ज्ञानवांश्च तथा वाग्मी कर्मस्वपि च निष्ठितः। एवं युक्तोऽपि न श्रेयान् यदि शीलविवर्जितः॥
jñānavāṃśca tathā vāgmī karmasvapi ca niṣṭhitaḥ । evaṃ yukto'pi na śreyān yadi śīlavivarjitaḥ ॥
ज्ञानवांश्च तथा वाग्मी कर्मस्वपि का अर्थ
जो मनुष्य ज्ञानवान्, वाग्मी और कर्मों में निपुण होने के साथ शील एवं सदाचार से युक्त होता है, वही इस संसार में वास्तव में श्रेष्ठ कहलाता है।
शब्दार्थ
- ज्ञानवांश्चjñānavāṃśca
ज्ञानवान् और; ज्ञानवान् + च की संधि
- तथाtathā
तथा; उसी प्रकार
- वाग्मीvāgmī
वाक्पटु; बोलने में कुशल
- कर्मस्वपिkarmasvapi
कर्मों में भी; कर्मसु + अपि की संधि
- चca
और
- निष्ठितःniṣṭhitaḥ
निपुण; दृढ़ रूप से स्थित
- एवंevaṃ
इस प्रकार
- युक्तोऽपिyukto'pi
युक्त होने पर भी; युक्तः + अपि की संधि
- नna
नहीं
- श्रेयान्śreyān
श्रेष्ठ; सम्मान के योग्य
- यदिyadi
यदि
- शीलविवर्जितःśīlavivarjitaḥ
सदाचार से रहित; शील + विवर्जितः
व्याख्या
श्लोक ऐसे व्यक्ति की बात करता है जो ज्ञानवान् है, अच्छा बोलता है और अपने कार्य में निपुण है। दूसरी पंक्ति यह प्रश्न उठाती है कि क्या इन योग्यताओं के आधार पर ही उसे श्रेष्ठ माना जा सकता है। शील का अर्थ अच्छा चरित्र और सदाचार है, जबकि शीलविवर्जितः उस व्यक्ति को कहता है जिसमें इनका अभाव है। ऐसा व्यक्ति अपनी क्षमताओं के बावजूद श्रेष्ठता की कसौटी पर अधूरा रह जाता है। आज कार्यस्थल पर यह शिक्षा हमें विशेषज्ञता के साथ ईमानदारी और उत्तरदायित्व को भी परखने का आधार देती है, विशेषकर तब जब हमारे निर्णयों पर दूसरे लोग निर्भर हों।
स्रोत और पाठभेद
मूल पोस्ट
समराङ्गणसूत्रधार से और सुभाषित
स्रोत पृष्ठ देखेंशीलवान् पूजितो लोके शीलवान् साधुसम्मतः। शीलवान् सर्वकर्मार्हः शीलवान् प्रियदर्शनः॥
śīlavān pūjito loke śīlavān sādhusammataḥ । śīlavān sarvakarmārhaḥ śīlavān priyadarśanaḥ ॥
भोजदेव के समराङ्गणसूत्रधार का यह श्लोक बताता है कि शीलवान् व्यक्ति समाज में सम्मानित, सज्जनों द्वारा स्वीकृत, प्रत्येक कार्य के योग्य और सबको प्रिय होता है।
विद्या पर और सुभाषित
विषय पृष्ठ देखेंशुचित्वं त्यागिता शौर्यं सामान्यं सुखदुःखयोः। दाक्षिण्यं चानुरक्तिश्च सत्यता च सुहृद्गुणाः॥
śucitvaṃ tyāgitā śauryaṃ sāmānyaṃ sukhaduḥkhayoḥ । dākṣiṇyaṃ cānuraktiśca satyatā ca suhṛdguṇāḥ ॥
निर्मलता, त्याग, साहस, सुख-दुःख में समान भाव, शिष्टता, अनुराग और सत्यता सच्चे मित्र के गुण हैं।
अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च। निर्ममो निरहङ्कारः समदुःखसुखः क्षमी॥
adveṣṭā sarvabhūtānāṃ maitraḥ karuṇa eva ca । nirmamo nirahaṅkāraḥ samaduḥkhasukhaḥ kṣamī ॥
भगवद् गीता द्वेष और अहंकार से मुक्त, सभी प्राणियों के प्रति मैत्री रखने वाले और सुख-दुःख में सम रहने वाले व्यक्ति के गुण बताती है।
उद्यमः साहसं धैर्यं बुद्धिः शक्तिः पराक्रमः। षडेते यत्र वर्तन्ते तत्र दैवं सहायकृत्॥
udyamaḥ sāhasaṃ dhairyaṃ buddhiḥ śaktiḥ parākramaḥ । ṣaḍete yatra vartante tatra daivaṃ sahāyakṛt ॥
उद्यम, साहस, धैर्य, बुद्धि, शक्ति और पराक्रम से युक्त व्यक्ति को दैव का सहयोग भी प्राप्त होता है।