नैतिकता पर सुभाषित
यह विषय 6 स्रोतों से आए 39 सुभाषितों को एक साथ लाता है।
नवीनतम अद्यतन: 6 अक्टू॰ 2026
ज्ञानवांश्च तथा वाग्मी कर्मस्वपि च निष्ठितः। एवं युक्तोऽपि न श्रेयान् यदि शीलविवर्जितः॥
jñānavāṃśca tathā vāgmī karmasvapi ca niṣṭhitaḥ । evaṃ yukto'pi na śreyān yadi śīlavivarjitaḥ ॥
ज्ञान, वाक्पटुता और कर्मकुशलता होने पर भी सदाचार से रहित व्यक्ति श्रेष्ठ नहीं होता।
शुचित्वं त्यागिता शौर्यं सामान्यं सुखदुःखयोः। दाक्षिण्यं चानुरक्तिश्च सत्यता च सुहृद्गुणाः॥
śucitvaṃ tyāgitā śauryaṃ sāmānyaṃ sukhaduḥkhayoḥ । dākṣiṇyaṃ cānuraktiśca satyatā ca suhṛdguṇāḥ ॥
निर्मलता, त्याग, साहस, सुख-दुःख में समान भाव, शिष्टता, अनुराग और सत्यता सच्चे मित्र के गुण हैं।
अनुद्वेगकरं वाक्यं सत्यं प्रियहितं च यत्। स्वाध्यायाभ्यसनं चैव वाङ्मयं तप उच्यते॥
anudvegakaraṁ vākyaṁ satyaṁ priyahitaṁ ca yat । svādhyāyābhyasanaṁ caiva vāṅmayaṁ tapa ucyate ॥
भगवद् गीता सत्य, प्रिय, हितकारी और उद्वेगरहित वाणी तथा नियमित स्वाध्याय को वाणी का तप कहती है।
सद्भिरेव सहासीत सद्भिः कुर्वीत सङ्गतिम्। सद्भिर्विवादं मैत्रीं च नासद्भिः किञ्चिदाचरेत्॥
sadbhir eva sahāsīta sadbhiḥ kurvīta saṅgatim । sadbhir vivādaṃ maitrīṃ ca nāsadbhiḥ kiṃcid ācaret ॥
गरुड पुराण का यह श्लोक सज्जनों के साथ रहने, संवाद करने और मैत्री रखने की सीख देता है।
अभयस्यैव यो दाता तस्यैव सुमहत्फलम् । न हि प्राणसमं दानं त्रिषु लोकेषु विद्यते ॥
abhayasyaiva yo dātā tasyaiva sumahatphalam । na hi prāṇasamaṃ dānaṃ triṣu lokeṣu vidyate ॥
महाभारत का यह श्लोक अभय देने वाले की प्रशंसा करता है और तीनों लोकों में प्राण के समान किसी दान को नहीं मानता।
उत्तमैः सह साङ्गत्यं पण्डितैः सह सत्कथाम्। अलुब्धैः सह मित्रत्वं कुर्वाणो नावसीदति॥
uttamaiḥ saha sāṅgatyaṃ paṇḍitaiḥ saha satkathām । alubdhaiḥ saha mitratvaṃ kurvāṇo nāvasīdati ॥
गरुड पुराण का यह श्लोक उत्तम लोगों की संगति, विद्वानों के साथ सत्कथा और निर्लोभी लोगों से मित्रता का महत्त्व बताता है।
कारुण्येनात्मनो मानं तृष्णां च परितोषतः। उत्थानेन जयेत्तन्द्रीं वितर्कं निश्चयाज्जयेत्॥
kāruṇyenātmano mānaṃ tṛṣṇāṃ ca paritoṣataḥ । utthānena jayettandrīṃ vitarkaṃ niścayājjayet ॥
महाभारत का यह उपदेश करुणा से मान, सन्तोष से तृष्णा, पुरुषार्थ से आलस्य और निश्चय से वितर्क को जीतने की राह दिखाता है।
जीवनं स्वं परार्थाय नित्यं यच्छत मानवाः। इति सन्देशमाख्यातुं समुद्रं यान्ति निम्नगाः॥
jīvanaṃ svaṃ parārthāya nityaṃ yacchata mānavāḥ । iti sandeśamākhyātuṃ samudraṃ yānti nimnagāḥ ॥
यह संस्कृत सुभाषित मनुष्यों से कहता है कि अपना जीवन दूसरों के हित में दो; समुद्र की ओर बहती नदियाँ यही सन्देश सिखाती हैं।
एतावज्जन्मसाफल्यं देहिनामिह देहिषु। प्राणैरर्थैर्धिया वाचा श्रेय एवाचरेत् सदा॥
etāvaj janmasāphalyaṁ dehinām iha dehiṣu । prāṇair arthair dhiyā vācā śreya evācaret sadā ॥
श्रीमद्भागवत पुराण का यह श्लोक कहता है कि जन्म तब सार्थक होता है जब मनुष्य प्राण, धन, बुद्धि और वाणी से सदा दूसरों का कल्याण करे।
शीलवान् पूजितो लोके शीलवान् साधुसम्मतः। शीलवान् सर्वकर्मार्हः शीलवान् प्रियदर्शनः॥
śīlavān pūjito loke śīlavān sādhusammataḥ । śīlavān sarvakarmārhaḥ śīlavān priyadarśanaḥ ॥
भोजदेव के समराङ्गणसूत्रधार का यह श्लोक बताता है कि शीलवान् व्यक्ति समाज में सम्मानित, सज्जनों द्वारा स्वीकृत, प्रत्येक कार्य के योग्य और सबको प्रिय होता है।
कर्मणा मनसा वाचा यदभीक्ष्णं निषेवते। तदेवापहरत्येनं तस्मात्कल्याणमाचरेत्॥
karmaṇā manasā vācā yadabhīkṣṇaṃ niṣevate । tadevāpaharatyenaṃ tasmātkalyāṇamācaret ॥
विदुर नीति सिखाती है कि कर्म, मन और वाणी से बार-बार जिस विषय का अभ्यास किया जाता है, वही मनुष्य को अपनी दिशा में ले जाता है; इसलिए कल्याणकारी आचरण करना चाहिए।
हितं यत्सर्वभूतानामात्मानश्च सुखावहम्। तत्कुर्यादीश्वरे ह्येतन्मूलं सर्वार्थसिद्धये॥
hitaṃ yat sarvabhūtānām ātmānaśca sukhāvaham । tat kuryād īśvare hy etan mūlaṃ sarvārthasiddhaye ॥
महाभारत का यह श्लोक सिखाता है कि वही कर्म श्रेष्ठ है जो सभी प्राणियों के लिए हितकारी हो, आत्मा को शांति दे और ईश्वर-समर्पण से जुड़ा हो।
सत्यानुसारिणी लक्ष्मीः कीर्तिस्त्यागानुसारिणी। अभ्याससारिणी विद्या बुद्धिः कर्मानुसारिणी॥
satyānusāriṇī lakṣmīḥ kīrtis tyāgānusāriṇī । abhyāsasāriṇī vidyā buddhiḥ karmānusāriṇī ॥
यह सुभाषित धन को सत्यनिष्ठा, यश को परोपकार, ज्ञान को अभ्यास और बुद्धि को कर्म से जोड़ता है।
सदानुरक्तप्रकृतिः प्रजापालनतत्परः। विनीतात्मा हि नृपतिर्भूयसी श्रियमश्नुते॥
sadānuraktaprakṛtiḥ prajāpālanatatparaḥ । vinītātmā hi nṛpatir bhūyasī śriyam aśnute ॥
यह सुभाषित बताता है कि जनता के कल्याण, सुरक्षा और उन्नति के लिए विनम्र भाव से समर्पित नेतृत्व ही यश और समृद्धि पाता है।
आर्यकर्मणि रज्यन्ते भूतिकर्माणि कुर्वते। हितं च नाभ्यसूयन्ति स वै पण्डित उच्यते॥
āryakarmaṇi rajyante bhūtikarmāṇi kurvate । hitaṃ ca nābhyasūyanti sa vai paṇḍita ucyate ॥
विदुर नीति का यह श्लोक बताता है कि सच्ची बुद्धिमत्ता श्रेष्ठ कर्मों में रुचि, लोककल्याण के प्रति समर्पण और हितकारी कार्यों के प्रति निष्कपट सम्मान में है।
तेजः क्षमा धृतिः शौचमद्रोहो नातिमानिता। भवन्ति सम्पदं दैवीमभिजातस्य भारत॥
tejaḥ kṣamā dhṛtiḥ śaucam adroho nātimānitā । bhavanti sampadaṃ daivīm abhijātasya bhārata ॥
भगवद् गीता का यह श्लोक तेजस्विता, क्षमा, धैर्य, शुचिता, अद्रोह और अहंकाररहित विनम्रता जैसे छह दैवी गुणों का वर्णन करता है।
तस्माच्छास्त्रं प्रमाणं ते कार्याकार्यव्यवस्थितौ। ज्ञात्वा शास्त्रविधानोक्तं कर्म कर्तुमिहार्हसि॥
tasmācchāstraṁ pramāṇaṁ te kāryākāryavyavasthitau । jñātvā śāstravidhānoktaṁ karma kartum ihārhasi ॥
भगवद्गीता का यह ऐतिहासिक श्लोक प्रतिपादित करता है कि कर्तव्य और अकर्तव्य का निर्णय व्यक्तिगत इच्छा के बजाय एक प्रामाणिक और सुव्यवस्थित व्यवस्था पर आधारित होना चाहिए।
अद्रोहः सर्वभूतेषु कर्मणा मनसा गिरा। अनुग्रहश्च दानं च शीलमेतत्प्रशस्यते॥
adrohaḥ sarvabhūteṣu karmaṇā manasā girā । anugrahaśca dānaṁ ca śīlametatpraśasyate ॥
सच्ची मानवता और नैतिक आचरण पर एक मार्गदर्शक सिद्धांत, जो सभी जीवों के प्रति दया, दान और द्वेषहीनता पर जोर देता है।
न तथा बलवीर्याभ्यां जयन्ति विजिगीषवः। यथा सत्यानृशंस्याभ्यां धर्मेणैवोद्यमेन च॥
na tathā balavīryābhyāṁ jayanti vijigīṣavaḥ । yathā satyānṛśaṁsyābhyāṁ dharmeṇaivodyamena ca ॥
यह श्लोक बताता है कि सच्ची और स्थायी विजय केवल शारीरिक बल या पराक्रम से नहीं, बल्कि सत्य, दया, धर्म और उद्यम से प्राप्त होती है।
राज्ञो हि व्रतमुत्थानं यज्ञः कार्यानुशासनम्। दक्षिणा वृत्तिसाम्यं च दीक्षितस्याभिषेचनम्॥
rājño hi vratamutthānaṁ yajñaḥ kāryānuśāsanam । dakṣiṇā vṛttisāmyaṁ ca dīkṣitasyābhiṣecanam ॥
कौटिल्य के अर्थशास्त्र का यह श्लोक एक राजा या जनप्रतिनिधि के सच्चे कर्तव्यों और पवित्र संकल्प का वर्णन करता है।
छायामन्यस्य कुर्वन्ति तिष्ठन्ति स्वयमातपे। फलान्यपि परार्थाय वृक्षाः सत्पुरुषा इव॥
chāyāmanyasya kurvanti tiṣṭhanti svayamātape । phalānyapi parārthāya vṛkṣāḥ satpuruṣā iva ॥
यह श्लोक वृक्षों की तुलना सज्जन पुरुषों से करता है, जो स्वयं कष्ट सहकर दूसरों का कल्याण करते हैं।
प्रजासुखे सुखं राज्ञः प्रजानां च हिते हितम्। नात्मप्रियं प्रियं राज्ञः प्रजानां तु प्रियं प्रियम्॥
prajāsukhe sukhaṁ rājñaḥ prajānāṁ ca hite hitam । nātmapriyaṁ priyaṁ rājñaḥ prajānāṁ tu priyaṁ priyam ॥
कौटिल्य के अर्थशास्त्र का यह श्लोक सुशासन के मूल सिद्धांत को परिभाषित करता है: जनता की खुशी में ही नेतृत्व की सार्थकता है।
पद्माकरं दिनकरो विकचीकरोति चन्द्रो विकासयति कैरवचक्रवालम्। नाभ्यर्थितो जलधरोऽपि जलं ददाति सन्तः स्वयं परहितेषु कृताभियोगाः॥
padmākaraṁ dinakaro vikacīkaroti candro vikāsayati kairavacakravālam । nābhyarthito jaladharo’pi jalaṁ dadāti santaḥ svayaṁ parahiteṣu kṛtābhiyogāḥ ॥
सूर्य, चन्द्र और मेघों के उदाहरण से यह श्लोक बताता है कि सज्जन व्यक्ति बिना किसी स्वार्थ या प्रार्थना के दूसरों का भला करते हैं।
शीलं परहितासक्तिः अनुत्सेकः क्षमा धृतिः। अलोभश्चेति विद्यायाः परिपाकोज्ज्वलं फलम्॥
śīlaṁ parahitāsaktiḥ anutsekaḥ kṣamā dhṛtiḥ । alobhaśceti vidyāyāḥ paripākojjvalaṁ phalam ॥
विद्या की पूर्णता केवल ज्ञान संचय में नहीं, बल्कि शील, परोपकार और धैर्य जैसे गुणों के विकास में है। यह श्लोक विद्या के वास्तविक स्वरूप को परिभाषित करता है।
अयं निजः परो वेति गणना लघुचेतसाम्। उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम्॥
ayaṁ nijaḥ paro veti gaṇanā laghucetasām । udāracaritānāṁ tu vasudhaiva kuṭumbakam ॥
संकुचित मनुष्य लोगों को अपना और पराया मानता है, जबकि उदार हृदय वाला पूरे विश्व को एक परिवार समझता है।
पिबन्ति नद्यः स्वयमेव नाम्भः स्वयं न खादन्ति फलानि वृक्षाः। नादन्ति सस्यं खलु वारिवाहाः परोपकाराय सतां विभूतयः॥
pibanti nadyaḥ svayameva nāmbhaḥ svayaṃ na khādanti phalāni vṛkṣāḥ । nādanti sasyaṃ khalu vārivāhāḥ paropakārāya satāṃ vibhūtayaḥ ॥
प्रकृति के उदाहरणों — नदियों, वृक्षों और बादलों — के माध्यम से यह सुभाषित परोपकार और निःस्वार्थ जीवन की महत्ता को दर्शाता है।
श्रूयतां धर्मसर्वस्वं श्रुत्वा चैवावधार्यताम्। आत्मनः प्रतिकूलानि परेषां न समाचरेत्॥
śrūyatāṃ dharmasarvasvaṃ śrutvā caivāvadhāryatām । ātmanaḥ pratikūlāni pareṣāṃ na samācaret ॥
यह सुभाषित धर्म के समस्त सार को एक सुवर्ण नियम में समेटता है — जो व्यवहार अपने लिए अनुचित लगे, वह दूसरों के साथ कभी न करें।
सत्यमेव जयति नानृतं सत्येन पन्था विततो देवयानः। येनाक्रमन्त्यृषयो ह्याप्तकामा यत्र तत्सत्यस्य परमं निधानम्॥
satyameva jayati nānṛtaṃ satyena panthā vitato devayānaḥ । yenākramantyṛṣayo hyāptakāmā yatra tatsatyasya paramaṃ nidhānam ॥
मुण्डक उपनिषद घोषित करता है कि सत्य की ही विजय होती है और वही पूर्णकाम ऋषियों के लिए परम सत्य का मार्ग खोलता है।
गोपायितारं दातारं धर्मनित्यमतन्द्रितम्। अकामद्वेषसंयुक्तमनुरज्यन्ति मानवाः॥
gopāyitāraṁ dātāraṁ dharmanityamatandritam । akāmadveṣasaṁyuktam anurajyanti mānavāḥ ॥
आदर्श शासक रक्षा और पोषण करता है, कर्तव्य में स्थिर रहता है और प्रजा के साथ निष्पक्ष तथा संयमित शासन करता है।
अहिंसा परमो धर्मस्तथाऽहिंसा परन्तपः। अहिंसा परमं सत्यं यतो धर्मः प्रवर्तते॥
ahiṃsā paramo dharmastathā’hiṃsā parantapaḥ । ahiṃsā paramaṃ satyaṃ yato dharmaḥ pravartate ॥
अहिंसा को सत्य में निहित सर्वोच्च धर्म और तप बताया गया है, जो किसी को हानि न पहुँचाने की साधना सिखाती है।
सत्यं बृहदृतमुग्रं दीक्षा तपो ब्रह्म यज्ञः पृथिवीं धारयन्ति। सा नो भूतस्य भव्यस्य पत्न्युरुं लोकं पृथिवी नः कृणोतु॥
satyaṁ bṛhad ṛtam ugraṁ dīkṣā tapo brahma yajñaḥ pṛthivīṁ dhārayanti । sā no bhūtasya bhavyasya patny uruṁ lokaṁ pṛthivī naḥ kṛṇotu ॥
पावन भूमि सूक्त का यह मंत्र उन शाश्वत शक्तियों—सत्य, नियम और परिश्रम—का वर्णन करता है जो इस जगत को धारण करती हैं।
एतदेव परं शौर्यं यत् परप्राणरक्षणम्। नहि प्राणहरः शूरः शूरः प्राणप्रदोऽर्थिनाम्॥
etadeva paraṁ śauryaṁ yat paraprāṇarakṣaṇam । nahi prāṇaharaḥ śūraḥ śūraḥ prāṇaprado'rthinām ॥
सच्ची वीरता प्राण लेने में नहीं, बल्कि प्राणों की रक्षा करने में है। यह श्लोक एक सच्चे वीर को संकट में पड़े लोगों को जीवन देने वाले के रूप में परिभाषित करता है।
दशपुत्रसमा कन्या दशपुत्रान् प्रवर्धयन्। यत् फलम् लभते मर्त्यस्तल्लभ्यं कन्ययैकया॥
daśaputrasamā kanyā daśaputrān pravardhayan । yat phalam labhate martyastal labhyaṁ kanyayaikayā ॥
एक कन्या दस पुत्रों के समान होती है, यह श्लोक एक कन्या के पालन-पोषण के पुण्य को समझाता है।
प्रियवाक्यप्रदानेन सर्वे तुष्यन्ति जन्तवः। तस्मात् तदेव वक्तव्यं वचने का दरिद्रता॥
priyavākyapradānena sarve tuṣyanti jantavaḥ । tasmāt tadeva vaktavyaṁ vacane kā daridratā ॥
प्रिय और मधुर वचन सभी को प्रसन्न करते हैं। यह श्लोक हमें सिखाता है कि जब मधुर वचन बोलने में कुछ खर्च नहीं होता, तो बोलने में कंजूसी क्यों करनी चाहिए?
यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः। स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते॥
yad yad ācarati śreṣṭhas tat tad evetaro janaḥ । sa yat pramāṇaṃ kurute lokas tad anuvartate ॥
श्रेष्ठ व्यक्तियों का आचरण और उनके स्थापित मानदंड समाज को दिशा देते हैं, क्योंकि अन्य लोग स्वाभाविक रूप से उनका अनुसरण करते हैं।
पुष्पिताः फलवन्तश्च तर्पयन्तीह मानवान्। वृक्षदं पुत्रवत् वृक्षास्तारयन्ति परत्र च॥
puṣpitāḥ phalavantaś ca tarpayantīha mānavān । vṛkṣadaṁ putravat vṛkṣās tarayanti paratra ca ॥
फल-फूल देने वाले वृक्ष रोपण के बहुत बाद तक दूसरों का कल्याण करते हैं, इसलिए वृक्षारोपण निःस्वार्थ सेवा का स्थायी रूप है।
धर्मो यशो नयो दाक्ष्यम् मनोहारि सुभाषितम्। इत्यादिगुणरत्नानां संग्रहीनावसीदति॥
dharmaḥ yaśo nayaḥ dākṣyam manohāri subhāṣitam । ityādi guṇaratnānāṁ saṅgrahīnāvasīdati ॥
धर्म, यश, नीति, दक्षता और मधुर वाणी से युक्त चरित्र विपरीत परिस्थितियों में भी व्यक्ति को विषाद से बचाता है।
क्रोधः प्राणहरः शत्रुः क्रोधो मित्रमुखो रिपुः। क्रोधो ह्यसिर्महातीक्ष्णः सर्वं क्रोधोऽपकर्षति॥
krodhaḥ prāṇaharaḥ śatruḥ krodho mitramukho ripuḥ । krodho hy asir mahātīkṣṇaḥ sarvaṃ krodho ’pakarṣati ॥
क्रोध भीतर बसने वाला ऐसा शत्रु है जो विनाशकारी, दुर्जेय और अंततः उसे धारण करने वाले व्यक्ति के पतन का कारण बनता है।
सुदुर्बलं नावजानाति कञ्चिद् युक्तो रिपुं सेवते बुद्धिपूर्वम्। न विग्रहं रोचयते बलस्थैः काले च यो विक्रमते स धीरः॥
sudurbalaṃ nāvajānāti kañcid yukto ripuṃ sevate buddhipūrvam । na vigrahaṃ rocayate balasthaiḥ kāle ca yo vikramate sa dhīraḥ ॥
सुदुर्बलं नावजानाति श्लोक के अनुसार सच्चा वीर वही है जो बुद्धि और विवेक से काम लेता है और उचित समय पर ही अपना शौर्य दिखाता है।