तस्माच्छास्त्रं प्रमाणं ते - आचरण का व्यवस्थित मानक

20 मई 2026

तस्माच्छास्त्रं प्रमाणं ते कार्याकार्यव्यवस्थितौ। ज्ञात्वा शास्त्रविधानोक्तं कर्म कर्तुमिहार्हसि॥

tasmācchāstraṁ pramāṇaṁ te kāryākāryavyavasthitau । jñātvā śāstravidhānoktaṁ karma kartum ihārhasi ॥

प्रधानमंत्री का संदेश

श्रेष्ठ आचरण वह दीपक है, जिससे व्यक्ति के साथ-साथ समाज भी आलोकित होता है। इसी आदर्श को अपनाते हुए हमारे देशवासी आज पूरे संयम, सामर्थ्य और कर्तव्यनिष्ठा से राष्ट्र निर्माण में जुटे हुए हैं।

तस्माच्छास्त्रं प्रमाणं ते का अर्थ

कर्तव्य-अकर्तव्य का निर्धारण व्यक्तिपरक मत या क्षणिक प्रवृत्ति से नहीं बल्कि शास्त्र-निहित सुव्यवस्थित मानक से होना चाहिए, जो आचरण को दिशा और मर्यादा देता है। अतः मनुष्य को उसी मान-प्रणाली को समझकर कर्म करना चाहिए, जिससे उसका आचरण संतुलित, प्रमाणित और सार्थक बन सके।

शब्दार्थ

तस्मात्tasmāt

इसलिए

तद्

शास्त्रम्śāstram

शास्त्र

√शास्

प्रमाणम् तेpramāṇaṁ te

तुम्हारा प्रमाण है

प्र + √मा

कार्याकार्यव्यवस्थितौkāryākāryavyavasthitau

कर्तव्य-अकर्तव्य के निर्णय में

√कृ + वि + अव + √स्था

ज्ञात्वाjñātvā

जानकर

√ज्ञा

शास्त्रविधानोक्तम्śāstravidhānoktam

शास्त्रविधान में कहा गया

शास्त्र + वि + √धा + √वच्

कर्मkarma

कर्म

√कृ

कर्तुम्kartum

करने के

√कृ

इह अर्हसिihārhasi

यहाँ योग्य हो

√अर्ह्

व्याख्या

यह श्लोक अर्जुन को कर्तव्य और अकर्तव्य के निर्णय में शास्त्र को प्रमाण मानने का निर्देश देता है। शास्त्रविधान में कही बात समझकर उसे उसी के अनुसार कर्म करना चाहिए। इसका तात्कालिक कथन शास्त्रीय प्रामाण्य और विहित आचरण के विषय में है, सामान्य अर्थ में वस्तुनिष्ठ ढाँचों, विज्ञान या नागरिक कानून के विषय में नहीं। संस्थाओं अथवा शासन पर इसका अनुप्रयोग उपयोगी हो सकता है, पर वह 'शास्त्रविधान' का शाब्दिक अर्थ नहीं, आधुनिक उपमा है।

मूल पोस्ट

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भगवद् गीता से और सुभाषित

स्रोत पृष्ठ देखें
7 अक्टू॰ 2026
महाभारत

नित्यं परिचरेच्चैव तद्वै सुकृतमुत्तमम्। कीर्तिं पुण्यं यशो लोकान् प्राप्स्यसे राजसत्तम॥

nityaṃ paricareccaiva tadvai sukṛtamuttamam । kīrtiṃ puṇyaṃ yaśo lokān prāpsyase rājasattama ॥

नित्य सेवा को श्रेष्ठ पुण्य कर्म बताया गया है, जिससे कीर्ति, यश और उत्तम लोकों की प्राप्ति होती है।

कर्तव्यकर्मसफलता
2 अक्टू॰ 2026
भगवद् गीता

अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च। निर्ममो निरहङ्कारः समदुःखसुखः क्षमी॥

adveṣṭā sarvabhūtānāṃ maitraḥ karuṇa eva ca । nirmamo nirahaṅkāraḥ samaduḥkhasukhaḥ kṣamī ॥

भगवद् गीता द्वेष और अहंकार से मुक्त, सभी प्राणियों के प्रति मैत्री रखने वाले और सुख-दुःख में सम रहने वाले व्यक्ति के गुण बताती है।

चरित्रविनम्रतासामंजस्य
30 सित॰ 2026
भगवद् गीता

स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः संसिद्धिं लभते नरः। स्वकर्मनिरतः सिद्धिं यथा विन्दति तच्छृणु॥

sve sve karmaṇyabhirataḥ saṁsiddhiṁ labhate naraḥ । svakarmanirataḥ siddhiṁ yathā vindati tacchṛṇu ॥

भगवद् गीता बताती है कि अपने कर्म में निष्ठा मनुष्य को सिद्धि की ओर ले जाती है।

कर्मकर्तव्यसफलता

धर्म पर और सुभाषित

विषय पृष्ठ देखें
7 अक्टू॰ 2026
महाभारत

नित्यं परिचरेच्चैव तद्वै सुकृतमुत्तमम्। कीर्तिं पुण्यं यशो लोकान् प्राप्स्यसे राजसत्तम॥

nityaṃ paricareccaiva tadvai sukṛtamuttamam । kīrtiṃ puṇyaṃ yaśo lokān prāpsyase rājasattama ॥

नित्य सेवा को श्रेष्ठ पुण्य कर्म बताया गया है, जिससे कीर्ति, यश और उत्तम लोकों की प्राप्ति होती है।

कर्तव्यकर्मसफलता
6 अक्टू॰ 2026
समराङ्गणसूत्रधार

ज्ञानवांश्च तथा वाग्मी कर्मस्वपि च निष्ठितः। एवं युक्तोऽपि न श्रेयान् यदि शीलविवर्जितः॥

jñānavāṃśca tathā vāgmī karmasvapi ca niṣṭhitaḥ । evaṃ yukto'pi na śreyān yadi śīlavivarjitaḥ ॥

ज्ञान, वाक्पटुता और कर्मकुशलता होने पर भी सदाचार से रहित व्यक्ति श्रेष्ठ नहीं होता।

विद्यासामर्थ्यचरित्रनैतिकता
5 अक्टू॰ 2026
हितोपदेश

शुचित्वं त्यागिता शौर्यं सामान्यं सुखदुःखयोः। दाक्षिण्यं चानुरक्तिश्च सत्यता च सुहृद्गुणाः॥

śucitvaṃ tyāgitā śauryaṃ sāmānyaṃ sukhaduḥkhayoḥ । dākṣiṇyaṃ cānuraktiśca satyatā ca suhṛdguṇāḥ ॥

निर्मलता, त्याग, साहस, सुख-दुःख में समान भाव, शिष्टता, अनुराग और सत्यता सच्चे मित्र के गुण हैं।

चरित्रनैतिकतासाहस