न हि शौर्यात्परं किञ्चित् त्रिषु लोकेषु विद्यते। शूरः सर्वं पालयति सर्वं शूरे प्रतिष्ठितम्॥
na hi śauryāt paraṃ kiñcit triṣu lokeṣu vidyate । śūraḥ sarvaṃ pālayati sarvaṃ śūre pratiṣṭhitam ॥
प्रधानमंत्री का संदेशअमर क्रांतिकारी चंद्रशेखर आजाद का जीवन बताता है कि अन्याय के खिलाफ अडिग रहने का संकल्प ही सच्चा पराक्रम है। मातृभूमि के लिए उनके बलिदान की गाथा देश की हर पीढ़ी को प्रेरित करती रहेगी।
न हि शौर्यात्परं किञ्चित् का अर्थ
तीनों लोकों में शौर्य से उत्कृष्ट अन्य कोई तत्त्व विद्यमान नहीं है। शौर्य ही वह आधारभूत शक्ति है जो चराचर जगत् का पोषण और रक्षण करती है। समस्त लोक-मर्यादा, ऐश्वर्य और कर्तव्य का अस्तित्व केवल शूरवीर के पराक्रम में ही निहित है।
शब्दार्थ
- न हिna hi
नहीं है
- शौर्यात्śauryāt
शौर्य से
√शूर्
- परम्param
बढ़कर
पर
- किञ्चित्kiñcit
कुछ
- त्रिषु लोकेषुtriṣu lokeṣu
तीनों लोकों में
त्रि + लोक
- विद्यतेvidyate
विद्यमान
√विद्
- शूरःśūraḥ
शूर
√शूर्
- सर्वम्sarvam
सब कुछ
सर्व
- पालयतिpālayati
पालता है
√पाल्
- शूरेśūre
शूर में
√शूर्
- प्रतिष्ठितम्pratiṣṭhitam
प्रतिष्ठित है
प्रति + √स्था
व्याख्या
यह श्लोक ‘शौर्य’ को सांसारिक जीवन की सर्वोच्च रक्षक शक्तियों में रखता है। यहाँ साहस उतावली आक्रामकता नहीं, बल्कि संकट का सामना करने की वह तत्परता है जिससे मर्यादा, व्यवस्था और कर्तव्य सुरक्षित रह सकें। शौर्य से बढ़कर कुछ नहीं कहने का जोर यह याद दिलाता है कि रक्षा के लिए खड़ा होने वाला कोई न हो तो श्रेष्ठ सिद्धांत भी दुर्बल रह जाते हैं। चंद्रशेखर आजाद की स्मृति में साझा किए जाने पर यह श्लोक स्वतंत्रता के प्रति उनकी निर्भीक निष्ठा से जुड़ा। वह ऐतिहासिक प्रसंग रक्षक साहस के आदर्श को स्पष्ट करता है, पर श्लोक का अर्थ उसी तक सीमित नहीं है। दूसरी पंक्ति दोनों में अधिक प्रबल है और युग्म के रूप में रची गई है: शूर सबकी रक्षा करता है, और सब कुछ शूर में प्रतिष्ठित है। पूर्वार्ध शौर्य को क्रिया बनाता है, उत्तरार्ध उसे आधार, और श्लोक दोनों एक साथ कहता है। शान्ति पर्व के भीतर, जहाँ भीष्म राजा के कर्तव्य बता रहे हैं, यह कथन किसी स्वभाव विषयक नहीं, पद विषयक है—यह बताता है कि रक्षा शासक का प्रथम दायित्व क्यों है।
स्रोत और पाठभेद
मूल पोस्ट
महाभारत से और सुभाषित
स्रोत पृष्ठ देखेंनित्यं परिचरेच्चैव तद्वै सुकृतमुत्तमम्। कीर्तिं पुण्यं यशो लोकान् प्राप्स्यसे राजसत्तम॥
nityaṃ paricareccaiva tadvai sukṛtamuttamam । kīrtiṃ puṇyaṃ yaśo lokān prāpsyase rājasattama ॥
नित्य सेवा को श्रेष्ठ पुण्य कर्म बताया गया है, जिससे कीर्ति, यश और उत्तम लोकों की प्राप्ति होती है।
अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च। निर्ममो निरहङ्कारः समदुःखसुखः क्षमी॥
adveṣṭā sarvabhūtānāṃ maitraḥ karuṇa eva ca । nirmamo nirahaṅkāraḥ samaduḥkhasukhaḥ kṣamī ॥
भगवद् गीता द्वेष और अहंकार से मुक्त, सभी प्राणियों के प्रति मैत्री रखने वाले और सुख-दुःख में सम रहने वाले व्यक्ति के गुण बताती है।
स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः संसिद्धिं लभते नरः। स्वकर्मनिरतः सिद्धिं यथा विन्दति तच्छृणु॥
sve sve karmaṇyabhirataḥ saṁsiddhiṁ labhate naraḥ । svakarmanirataḥ siddhiṁ yathā vindati tacchṛṇu ॥
भगवद् गीता बताती है कि अपने कर्म में निष्ठा मनुष्य को सिद्धि की ओर ले जाती है।
साहस पर और सुभाषित
विषय पृष्ठ देखेंदेव्या यया ततमिदं जगदात्मशक्त्या निश्शेषदेवगणशक्तिसमूहमूर्त्या। तामम्बिकामखिलदेवमहर्षिपूज्यां भक्त्या नताः स्म विदधातु शुभानि सा नः॥
devyā yayā tatamidaṃ jagadātmaśaktyā niśśeṣadevagaṇaśaktisamūhamūrtyā । tāmambikāmakhiladevamaharṣipūjyāṃ bhaktyā natāḥ sma vidadhātu śubhāni sā naḥ ॥
देवी महात्म्यम् की यह प्रार्थना जगत् में व्याप्त और समस्त देवशक्तियों की स्वरूप माँ अम्बिका को नमन करके सबके लिए मंगल माँगती है।
वत्सराजोऽपि तं प्राप्तं प्रदत्तोपायनं नृपम्। प्रीत्या सम्मानयामास शूरा हि प्रणतिप्रियाः॥
vatsarājo 'pi taṃ prāptaṃ pradattopāyanaṃ nṛpam । prītyā sammānayāmāsa śūrā hi praṇatipriyāḥ ॥
भेंट लेकर आए राजा का वत्सराज स्नेह से सम्मान करते हैं। श्लोक वीरों के मन में विनम्र प्रणाम के प्रति आदर बताता है।
भस्मीकृतस्वार्थसौख्यपरिचर्चितविग्रहाः। स्वराज्ययोगनिर्मग्ना धन्यास्ते वीरयोगिनः॥
bhasmīkṛtasvārthasaukhyaparicarcitavigrahāḥ । svarājyayoganirmagnā dhanyās te vīrayoginaḥ ॥
यह श्लोक उन वीर साधकों को धन्य कहता है जो निजी सुख त्यागकर स्वराज्य की साधना में पूरी तरह समर्पित हैं।