स्वधर्ममपि चावेक्ष्य न विकम्पितुमर्हसि। धर्म्याद्धि युद्धाच्छ्रेयोऽन्यत्क्षत्रियस्य न विद्यते॥
svadharmamapi cāvekṣya na vikampitumarhasi । dharmyāddhi yuddhācchreyo'nyatkṣatriyasya na vidyate ॥
प्रधानमंत्री का संदेशदेश के मान-सम्मान की रक्षा के लिए भारतीय सेना का शौर्य और पराक्रम सभी देशवासियों को गौरवान्वित करता है। मां भारती के लिए मर-मिटने का उनका जज्बा हर किसी को प्रेरित करने वाला है।
स्वधर्ममपि चावेक्ष्य न विकम्पितुमर्हसि का अर्थ
अपने कर्तव्य का बोध होने पर व्यक्ति के मन में किसी भी प्रकार की दुविधा या भय नहीं होना चाहिए, क्योंकि न्याय की वेदी पर धर्म और मर्यादा की रक्षा हेतु किया गया संघर्ष ही एक योद्धा के लिए आत्म-कल्याण का सर्वोत्तम और सर्वाधिक गौरवशाली मार्ग है।
शब्दार्थ
- स्वधर्मम्svadharmam
अपना स्वधर्म
स्व + धर्म
- अपि चapi ca
और
- अवेक्ष्यavekṣya
विचार कर
अव + √ईक्ष्
- न विकम्पितुम्na vikampitum
विचलित होना
वि + √कम्प्
- अर्हसिarhasi
तुम्हें उचित नहीं
√अर्ह्
- धर्म्यात्dharmyāt
धर्मसंगत
√धृ
- हि युद्धात्hi yuddhāt
युद्ध से
√युध्
- श्रेयःśreyaḥ
श्रेयस्कर
श्रेयस्
- अन्यत्anyat
और कुछ
अन्य
- क्षत्रियस्यkṣatriyasya
क्षत्रिय के लिए
क्षत्र
- न विद्यतेna vidyate
नहीं है
√विद्
व्याख्या
कुरुक्षेत्र में कृष्ण अर्जुन को उसके विशिष्ट क्षत्रिय-कर्तव्य का स्मरण कराते हैं। वे कहते हैं कि अपने स्वधर्म पर विचार करके उसे विचलित नहीं होना चाहिए, क्योंकि क्षत्रिय के लिए धर्मसंगत युद्ध से बढ़कर कोई श्रेय नहीं है। श्लोक यह नहीं कहता कि स्वधर्म सभी भय और सन्देह मिटा देता है, न ही वह परिणाम से निरपेक्ष यश का वचन देता है। संग्रहीत अर्थ 'क्षत्रिय' को सामान्य योद्धा और 'युद्ध' को संघर्ष कहकर इसके अर्थ को अर्जुन के प्रसंग से आगे बढ़ाता है।
मूल पोस्ट
भगवद् गीता से और सुभाषित
स्रोत पृष्ठ देखेंनित्यं परिचरेच्चैव तद्वै सुकृतमुत्तमम्। कीर्तिं पुण्यं यशो लोकान् प्राप्स्यसे राजसत्तम॥
nityaṃ paricareccaiva tadvai sukṛtamuttamam । kīrtiṃ puṇyaṃ yaśo lokān prāpsyase rājasattama ॥
नित्य सेवा को श्रेष्ठ पुण्य कर्म बताया गया है, जिससे कीर्ति, यश और उत्तम लोकों की प्राप्ति होती है।
अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च। निर्ममो निरहङ्कारः समदुःखसुखः क्षमी॥
adveṣṭā sarvabhūtānāṃ maitraḥ karuṇa eva ca । nirmamo nirahaṅkāraḥ samaduḥkhasukhaḥ kṣamī ॥
भगवद् गीता द्वेष और अहंकार से मुक्त, सभी प्राणियों के प्रति मैत्री रखने वाले और सुख-दुःख में सम रहने वाले व्यक्ति के गुण बताती है।
स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः संसिद्धिं लभते नरः। स्वकर्मनिरतः सिद्धिं यथा विन्दति तच्छृणु॥
sve sve karmaṇyabhirataḥ saṁsiddhiṁ labhate naraḥ । svakarmanirataḥ siddhiṁ yathā vindati tacchṛṇu ॥
भगवद् गीता बताती है कि अपने कर्म में निष्ठा मनुष्य को सिद्धि की ओर ले जाती है।
कर्तव्य पर और सुभाषित
विषय पृष्ठ देखेंवत्सराजोऽपि तं प्राप्तं प्रदत्तोपायनं नृपम्। प्रीत्या सम्मानयामास शूरा हि प्रणतिप्रियाः॥
vatsarājo 'pi taṃ prāptaṃ pradattopāyanaṃ nṛpam । prītyā sammānayāmāsa śūrā hi praṇatipriyāḥ ॥
भेंट लेकर आए राजा का वत्सराज स्नेह से सम्मान करते हैं। श्लोक वीरों के मन में विनम्र प्रणाम के प्रति आदर बताता है।
भस्मीकृतस्वार्थसौख्यपरिचर्चितविग्रहाः। स्वराज्ययोगनिर्मग्ना धन्यास्ते वीरयोगिनः॥
bhasmīkṛtasvārthasaukhyaparicarcitavigrahāḥ । svarājyayoganirmagnā dhanyās te vīrayoginaḥ ॥
यह श्लोक उन वीर साधकों को धन्य कहता है जो निजी सुख त्यागकर स्वराज्य की साधना में पूरी तरह समर्पित हैं।
नित्यं परिचरेच्चैव तद्वै सुकृतमुत्तमम्। कीर्तिं पुण्यं यशो लोकान् प्राप्स्यसे राजसत्तम॥
nityaṃ paricareccaiva tadvai sukṛtamuttamam । kīrtiṃ puṇyaṃ yaśo lokān prāpsyase rājasattama ॥
नित्य सेवा को श्रेष्ठ पुण्य कर्म बताया गया है, जिससे कीर्ति, यश और उत्तम लोकों की प्राप्ति होती है।