छायामन्यस्य कुर्वन्ति - वृक्ष और सत्पुरुष

27 अप्रैल 2026

छायामन्यस्य कुर्वन्ति तिष्ठन्ति स्वयमातपे। फलान्यपि परार्थाय वृक्षाः सत्पुरुषा इव॥

chāyāmanyasya kurvanti tiṣṭhanti svayamātape । phalānyapi parārthāya vṛkṣāḥ satpuruṣā iva ॥

प्रधानमंत्री का संदेश

राष्ट्र की असली शक्ति उसके नागरिकों की निःस्वार्थ सेवा भावना में निहित है। इससे लोग एक दूसरे से प्रेरित होते हैं, साथ ही हमारा समाज भी और समृद्ध होता है।

छायामन्यस्य कुर्वन्ति तिष्ठन्ति स्वयमातपे का अर्थ

वृक्ष स्वयं कड़ी धूप सहते हैं, लेकिन दूसरों को छाया देते हैं। उनके फल भी दूसरों के लिए ही होते हैं। वृक्ष निःस्वार्थ भाव वाले उन सज्जन पुरुषों के समान ही होते हैं, जो सदैव लोगों को सुविधाएं प्रदान करते हैं।

शब्दार्थ

छायाम्chāyām

छाया

छाया

अन्यस्यanyasya

दूसरे के लिए

अन्य

कुर्वन्तिkurvanti

करते हैं

√कृ

तिष्ठन्तिtiṣṭhanti

खड़े रहते हैं

√स्था

स्वयम्svayam

स्वयं

स्वयम्

आतपेātape

धूप में

आ + √तप्

फलानिphalāni

फल

फल

अपिapi

भी

अपि

परार्थायparārthāya

दूसरों के लिए

पर + अर्थ

वृक्षाःvṛkṣāḥ

वृक्ष

वृक्ष

सत्पुरुषाःsatpuruṣāḥ

सज्जन पुरुष

सत् + पुरुष

इवiva

के समान

इव

व्याख्या

यह श्लोक 'परोपकार' के सार को वृक्ष के माध्यम से समझाता है। जैसे वृक्ष स्वयं 'आतप' (धूप) सहकर दूसरों को 'छाया' देता है, वैसे ही एक सत्पुरुष दूसरों के सुख के लिए स्वयं संघर्ष स्वीकार करता है। यह संदेश देता है कि जीवन की सार्थकता तभी है जब उसका उपयोग 'परार्थ' (दूसरों के हित) के लिए किया जाए। उपमा अपेक्षा से उलटी दिशा में चलती है। यह नहीं कहा गया कि सज्जन वृक्ष के समान हैं, अपितु 'वृक्षाः सत्पुरुषा इव'—वृक्ष सज्जनों के समान हैं; अतः वृक्ष को मानव मानदण्ड पर नापा जा रहा है, न कि वृक्ष अपना चित्र मनुष्य को दे रहा है। यह उलटफेर दूसरी पंक्ति को और कठोर बना देता है: परार्थ दिया गया फल आनुषंगिक उदारता नहीं, वृक्ष का सम्पूर्ण प्रयोजन है—और उपमा मनुष्य से भी वही लेखा माँगती है।

मूल पोस्ट

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सुभाषितरत्नभाण्डागारम् से और सुभाषित

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5 अक्टू॰ 2026
हितोपदेश

शुचित्वं त्यागिता शौर्यं सामान्यं सुखदुःखयोः। दाक्षिण्यं चानुरक्तिश्च सत्यता च सुहृद्गुणाः॥

śucitvaṃ tyāgitā śauryaṃ sāmānyaṃ sukhaduḥkhayoḥ । dākṣiṇyaṃ cānuraktiśca satyatā ca suhṛdguṇāḥ ॥

निर्मलता, त्याग, साहस, सुख-दुःख में समान भाव, शिष्टता, अनुराग और सत्यता सच्चे मित्र के गुण हैं।

चरित्रनैतिकतासाहस
29 सित॰ 2026
सुभाषितरत्नभाण्डागारम्

उद्यमः साहसं धैर्यं बुद्धिः शक्तिः पराक्रमः। षडेते यत्र वर्तन्ते तत्र दैवं सहायकृत्॥

udyamaḥ sāhasaṃ dhairyaṃ buddhiḥ śaktiḥ parākramaḥ । ṣaḍete yatra vartante tatra daivaṃ sahāyakṛt ॥

उद्यम, साहस, धैर्य, बुद्धि, शक्ति और पराक्रम से युक्त व्यक्ति को दैव का सहयोग भी प्राप्त होता है।

दृढ़तासाहसविद्याशक्ति
18 सित॰ 2026
आर्यासप्तशती

स्वाधीनैव समृद्धिर्जनोपजीव्यत्वमुच्छ्रयश्छाया। सत्पुंसो मरुभूरिव जीवनमात्रं समाशास्यम्॥

svādhīnaiva samṛddhir janopajīvyatvam ucchrayaś chāyā । satpuṃso marubhūr iva jīvanamātraṁ samāśāsyam ॥

मरुभूमि में खड़े वृक्ष की तरह सत्पुरुष के लिए स्वाधीन समृद्धि, दूसरों का आधार, ऊँचाई और छाया सहज हैं, इसलिए उसका जीवित रहना ही कामना के योग्य है।

चरित्रनिःस्वार्थ सेवास्वतंत्रतासमृद्धि

निःस्वार्थ सेवा पर और सुभाषित

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8 अक्टू॰ 2026

भस्मीकृतस्वार्थसौख्यपरिचर्चितविग्रहाः। स्वराज्ययोगनिर्मग्ना धन्यास्ते वीरयोगिनः॥

bhasmīkṛtasvārthasaukhyaparicarcitavigrahāḥ । svarājyayoganirmagnā dhanyās te vīrayoginaḥ ॥

यह श्लोक उन वीर साधकों को धन्य कहता है जो निजी सुख त्यागकर स्वराज्य की साधना में पूरी तरह समर्पित हैं।

स्वतंत्रतासाहसनिःस्वार्थ सेवा
6 अक्टू॰ 2026
समराङ्गणसूत्रधार

ज्ञानवांश्च तथा वाग्मी कर्मस्वपि च निष्ठितः। एवं युक्तोऽपि न श्रेयान् यदि शीलविवर्जितः॥

jñānavāṃśca tathā vāgmī karmasvapi ca niṣṭhitaḥ । evaṃ yukto'pi na śreyān yadi śīlavivarjitaḥ ॥

ज्ञान, वाक्पटुता और कर्मकुशलता होने पर भी सदाचार से रहित व्यक्ति श्रेष्ठ नहीं होता।

विद्यासामर्थ्यचरित्रनैतिकता
5 अक्टू॰ 2026
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शुचित्वं त्यागिता शौर्यं सामान्यं सुखदुःखयोः। दाक्षिण्यं चानुरक्तिश्च सत्यता च सुहृद्गुणाः॥

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