रामो विग्रहवान् धर्मस्साधुस्सत्यपराक्रमः। राजा सर्वस्य लोकस्य देवानां मघवानिव॥
rāmo vigrahavān dharmassādhussatyaparākramaḥ । rājā sarvasya lokasya devānāṃ maghavāniva ॥
रामो विग्रहवान् धर्मस्साधुस्सत्यपराक्रमः का अर्थ
भगवान् श्रीराम साक्षात् धर्म के जीवंत स्वरूप हैं। वे सज्जनों के परम आश्रय, सत्यसंकल्प एवं सत्यपराक्रमी हैं। वे इस संपूर्ण विश्व के ऐसे एकमात्र शासक हैं, जो समस्त लोकों का ठीक उसी प्रकार पालन और रक्षण करते हैं, जैसे देवराज इन्द्र संपूर्ण देवलोक के अधिपति और रक्षक हैं।
अनुवाद टिप्पणी: यह अनुवाद प्रधानमंत्री के X पोस्ट के वीडियो से यथावत् लिया गया है। साधुः का अर्थ सदाचारी है, सज्जनों का परम आश्रय नहीं। श्लोक में सत्यसंकल्प तथा समस्त लोकों के पालन और रक्षण का अलग से उल्लेख नहीं है।
शब्दार्थ
- रामोrāmo
राम; रामः का सन्धिरूप
- विग्रहवान्vigrahavān
साकार, मूर्तिमान
- धर्मस्साधुस्सत्यपराक्रमःdharmassādhussatyaparākramaḥ
धर्म, साधु और सत्य पराक्रम वाले; धर्मः + साधुः + सत्यपराक्रमः का सन्धिरूप
- राजाrājā
राजा
- सर्वस्यsarvasya
समस्त
- लोकस्यlokasya
लोक के
- देवानांdevānāṃ
देवताओं के
- मघवानिवmaghavāniva
इन्द्र के समान; मघवान् + इव, उपमा का अव्यय इव सहित
व्याख्या
विग्रहवान् धर्मः कहकर श्रीराम में धर्म का साकार रूप देखा गया है। उनके आचरण से धर्म जैसा विचार व्यक्ति के जीवन में दिखाई देता है। साधुः उनकी सज्जनता का बोध कराता है और सत्यपराक्रमः उनके पराक्रम को सत्य से जोड़ता है। दूसरी पंक्ति में समस्त लोक के राजा के रूप में उनकी तुलना देवताओं के राजा इन्द्र से की गई है। आज नेतृत्व को परखते समय यह वर्णन आचरण और शक्ति के उपयोग के उद्देश्य पर ध्यान देने की प्रेरणा देता है।
मूल पोस्ट
वाल्मीकि रामायण से और सुभाषित
स्रोत पृष्ठ देखेंदैवं पुरुषकारेण यः समर्थः प्रबाधितुम्। न दैवेन विपन्नार्थः पुरुषः सोऽवसीदति॥
daivaṁ puruṣakāreṇa yaḥ samarthaḥ prabādhitum । na daivena vipannārthaḥ puruṣaḥ so’vasīdati ॥
वाल्मीकि रामायण का यह श्लोक सिखाता है कि जो मनुष्य पुरुषार्थ से दैव का सामना करने में समर्थ है, वह विपरीत परिस्थितियों में निराश नहीं होता।
लोकपालाश्च ते सर्वे वासवप्रमुखास्तथा। ऋतवः षट् च ते सर्वे मासाः संवत्सराः क्षपाः॥ दिनानि च मुहूर्ताश्च स्वस्ति कुर्वन्तु ते सदा। श्रुतिः स्मृतिश्च धर्मश्च पातु त्वां पुत्र सर्वतः॥
lokapālāśca te sarve vāsavapramukhāstathā । ṛtavaḥ ṣaṭ ca te sarve māsāḥ saṁvatsarāḥ kṣapāḥ ॥ dināni ca muhūrtāśca svasti kurvantu te sadā । śrutiḥ smṛtiśca dharmaśca pātu tvāṁ putra sarvataḥ ॥
अयोध्या काण्ड के इस आशीर्वचन में लोकपालों, कालचक्र, श्रुति-स्मृति और धर्म से निरंतर मंगल तथा सर्वांगीण रक्षा की प्रार्थना की गई है।
अनिर्वेदः श्रियो मूलमनिर्वेदः परं सुखम्। अनिर्वेदो हि सततं सर्वार्थेषु प्रवर्तकः॥
anirvedaḥ śriyo mūlam anirvedaḥ paraṁ sukham । anirvedo hi satataṁ sarvārtheṣu pravartakaḥ ॥
वाल्मीकि रामायण के सुन्दर काण्ड का यह श्लोक बताता है कि निराशा से मुक्त उत्साह, दृढ़ विश्वास और सतत प्रयास ही उन्नति और सफलता का आधार हैं।
धर्म पर और सुभाषित
विषय पृष्ठ देखेंप्रथमवयसि पीतं तोयमल्पं स्मरन्तः शिरसि निहितभारा नारिकेला नराणाम्। ददति जलमनल्पास्वादमाजीवितान्तं न हि कृतमुपकारं साधवो विस्मरन्ति॥
prathamavayasi pītaṃ toyamalpaṃ smarantaḥ śirasi nihitabhārā nārikelā narāṇām । dadati jalamanalpāsvādamājīvitāntaṃ na hi kṛtamupakāraṃ sādhavo vismaranti ॥
नारियल का वृक्ष बचपन में मिले थोड़े जल के बदले जीवन भर मधुर जल देता है। यही सज्जनों की कृतज्ञता का उदाहरण है।
वत्सराजोऽपि तं प्राप्तं प्रदत्तोपायनं नृपम्। प्रीत्या सम्मानयामास शूरा हि प्रणतिप्रियाः॥
vatsarājo 'pi taṃ prāptaṃ pradattopāyanaṃ nṛpam । prītyā sammānayāmāsa śūrā hi praṇatipriyāḥ ॥
भेंट लेकर आए राजा का वत्सराज स्नेह से सम्मान करते हैं। श्लोक वीरों के मन में विनम्र प्रणाम के प्रति आदर बताता है।
भस्मीकृतस्वार्थसौख्यपरिचर्चितविग्रहाः। स्वराज्ययोगनिर्मग्ना धन्यास्ते वीरयोगिनः॥
bhasmīkṛtasvārthasaukhyaparicarcitavigrahāḥ । svarājyayoganirmagnā dhanyās te vīrayoginaḥ ॥
यह श्लोक उन वीर साधकों को धन्य कहता है जो निजी सुख त्यागकर स्वराज्य की साधना में पूरी तरह समर्पित हैं।