇyaṃ yaśo lokān prāpsyase rājasattama ॥

नित्य सेवा को श्रेष्ठ पुण्य कर्म बताया गया है, जिससे कीर्ति, यश और उत्तम लोकों की प्राप्ति होती है।

कर्तव्यकर्मसफलता
5 अक्टू॰ 2026
हितोपदेश

शुचित्वं त्यागिता शौर्यं सामान्यं सुखदुःखयोः। दाक्षिण्यं चानुरक्तिश्च सत्यता च सुहृद्गुणाः॥

śucitvaṃ tyāgitā śauryaṃ sāmānyaṃ sukhaduḥkhayoḥ । dākṣiṇyaṃ cānuraktiśca satyatā ca suhṛdguṇāḥ ॥

निर्मलता, त्याग, साहस, सुख-दुःख में समान भाव, शिष्टता, अनुराग और सत्यता सच्चे मित्र के गुण हैं।

चरित्रनैतिकतासाहस
2 अक्टू॰ 2026
भगवद् गीता

अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च। निर्ममो निरहङ्कारः समदुःखसुखः क्षमी॥

adveṣṭā sarvabhūtānāṃ maitraḥ karuṇa eva ca । nirmamo nirahaṅkāraḥ samaduḥkhasukhaḥ kṣamī ॥

भगवद् गीता द्वेष और अहंकार से मुक्त, सभी प्राणियों के प्रति मैत्री रखने वाले और सुख-दुःख में सम रहने वाले व्यक्ति के गुण बताती है।

चरित्रविनम्रतासामंजस्य

एकता पर और सुभाषित

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12 अक्टू॰ 2026
देवी महात्म्यम्

देव्या यया ततमिदं जगदात्मशक्त्या निश्शेषदेवगणशक्तिसमूहमूर्त्या। तामम्बिकामखिलदेवमहर्षिपूज्यां भक्त्या नताः स्म विदधातु शुभानि सा नः॥

devyā yayā tatamidaṃ jagadātmaśaktyā niśśeṣadevagaṇaśaktisamūhamūrtyā । tāmambikāmakhiladevamaharṣipūjyāṃ bhaktyā natāḥ sma vidadhātu śubhāni sā naḥ ॥

देवी महात्म्यम् की यह प्रार्थना जगत् में व्याप्त और समस्त देवशक्तियों की स्वरूप माँ अम्बिका को नमन करके सबके लिए मंगल माँगती है।

भक्तिशक्तिकल्याण
7 अक्टू॰ 2026
महाभारत

नित्यं परिचरेच्चैव तद्वै सुकृतमुत्तमम्। कीर्तिं पुण्यं यशो लोकान् प्राप्स्यसे राजसत्तम॥

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कर्तव्यकर्मसफलता
30 सित॰ 2026
भगवद् गीता

स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः संसिद्धिं लभते नरः। स्वकर्मनिरतः सिद्धिं यथा विन्दति तच्छृणु॥

sve sve karmaṇyabhirataḥ saṁsiddhiṁ labhate naraḥ । svakarmanirataḥ siddhiṁ yathā vindati tacchṛṇu ॥

भगवद् गीता बताती है कि अपने कर्म में निष्ठा मनुष्य को सिद्धि की ओर ले जाती है।

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