यस्यां पूर्वे पूर्वजना विचक्रिरे यस्यां देवा असुरानभ्यवर्तयन्। गवामश्वानां वयसश्च विष्ठा भगं वर्चः पृथिवी नो दधातु॥
yasyāṁ pūrve pūrvajanā vicakrire yasyāṁ devā asurān abhyavartayan । gavāmaśvānāṁ vayasaś ca viṣṭhā bhagaṁ varcaḥ pṛthivī no dadhātu ॥
प्रधानमंत्री का संदेशहमारी मातृभूमि साधना और उपासना के साथ-साथ साहस, शक्ति और सर्व-कल्याण की पुण्यभूमि रही है। महान विरासत और प्राचीन संस्कृति की यह पावन धरती हर किसी को सदैव सुख-समृद्धि से परिपूर्ण रखे, यही कामना है।
यस्यां पूर्वे पूर्वजना विचक्रिरे का अर्थ
जिस भूमि पर हमारे पूर्वजों ने महान और कल्याणकारी कार्य किया, तथा जिस भूमि पर देवताओं ने अन्यायपूर्ण शक्तियों को पराजित किया, वह पशुधन और शक्ति से युक्त मातृभूमि हमें विशाल स्थान और समृद्धि प्रदान करें।
शब्दार्थ
- यस्याम्yasyām
जिस पर
यद्
- पूर्वे पूर्वजनाःpūrve pūrvajanāḥ
प्राचीन पूर्वज
पूर्व + √जन्
- विचक्रिरेvicakrire
कर्म किए
वि + √कृ
- देवाःdevāḥ
देवगण
√दिव्
- असुरान्asurān
असुरों को
असुर
- अभ्यवर्तयन्abhyavartayan
परास्त किया
अभि + √वृत्
- गवाम् अश्वानाम्gavām aśvānām
गायों और अश्वों का
गो + अश्व
- वयसः चvayasaś ca
और पक्षियों का
वयस्
- विष्ठाviṣṭhā
निवास
वि + √स्था
- भगम् वर्चःbhagaṁ varcaḥ
भग और वर्चस्
√भज् + वर्चस्
- पृथिवी नः दधातुpṛthivī no dadhātu
पृथ्वी हमें दे
√धा
व्याख्या
यह अथर्ववैदिक मन्त्र उस पृथ्वी को स्मरण करता है जिस पर पूर्वजों ने कर्म किए और देवों ने असुरों को पीछे हटाया। 'विचक्रिरे' केवल पूर्वजों के कर्म या उपलब्धि को कहता है; महान कल्याणकारी सभ्यता और ब्रह्माण्डीय निर्माण व्याख्यात्मक जोड़ हैं। अगली पंक्ति पृथ्वी को गायों, अश्वों और पक्षियों का निवास बताती है: यहाँ 'वयसः' का अर्थ पक्षी है, प्राणशक्ति नहीं। प्रार्थना है कि पृथ्वी हमें 'भग', अर्थात सौभाग्य या समृद्धि का अंश, और 'वर्चस्', अर्थात तेज या ओज, प्रदान करे। राष्ट्रीय और पर्यावरणीय पाठ उचित अनुप्रयोग हो सकते हैं, पर उन्हें शाब्दिक पक्षियों तथा देव-असुर के मिथकीय चित्र को सुरक्षित रखना चाहिए।
मूल पोस्ट
अथर्ववेद से और सुभाषित
स्रोत पृष्ठ देखेंसुत्रामाणं पृथिवीं द्यामनेहसं सुशर्माणमदितिं सुप्रणीतिम् । दैवीं नावं स्वरित्रामनागसो अस्रवन्तीमा रुहेमा स्वस्तये॥
sutrāmāṇaṃ pṛthivīṃ dyām anehasaṃ suśarmāṇam aditiṃ supraṇītim । daivīṃ nāvaṃ svaritrām anāgaso asravantīm ā ruhemā svastaye ॥
अथर्ववेद का यह मन्त्र पृथ्वी, द्युलोक और अदिति को सुरक्षित दिव्य नौका के रूप में देखता है, जो मनुष्य को कल्याण की ओर ले जाती है।
सहृदयं सांमनस्यमविद्वेषं कृणोमि वः। अन्यो अन्यमभि हर्यत वत्सं जातमिवाघ्न्या॥
sahṛdayaṁ sāṃmanasyam avidveṣaṁ kṛṇomi vaḥ । anyo anyam abhi haryata vatsaṁ jātam ivāghnyā ॥
अथर्ववेद का यह मंत्र सहृदयता, सांमनस्य और द्वेषमुक्त जीवन का आह्वान करते हुए नवजात बछड़े के प्रति गाय के स्नेह को आदर्श बनाता है।
प्रकृति पर और सुभाषित
विषय पृष्ठ देखेंवत्सराजोऽपि तं प्राप्तं प्रदत्तोपायनं नृपम्। प्रीत्या सम्मानयामास शूरा हि प्रणतिप्रियाः॥
vatsarājo 'pi taṃ prāptaṃ pradattopāyanaṃ nṛpam । prītyā sammānayāmāsa śūrā hi praṇatipriyāḥ ॥
भेंट लेकर आए राजा का वत्सराज स्नेह से सम्मान करते हैं। श्लोक वीरों के मन में विनम्र प्रणाम के प्रति आदर बताता है।
भस्मीकृतस्वार्थसौख्यपरिचर्चितविग्रहाः। स्वराज्ययोगनिर्मग्ना धन्यास्ते वीरयोगिनः॥
bhasmīkṛtasvārthasaukhyaparicarcitavigrahāḥ । svarājyayoganirmagnā dhanyās te vīrayoginaḥ ॥
यह श्लोक उन वीर साधकों को धन्य कहता है जो निजी सुख त्यागकर स्वराज्य की साधना में पूरी तरह समर्पित हैं।
शुचित्वं त्यागिता शौर्यं सामान्यं सुखदुःखयोः। दाक्षिण्यं चानुरक्तिश्च सत्यता च सुहृद्गुणाः॥
śucitvaṃ tyāgitā śauryaṃ sāmānyaṃ sukhaduḥkhayoḥ । dākṣiṇyaṃ cānuraktiśca satyatā ca suhṛdguṇāḥ ॥
निर्मलता, त्याग, साहस, सुख-दुःख में समान भाव, शिष्टता, अनुराग और सत्यता सच्चे मित्र के गुण हैं।