अद्वैधमनसं युक्तं शूरं धीरं विपश्चितम्। न श्रीः सन्त्यजते नित्यमादित्यमिव रश्मयः॥
advaidhamanasaṃ yuktaṃ śūraṃ dhīraṃ vipaścitam । na śrīḥ santyajate nityam ādityamiva raśmayaḥ ॥
अद्वैधमनसं युक्तं शूरं धीरं का अर्थ
जिस व्यक्ति का मन दुविधारहित हो और जो कर्मठ, शूरवीर, धैर्यवान् तथा विद्वान् हो, समृद्धि उसका साथ कभी नहीं छोड़ती, जैसे सूर्य का साथ उसकी किरणें कभी नहीं छोड़तीं।
शब्दार्थ
- अद्वैधमनसंadvaidhamanasam
जिसका मन द्वैध या डाँवाडोलपन से रहित हो
अद्वैध + मनस्
जिस व्यक्ति को श्री नहीं छोड़ती, उसके लिए प्रयुक्त कर्मकारक एकवचन समास।
- युक्तंyuktam
एकाग्र, संयत, उचित कर्म में लगा हुआ
√युज्
- शूरंśūram
साहसी, शूरवीर
शूर
- धीरंdhīram
धैर्यवान्, दृढ़
धीर
- विपश्चितम्vipaścitam
विवेकी, विद्वान्
विपश्चित्
- नna
नहीं, कभी नहीं
- श्रीःśrīḥ
समृद्धि, सौभाग्य
श्री
- सन्त्यजतेsantyajate
त्यागती है, छोड़ती है
सम् + √त्यज्
- नित्यम्nityam
सदा, निरन्तर
नित्य
- आदित्यम् इवādityam iva
जैसे सूर्य को
आदित्य + इव
- रश्मयःraśmayaḥ
किरणें
रश्मि
व्याख्या
यह श्लोक उन परस्पर पूरक गुणों का चित्र प्रस्तुत करता है जिनसे युक्त व्यक्ति का साथ समृद्धि नहीं छोड़ती। ‘अद्वैधमनसम्’ ऐसे मन को सूचित करता है जो विभाजित, संशयग्रस्त या डाँवाडोल नहीं है, जबकि ‘युक्तम्’ संयत, एकाग्र और उचित कर्म में लगे होने का भाव देता है। ‘शूरम्’ साहस को, ‘धीरम्’ स्थिरता और धैर्य को तथा ‘विपश्चितम्’ स्पष्ट विवेक से युक्त बुद्धिमत्ता को व्यक्त करता है। इस प्रकार ‘श्री’ केवल संयोग से प्राप्त होने वाली वस्तु नहीं, बल्कि उस व्यक्ति के साथ रहने वाली समृद्धि है जिसकी आन्तरिक स्पष्टता और बाहरी आचरण एक-दूसरे को बल देते हैं। अंतिम उपमा इस सम्बन्ध को सजीव कर देती है: जिस प्रकार किरणें सूर्य से अलग नहीं होतीं और निरन्तर उससे प्रकाशित होती हैं, उसी प्रकार समृद्धि इस समन्वित चरित्र का साथ देती है। यहाँ ‘श्री’ का अर्थ केवल धन तक सीमित नहीं है; इसमें सौभाग्य, उन्नति और उत्कर्ष भी समाहित हैं। श्लोक की व्यावहारिक शिक्षा यह है कि स्थायी सफलता किसी एक गुण पर नहीं, बल्कि स्पष्ट उद्देश्य, साहसी कर्म, दृढ़ता और सही विवेक के मेल पर टिकी होती है।
मूल पोस्ट
महाभारत से और सुभाषित
स्रोत पृष्ठ देखेंअद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च। निर्ममो निरहङ्कारः समदुःखसुखः क्षमी॥
adveṣṭā sarvabhūtānāṃ maitraḥ karuṇa eva ca । nirmamo nirahaṅkāraḥ samaduḥkhasukhaḥ kṣamī ॥
भगवद् गीता द्वेष और अहंकार से मुक्त, सभी प्राणियों के प्रति मैत्री रखने वाले और सुख-दुःख में सम रहने वाले व्यक्ति के गुण बताती है।
स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः संसिद्धिं लभते नरः। स्वकर्मनिरतः सिद्धिं यथा विन्दति तच्छृणु॥
sve sve karmaṇyabhirataḥ saṁsiddhiṁ labhate naraḥ । svakarmanirataḥ siddhiṁ yathā vindati tacchṛṇu ॥
भगवद् गीता बताती है कि अपने कर्म में निष्ठा मनुष्य को सिद्धि की ओर ले जाती है।
उद्यमः साहसं धैर्यं बुद्धिः शक्तिः पराक्रमः। षडेते यत्र वर्तन्ते तत्र दैवं सहायकृत्॥
udyamaḥ sāhasaṃ dhairyaṃ buddhiḥ śaktiḥ parākramaḥ । ṣaḍete yatra vartante tatra daivaṃ sahāyakṛt ॥
उद्यम, साहस, धैर्य, बुद्धि, शक्ति और पराक्रम से युक्त व्यक्ति को दैव का सहयोग भी प्राप्त होता है।
साहस पर और सुभाषित
विषय पृष्ठ देखेंरत्नैर्महाब्धेस्तुतुषुर्न देवा न भेजिरे भीमविषेण भीतिम्। सुधां विना न प्रययुर्विरामं न निश्चितार्थाद्विरमन्ति धीराः॥
ratnair mahābdhes tutuṣur na devā na bhejire bhīmaviṣeṇa bhītim । sudhāṃ vinā na prayayur virāmaṃ na niścitārthād viramanti dhīrāḥ ॥
भर्तृहरि समुद्र-मन्थन के प्रसंग से बताते हैं कि धीर व्यक्ति न बीच की उपलब्धियों पर रुकते हैं, न संकट के कारण अपने निश्चित लक्ष्य से हटते हैं।
उद्यमः साहसं धैर्यं बुद्धिः शक्तिः पराक्रमः। षडेते यत्र वर्तन्ते तत्र दैवं सहायकृत्॥
udyamaḥ sāhasaṃ dhairyaṃ buddhiḥ śaktiḥ parākramaḥ । ṣaḍete yatra vartante tatra daivaṃ sahāyakṛt ॥
उद्यम, साहस, धैर्य, बुद्धि, शक्ति और पराक्रम से युक्त व्यक्ति को दैव का सहयोग भी प्राप्त होता है।
सुखोपविष्टास्ते तत्र पुण्यां चक्रुः कथामिमाम्। धर्मार्थकाममोक्षाणामारोग्यं मूलमुत्तमम्॥
sukhopaviṣṭās te tatra puṇyāṃ cakruḥ kathām imām । dharmārthakāmamokṣāṇām ārogyaṃ mūlam uttamam ॥
चरक संहिता आरोग्य को धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष इन चारों पुरुषार्थों की प्राप्ति का सर्वोत्तम आधार बताती है।