सत्यं बृहदृतमुग्रं दीक्षा तपो ब्रह्म यज्ञः पृथिवीं धारयन्ति। सा नो भूतस्य भव्यस्य पत्न्युरुं लोकं पृथिवी नः कृणोतु॥
satyaṁ bṛhad ṛtam ugraṁ dīkṣā tapo brahma yajñaḥ pṛthivīṁ dhārayanti । sā no bhūtasya bhavyasya patny uruṁ lokaṁ pṛthivī naḥ kṛṇotu ॥
प्रधानमंत्री का संदेशसेवाभाव और सत्यनिष्ठा से किए गए कार्य कभी व्यर्थ नहीं जाते। संकल्प, समर्पण और सकारात्मकता से हम अपने साथ-साथ पूरी मानवता का भी भला कर सकते हैं।
सत्यं बृहदृतमुग्रं दीक्षा तपो का अर्थ
व्यापक सत्य, कठिन नियम, सभी की सेवा के लिए व्रत-ग्रहण, तपश्चर्या का जीवन, विस्तृत बुद्धि के साथ किए जाने वाले सतत कर्म, समग्र पृथ्वी को धारण करते हैं। हमारे अतीत और भविष्य का निर्माण करने वाली पृथ्वी, हमारे लिए विस्तृत प्रदेश प्रदान करे।
शब्दार्थ
- सत्यम्satyam
सत्य
√अस्
- बृहत्bṛhat
बृहत्
√बृह्
- ऋतम्ṛtam
ऋत
√ऋ
- उग्रम्ugram
उग्र
उग्र
- दीक्षाdīkṣā
दीक्षा
√दीक्ष्
- तपःtapaḥ
तप
√तप्
- ब्रह्मbrahma
ब्रह्म
√बृह्
- यज्ञःyajñaḥ
यज्ञ
√यज्
- पृथिवीम्pṛthivīm
पृथ्वी को
√प्रथ्
- धारयन्तिdhārayanti
धारण करते हैं
√धृ
- सा नःsā naḥ
वह हमारे लिए
तद्
- भूतस्य भव्यस्यbhūtasya bhavyasya
भूत और भावी की
√भू
- पत्नीpatnī
स्वामिनी
पति
- उरुम् लोकम्uruṁ lokam
विस्तृत लोक
उरु + लोक
- कृणोतुkṛṇotu
करे
√कृ
व्याख्या
अथर्ववेद के भूमि सूक्त का प्रथम मंत्र पृथ्वी को धारण करने वाली छह शक्तियाँ गिनाता है: बृहत् सत्य, उग्र ऋत, दीक्षा, तप, ब्रह्म और यज्ञ। साथ दिया अर्थ इन्हें व्यापक सत्य, कठिन नियम, सबकी सेवा का व्रत, तपश्चर्या, विस्तृत बुद्धि और सतत कर्म के रूप में प्रस्तुत करता है। इनमें सबकी सेवा, सतत कर्म और विस्तृत बुद्धि संस्कृत के अलग-अलग पद नहीं, आधुनिक व्याख्यात्मक प्रतिस्थापन हैं। दूसरा अर्धांश पृथ्वी को भूत और भावी की स्वामिनी कहकर उससे हमारे लिए विस्तृत लोक बनाने की प्रार्थना करता है। इससे पर्यावरणीय उत्तरदायित्व और नैतिक सामंजस्य की प्रेरणा ली जा सकती है, पर मंत्र की शाब्दिक छवि सीधे पर्यावरण-कार्यक्रम की नहीं, वैदिक अनुष्ठान और विश्व-व्यवस्था की है।
मूल पोस्ट
अथर्ववेद से और सुभाषित
स्रोत पृष्ठ देखेंसुत्रामाणं पृथिवीं द्यामनेहसं सुशर्माणमदितिं सुप्रणीतिम् । दैवीं नावं स्वरित्रामनागसो अस्रवन्तीमा रुहेमा स्वस्तये॥
sutrāmāṇaṃ pṛthivīṃ dyām anehasaṃ suśarmāṇam aditiṃ supraṇītim । daivīṃ nāvaṃ svaritrām anāgaso asravantīm ā ruhemā svastaye ॥
अथर्ववेद का यह मन्त्र पृथ्वी, द्युलोक और अदिति को सुरक्षित दिव्य नौका के रूप में देखता है, जो मनुष्य को कल्याण की ओर ले जाती है।
सहृदयं सांमनस्यमविद्वेषं कृणोमि वः। अन्यो अन्यमभि हर्यत वत्सं जातमिवाघ्न्या॥
sahṛdayaṁ sāṃmanasyam avidveṣaṁ kṛṇomi vaḥ । anyo anyam abhi haryata vatsaṁ jātam ivāghnyā ॥
अथर्ववेद का यह मंत्र सहृदयता, सांमनस्य और द्वेषमुक्त जीवन का आह्वान करते हुए नवजात बछड़े के प्रति गाय के स्नेह को आदर्श बनाता है।
धर्म पर और सुभाषित
विषय पृष्ठ देखेंज्ञानवांश्च तथा वाग्मी कर्मस्वपि च निष्ठितः। एवं युक्तोऽपि न श्रेयान् यदि शीलविवर्जितः॥
jñānavāṃśca tathā vāgmī karmasvapi ca niṣṭhitaḥ । evaṃ yukto'pi na śreyān yadi śīlavivarjitaḥ ॥
ज्ञान, वाक्पटुता और कर्मकुशलता होने पर भी सदाचार से रहित व्यक्ति श्रेष्ठ नहीं होता।
शुचित्वं त्यागिता शौर्यं सामान्यं सुखदुःखयोः। दाक्षिण्यं चानुरक्तिश्च सत्यता च सुहृद्गुणाः॥
śucitvaṃ tyāgitā śauryaṃ sāmānyaṃ sukhaduḥkhayoḥ । dākṣiṇyaṃ cānuraktiśca satyatā ca suhṛdguṇāḥ ॥
निर्मलता, त्याग, साहस, सुख-दुःख में समान भाव, शिष्टता, अनुराग और सत्यता सच्चे मित्र के गुण हैं।
सुखोपविष्टास्ते तत्र पुण्यां चक्रुः कथामिमाम्। धर्मार्थकाममोक्षाणामारोग्यं मूलमुत्तमम्॥
sukhopaviṣṭās te tatra puṇyāṃ cakruḥ kathām imām । dharmārthakāmamokṣāṇām ārogyaṃ mūlam uttamam ॥
चरक संहिता आरोग्य को धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष इन चारों पुरुषार्थों की प्राप्ति का सर्वोत्तम आधार बताती है।