निश्चित्य यः प्रक्रमते - संकल्पित कर्म की बुद्धिमत्ता

2 जून 2026

निश्चित्य यः प्रक्रमते नान्तर्वसति कर्मणः। अवन्ध्यकालो वश्यात्मा स वै पण्डित उच्यते॥

niścitya yaḥ prakramate nāntarvasati karmaṇaḥ । avandhyakālo vaśyātmā sa vai paṇḍita ucyate ॥

प्रधानमंत्री का संदेश

दृढ़ निश्चय और आत्म-संयम वह शक्ति है, जो कठिन से कठिन राह को भी आसान बना देती है। आज हमारे युवा साथी इसी संकल्प के साथ राष्ट्र निर्माण में निरंतर जुटे हुए हैं।

निश्चित्य यः प्रक्रमते नान्तर्वसति का अर्थ

जो व्यक्ति किसी कार्य को भली-भांति सोच-समझकर दृढ़ निश्चय के साथ आरम्भ करता है और उसे बीच में अधूरा नहीं छोड़ता, जो समय का सदुपयोग करता है तथा अपनी इन्द्रियों पर पूर्ण नियंत्रण रखता है-ऐसा व्यक्ति ही वास्तव में बुद्धिमान होता है।

शब्दार्थ

निश्चित्यniścitya

निश्चय कर

निस् + √चि

यःyaḥ

जो

यद्

प्रक्रमतेprakramate

आरम्भ करता है

प्र + √क्रम्

न अन्तर्वसतिnāntarvasati

बीच में नहीं रुकता

अन्तर् + √वस्

कर्मणःkarmaṇaḥ

कर्म से

√कृ

अवन्ध्यकालःavandhyakālaḥ

जिसका समय व्यर्थ नहीं

अ + वन्ध्य + काल

वश्यात्माvaśyātmā

आत्मसंयमी

वश + आत्मन्

सः वै पण्डितः उच्यतेsa vai paṇḍita ucyate

वही पण्डित कहा जाता है

पण्डा + √वच्

व्याख्या

यह श्लोक बुद्धिमत्ता को केवल ज्ञान के रूप में नहीं, बल्कि अनुशासित कर्म के रूप में परिभाषित करता है। पण्डित पहले विचारपूर्वक निश्चय करता है, फिर कार्य आरम्भ करता है, और आरम्भ करने के बाद उसे बीच में अधूरा छोड़कर नहीं बैठता। 'अवन्ध्यकालः' का अर्थ है वह व्यक्ति जिसका समय निष्फल नहीं जाता, बल्कि उद्देश्यपूर्ण कर्म से सार्थक बनता है। 'वश्यात्मा' इसका आंतरिक पक्ष बताता है: बुद्धिमान व्यक्ति अपने मन, इन्द्रियों और आवेगों को वश में रखता है। इस प्रकार यह श्लोक व्यावहारिक बुद्धि का पूरा स्वरूप देता है: आरम्भ से पहले स्पष्टता, कर्म के दौरान स्थिरता, समय का सदुपयोग और निरंतर आत्म-संयम। युवा शक्ति और राष्ट्र-निर्माण के संदर्भ में यह शिक्षा संकल्प को निरंतर, संयमित और फलदायी प्रयास में बदलने का आह्वान करती है।

मूल पोस्ट

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विदुर नीति से और सुभाषित

स्रोत पृष्ठ देखें
7 अक्टू॰ 2026
महाभारत

नित्यं परिचरेच्चैव तद्वै सुकृतमुत्तमम्। कीर्तिं पुण्यं यशो लोकान् प्राप्स्यसे राजसत्तम॥

nityaṃ paricareccaiva tadvai sukṛtamuttamam । kīrtiṃ puṇyaṃ yaśo lokān prāpsyase rājasattama ॥

नित्य सेवा को श्रेष्ठ पुण्य कर्म बताया गया है, जिससे कीर्ति, यश और उत्तम लोकों की प्राप्ति होती है।

कर्तव्यकर्मसफलता
2 अक्टू॰ 2026
भगवद् गीता

अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च। निर्ममो निरहङ्कारः समदुःखसुखः क्षमी॥

adveṣṭā sarvabhūtānāṃ maitraḥ karuṇa eva ca । nirmamo nirahaṅkāraḥ samaduḥkhasukhaḥ kṣamī ॥

भगवद् गीता द्वेष और अहंकार से मुक्त, सभी प्राणियों के प्रति मैत्री रखने वाले और सुख-दुःख में सम रहने वाले व्यक्ति के गुण बताती है।

चरित्रविनम्रतासामंजस्य
30 सित॰ 2026
भगवद् गीता

स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः संसिद्धिं लभते नरः। स्वकर्मनिरतः सिद्धिं यथा विन्दति तच्छृणु॥

sve sve karmaṇyabhirataḥ saṁsiddhiṁ labhate naraḥ । svakarmanirataḥ siddhiṁ yathā vindati tacchṛṇu ॥

भगवद् गीता बताती है कि अपने कर्म में निष्ठा मनुष्य को सिद्धि की ओर ले जाती है।

कर्मकर्तव्यसफलता

ज्ञान पर और सुभाषित

विषय पृष्ठ देखें
7 अक्टू॰ 2026
महाभारत

नित्यं परिचरेच्चैव तद्वै सुकृतमुत्तमम्। कीर्तिं पुण्यं यशो लोकान् प्राप्स्यसे राजसत्तम॥

nityaṃ paricareccaiva tadvai sukṛtamuttamam । kīrtiṃ puṇyaṃ yaśo lokān prāpsyase rājasattama ॥

नित्य सेवा को श्रेष्ठ पुण्य कर्म बताया गया है, जिससे कीर्ति, यश और उत्तम लोकों की प्राप्ति होती है।

कर्तव्यकर्मसफलता
1 अक्टू॰ 2026
नीतिशतकम्

रत्नैर्महाब्धेस्तुतुषुर्न देवा न भेजिरे भीमविषेण भीतिम्। सुधां विना न प्रययुर्विरामं न निश्चितार्थाद्विरमन्ति धीराः॥

ratnair mahābdhes tutuṣur na devā na bhejire bhīmaviṣeṇa bhītim । sudhāṃ vinā na prayayur virāmaṃ na niścitārthād viramanti dhīrāḥ ॥

भर्तृहरि समुद्र-मन्थन के प्रसंग से बताते हैं कि धीर व्यक्ति न बीच की उपलब्धियों पर रुकते हैं, न संकट के कारण अपने निश्चित लक्ष्य से हटते हैं।

दृढ़तासाहस
30 सित॰ 2026
भगवद् गीता

स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः संसिद्धिं लभते नरः। स्वकर्मनिरतः सिद्धिं यथा विन्दति तच्छृणु॥

sve sve karmaṇyabhirataḥ saṁsiddhiṁ labhate naraḥ । svakarmanirataḥ siddhiṁ yathā vindati tacchṛṇu ॥

भगवद् गीता बताती है कि अपने कर्म में निष्ठा मनुष्य को सिद्धि की ओर ले जाती है।

कर्मकर्तव्यसफलता