धीराः शोकं तरिष्यन्ति लभन्ते सिद्धिमुत्तमाम्। धीरैः सम्प्राप्यते लक्ष्मीर्धैर्यं सर्वत्र साधनम्॥
dhīrāḥ śokaṃ tariṣyanti labhante siddhimuttamām । dhīraiḥ samprāpyate lakṣmīrdhairyaṃ sarvatra sādhanam ॥
प्रधानमंत्री का संदेशमां भारती के कर्मठ सपूत वीर सावरकर जी के जीवन से हमें विपरीत परिस्थितियों में भी अपने संकल्प पर अडिग रहने की सीख मिलती है। उनका साहस, संयम और मातृभूमि के प्रति समर्पण का भाव सदैव देशवासियों का पथ प्रदर्शित करता रहेगा।
धीराः शोकं तरिष्यन्ति लभन्ते का अर्थ
साहसी और दृढ़ निश्चयी व्यक्ति दुःख पर विजय प्राप्त कर अपने जीवन में सफलता हासिल करते हैं। ऐसे लोग समृद्ध और उन्नत बनते हैं। इसलिए जीवन में सफलता पाने के लिए धैर्य और साहस हमेशा सबसे श्रेष्ठ साधन हैं।
शब्दार्थ
- धीराःdhīrāḥ
धीर जन
√धृ
- शोकम्śokam
शोक को
√शुच्
- तरिष्यन्तिtariṣyanti
पार कर जाएँगे
√तॄ
- लभन्तेlabhante
प्राप्त करते हैं
√लभ्
- सिद्धिम्siddhim
सिद्धि
√सिध्
- उत्तमाम्uttamām
उत्तम
उद् + तम
- धीरैःdhīraiḥ
धीरों के द्वारा
√धृ
- सम्प्राप्यतेsamprāpyate
प्राप्त की जाती है
सम् + प्र + √आप्
- लक्ष्मीःlakṣmīḥ
लक्ष्मी
√लक्ष्
- धैर्यम्dhairyam
धैर्य
√धृ
- सर्वत्रsarvatra
सर्वत्र
सर्व
- साधनम्sādhanam
साधन है
√साध्
व्याख्या
यह श्लोक ‘धैर्य’ को क्षणिक साहस से कहीं व्यापक गुण के रूप में प्रस्तुत करता है। इसी स्थिरता से विवेकी व्यक्ति शोक को पार करते, दबाव सहते और दुःख को पूरे जीवन की दिशा तय नहीं करने देते। शोक को ‘पार करना’ उसका निषेध नहीं है; यह धैर्य के साथ उससे गुजरकर फिर से सार्थक कर्म की ओर बढ़ने का संकेत है। प्रधानमंत्री मोदी ने यह श्लोक वीर सावरकर की स्मृति में साझा किया और कठोर कष्ट तथा राजनीतिक संघर्ष से भरे उनके जीवन पर इसे लागू किया। वह प्रसंग धैर्य संबंधी इस व्यापक शिक्षा का आधुनिक उदाहरण है। शोक के लिए समाप्ति की नहीं, पार करने की क्रिया दी गई है—'तरिष्यन्ति' अर्थात् वे पार कर जाएँगे—अतः श्लोक यह वचन नहीं देता कि शोक आएगा ही नहीं, केवल यह कि वह पार करने योग्य है। 'धीर' विशेषण दो बार आता है—पहले प्रथमा बहुवचन 'धीराः' और फिर तृतीया बहुवचन 'धीरैः'। अन्तिम चरण में उससे सम्बद्ध भाववाचक संज्ञा 'धैर्यम्' आती है और विचार को व्यक्तियों से विधि तक विस्तृत करती है: 'धैर्यं सर्वत्र साधनम्'। इस श्लोक का स्रोत अभी अनुसन्धेय है।
मूल पोस्ट
साहस पर और सुभाषित
विषय पृष्ठ देखेंवत्सराजोऽपि तं प्राप्तं प्रदत्तोपायनं नृपम्। प्रीत्या सम्मानयामास शूरा हि प्रणतिप्रियाः॥
vatsarājo 'pi taṃ prāptaṃ pradattopāyanaṃ nṛpam । prītyā sammānayāmāsa śūrā hi praṇatipriyāḥ ॥
भेंट लेकर आए राजा का वत्सराज स्नेह से सम्मान करते हैं। श्लोक वीरों के मन में विनम्र प्रणाम के प्रति आदर बताता है।
भस्मीकृतस्वार्थसौख्यपरिचर्चितविग्रहाः। स्वराज्ययोगनिर्मग्ना धन्यास्ते वीरयोगिनः॥
bhasmīkṛtasvārthasaukhyaparicarcitavigrahāḥ । svarājyayoganirmagnā dhanyās te vīrayoginaḥ ॥
यह श्लोक उन वीर साधकों को धन्य कहता है जो निजी सुख त्यागकर स्वराज्य की साधना में पूरी तरह समर्पित हैं।
नित्यं परिचरेच्चैव तद्वै सुकृतमुत्तमम्। कीर्तिं पुण्यं यशो लोकान् प्राप्स्यसे राजसत्तम॥
nityaṃ paricareccaiva tadvai sukṛtamuttamam । kīrtiṃ puṇyaṃ yaśo lokān prāpsyase rājasattama ॥
नित्य सेवा को श्रेष्ठ पुण्य कर्म बताया गया है, जिससे कीर्ति, यश और उत्तम लोकों की प्राप्ति होती है।