उत्थानं संयमो दाक्ष्यम - उन्नति के सात मूल मंत्र

28 अप्रैल 2026

उत्थानं संयमो दाक्ष्यमप्रमादो धृतिः स्मृतिः। समीक्ष्य च समारम्भो विद्धिमूलं भवस्य तु॥

utthānaṁ saṁyamo dākṣyam apramādo dhṛtiḥ smṛtiḥ । samīkṣya ca samārambho viddhi mūlaṁ bhavasya tu ॥

प्रधानमंत्री का संदेश

संयम और समर्पण के साथ किया गया परिश्रम अद्भुत सफलता दे सकता है। इससे राष्ट्र की समृद्धि और सामर्थ्य को भी एक नई ऊर्जा मिलती है।

उत्थानं संयमो दाक्ष्यमप्रमादो धृतिः का अर्थ

उद्यम, संयम, कुशलता, सावधानी, धैर्य, स्मृति और सोच-समझकर किसी कार्य को आरम्भ करना-ये सभी उन्नति के मूल कारण हैं।

शब्दार्थ

उत्थानम्utthānam

उद्यम

उद् + √स्था

संयमःsaṁyamaḥ

संयम

सम् + √यम्

दाक्ष्यम्dākṣyam

दक्षता

दक्ष

अप्रमादःapramādaḥ

अप्रमाद

अ + प्र + √मद्

धृतिःdhṛtiḥ

धृति

√धृ

स्मृतिःsmṛtiḥ

स्मृति

√स्मृ

समीक्ष्यsamīkṣya

भली प्रकार विचार कर

सम् + √ईक्ष्

च समारम्भःca samārambhaḥ

और आरम्भ करना

सम् + आ + √रभ्

विद्धिviddhi

जानो

√विद्

मूलम्mūlam

मूल

मूल

भवस्यbhavasya

उन्नति का

√भू

व्याख्या

यह श्लोक 'विदुर नीति' का अंश है, जहाँ महात्मा विदुर धृतराष्ट्र को जीवन और शासन की सफलता के सूत्र बताते हैं। इसमें उन्नति ('भव') के सात मूल कारणों का विस्तार से वर्णन है। ये सात गुण—पुरुषार्थ, आत्म-संयम, दक्षता, प्रमाद न करना, धैर्य, उत्तम स्मरण शक्ति और सुविचारित योजना—किसी भी कार्य में सिद्धि प्राप्त करने के लिए आधारभूत हैं। यह श्लोक स्पष्ट करता है कि समृद्धि बाहरी परिस्थितियों से अधिक हमारे आंतरिक अनुशासन और रणनीतिक सोच का परिणाम होती है। सूची की अन्तिम वस्तु कोई एक गुण नहीं, एक संयुक्त कर्म है—'समीक्ष्य च समारम्भः', अर्थात् विचार करके आरम्भ करना। विदुर इस युगल को एक ही मद मानते हैं, क्योंकि उनकी व्यवस्था में बिना समीक्षा के आरम्भ करना उस गुण का न्यून रूप नहीं, सर्वथा भिन्न वस्तु है। 'भव', जिसे यहाँ उन्नति कहा गया है, होने या बनने का भाव रखता है—अतः ये छह जिसका मूल कहे गए हैं वह सफलता नहीं, वह अवस्था ही है।

मूल पोस्ट

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विदुर नीति से और सुभाषित

स्रोत पृष्ठ देखें
7 अक्टू॰ 2026
महाभारत

नित्यं परिचरेच्चैव तद्वै सुकृतमुत्तमम्। कीर्तिं पुण्यं यशो लोकान् प्राप्स्यसे राजसत्तम॥

nityaṃ paricareccaiva tadvai sukṛtamuttamam । kīrtiṃ puṇyaṃ yaśo lokān prāpsyase rājasattama ॥

नित्य सेवा को श्रेष्ठ पुण्य कर्म बताया गया है, जिससे कीर्ति, यश और उत्तम लोकों की प्राप्ति होती है।

कर्तव्यकर्मसफलता
2 अक्टू॰ 2026
भगवद् गीता

अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च। निर्ममो निरहङ्कारः समदुःखसुखः क्षमी॥

adveṣṭā sarvabhūtānāṃ maitraḥ karuṇa eva ca । nirmamo nirahaṅkāraḥ samaduḥkhasukhaḥ kṣamī ॥

भगवद् गीता द्वेष और अहंकार से मुक्त, सभी प्राणियों के प्रति मैत्री रखने वाले और सुख-दुःख में सम रहने वाले व्यक्ति के गुण बताती है।

चरित्रविनम्रतासामंजस्य
30 सित॰ 2026
भगवद् गीता

स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः संसिद्धिं लभते नरः। स्वकर्मनिरतः सिद्धिं यथा विन्दति तच्छृणु॥

sve sve karmaṇyabhirataḥ saṁsiddhiṁ labhate naraḥ । svakarmanirataḥ siddhiṁ yathā vindati tacchṛṇu ॥

भगवद् गीता बताती है कि अपने कर्म में निष्ठा मनुष्य को सिद्धि की ओर ले जाती है।

कर्मकर्तव्यसफलता

अनुशासन पर और सुभाषित

विषय पृष्ठ देखें
7 अक्टू॰ 2026
महाभारत

नित्यं परिचरेच्चैव तद्वै सुकृतमुत्तमम्। कीर्तिं पुण्यं यशो लोकान् प्राप्स्यसे राजसत्तम॥

nityaṃ paricareccaiva tadvai sukṛtamuttamam । kīrtiṃ puṇyaṃ yaśo lokān prāpsyase rājasattama ॥

नित्य सेवा को श्रेष्ठ पुण्य कर्म बताया गया है, जिससे कीर्ति, यश और उत्तम लोकों की प्राप्ति होती है।

कर्तव्यकर्मसफलता
6 अक्टू॰ 2026
समराङ्गणसूत्रधार

ज्ञानवांश्च तथा वाग्मी कर्मस्वपि च निष्ठितः। एवं युक्तोऽपि न श्रेयान् यदि शीलविवर्जितः॥

jñānavāṃśca tathā vāgmī karmasvapi ca niṣṭhitaḥ । evaṃ yukto'pi na śreyān yadi śīlavivarjitaḥ ॥

ज्ञान, वाक्पटुता और कर्मकुशलता होने पर भी सदाचार से रहित व्यक्ति श्रेष्ठ नहीं होता।

विद्यासामर्थ्यचरित्रनैतिकता
1 अक्टू॰ 2026
नीतिशतकम्

रत्नैर्महाब्धेस्तुतुषुर्न देवा न भेजिरे भीमविषेण भीतिम्। सुधां विना न प्रययुर्विरामं न निश्चितार्थाद्विरमन्ति धीराः॥

ratnair mahābdhes tutuṣur na devā na bhejire bhīmaviṣeṇa bhītim । sudhāṃ vinā na prayayur virāmaṃ na niścitārthād viramanti dhīrāḥ ॥

भर्तृहरि समुद्र-मन्थन के प्रसंग से बताते हैं कि धीर व्यक्ति न बीच की उपलब्धियों पर रुकते हैं, न संकट के कारण अपने निश्चित लक्ष्य से हटते हैं।

दृढ़तासाहस