लोकपालाश्च ते सर्वे वासवप्रमुखास्तथा। ऋतवः षट् च ते सर्वे मासाः संवत्सराः क्षपाः॥ दिनानि च मुहूर्ताश्च स्वस्ति कुर्वन्तु ते सदा। श्रुतिः स्मृतिश्च धर्मश्च पातु त्वां पुत्र सर्वतः॥
lokapālāśca te sarve vāsavapramukhāstathā । ṛtavaḥ ṣaṭ ca te sarve māsāḥ saṁvatsarāḥ kṣapāḥ ॥ dināni ca muhūrtāśca svasti kurvantu te sadā । śrutiḥ smṛtiśca dharmaśca pātu tvāṁ putra sarvataḥ ॥
प्रधानमंत्री का संदेशप्रकृति के संरक्षण और सम्मान में ही मानवता का कल्याण निहित है। हमारी परंपरा भी हमें इसी धर्मसम्मत आचरण की प्रेरणा देती है।
लोकपालाश्च ते सर्वे वासवप्रमुखास्तथा का अर्थ
प्रकृति और धर्म के साथ सामंजस्यपूर्ण जीवन ही सुख, सुरक्षा और मंगल का आधार है। अतः दिशाओं के रक्षक देवता, इन्द्र आदि प्रमुख देवगण, छहों ऋतुएँ, सभी मास, वर्ष, रात्रियाँ, दिन और शुभ मुहूर्त सदैव कल्याणकारी हों। वेद, स्मृतियाँ और धर्म भी सभी प्रकार से सर्वत्र सबकी रक्षा करें।
शब्दार्थ
- लोकपालाःlokapālāḥ
लोकपाल
लोक + √पाल्
- च ते सर्वेca te sarve
और वे सब
सर्व
- वासवप्रमुखाःvāsavapramukhāḥ
इन्द्र आदि
वासव + प्रमुख
- ऋतवः षट्ṛtavaḥ ṣaṭ
छह ऋतुएँ
√ऋ + षष्
- मासाःmāsāḥ
मास
मास
- संवत्सराःsaṁvatsarāḥ
संवत्सर
सम् + वत्सर
- क्षपाःkṣapāḥ
रात्रियाँ
क्षपा
- दिनानिdināni
दिन
दिन
- मुहूर्ताःmuhūrtāḥ
मुहूर्त
मुहूर्त
- स्वस्ति कुर्वन्तुsvasti kurvantu
कल्याण करें
सु + √अस् + √कृ
- ते सदाte sadā
तुम्हारा सदा
- श्रुतिः स्मृतिःśrutiḥ smṛtiḥ
श्रुति और स्मृति
√श्रु + √स्मृ
- धर्मःdharmaḥ
और धर्म
√धृ
- पातु त्वाम्pātu tvām
तुम्हारी रक्षा करें
√पा
- पुत्रputra
हे पुत्र
पुत्र
- सर्वतःsarvataḥ
सब ओर से
सर्व
व्याख्या
यह मंगलकामना लोकपालों और काल के विशाल क्रम को एक ही रक्षात्मक वलय में समेटती है। छह ऋतुएँ, मास, संवत्सर, रात्रियाँ, दिन और मुहूर्त मनुष्य के जीवन को प्रकृति की व्यापक लय का अंग बताते हैं, उससे पृथक नहीं। ‘स्वस्ति’ स्थायी मंगल की कामना है, जबकि ‘पातु’ चारों ओर से रक्षा की प्रार्थना को व्यक्त करता है। अन्तिम पंक्ति में ‘श्रुति’, ‘स्मृति’ और ‘धर्म’ को इन्हीं विश्वव्यापी शक्तियों के साथ रखा गया है; इस प्रकार पवित्र ज्ञान, स्मरणीय परम्परा और उचित आचरण भी रक्षा के आधार बनते हैं। रामायण में ये शब्द कौसल्या द्वारा अपने पुत्र को दिए गए आशीर्वाद का भाग हैं, इसलिए बार-बार आया ‘पुत्र’ इस प्रार्थना को मातृस्नेह से भर देता है। साथ का संदेश इसी दृष्टि से आधुनिक शिक्षा ग्रहण करता है कि प्रकृति का सम्मान और संरक्षण मानव-कल्याण का धर्मसम्मत मार्ग है।
मूल पोस्ट
वाल्मीकि रामायण से और सुभाषित
स्रोत पृष्ठ देखेंदैवं पुरुषकारेण यः समर्थः प्रबाधितुम्। न दैवेन विपन्नार्थः पुरुषः सोऽवसीदति॥
daivaṁ puruṣakāreṇa yaḥ samarthaḥ prabādhitum । na daivena vipannārthaḥ puruṣaḥ so’vasīdati ॥
वाल्मीकि रामायण का यह श्लोक सिखाता है कि जो मनुष्य पुरुषार्थ से दैव का सामना करने में समर्थ है, वह विपरीत परिस्थितियों में निराश नहीं होता।
अनिर्वेदः श्रियो मूलमनिर्वेदः परं सुखम्। अनिर्वेदो हि सततं सर्वार्थेषु प्रवर्तकः॥
anirvedaḥ śriyo mūlam anirvedaḥ paraṁ sukham । anirvedo hi satataṁ sarvārtheṣu pravartakaḥ ॥
वाल्मीकि रामायण के सुन्दर काण्ड का यह श्लोक बताता है कि निराशा से मुक्त उत्साह, दृढ़ विश्वास और सतत प्रयास ही उन्नति और सफलता का आधार हैं।
अनिर्वेदो हि सततं सर्वार्थेषु प्रवर्तकः। करोति सफलं जन्तोः कर्म यच्च करोति सः॥
anirvedo hi satataṁ sarvārtheṣu pravartakaḥ । karoti saphalaṁ jantoḥ karma yacca karoti saḥ ॥
वाल्मीकि रामायण का यह श्लोक सिखाता है कि किस प्रकार उत्साह और सकारात्मक ऊर्जा किसी भी कार्य को सफल बनाने के लिए आवश्यक हैं।
धर्म पर और सुभाषित
विषय पृष्ठ देखेंसुखोपविष्टास्ते तत्र पुण्यां चक्रुः कथामिमाम्। धर्मार्थकाममोक्षाणामारोग्यं मूलमुत्तमम्॥
sukhopaviṣṭās te tatra puṇyāṃ cakruḥ kathām imām । dharmārthakāmamokṣāṇām ārogyaṃ mūlam uttamam ॥
चरक संहिता आरोग्य को धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष इन चारों पुरुषार्थों की प्राप्ति का सर्वोत्तम आधार बताती है।
सुत्रामाणं पृथिवीं द्यामनेहसं सुशर्माणमदितिं सुप्रणीतिम् । दैवीं नावं स्वरित्रामनागसो अस्रवन्तीमा रुहेमा स्वस्तये॥
sutrāmāṇaṃ pṛthivīṃ dyām anehasaṃ suśarmāṇam aditiṃ supraṇītim । daivīṃ nāvaṃ svaritrām anāgaso asravantīm ā ruhemā svastaye ॥
अथर्ववेद का यह मन्त्र पृथ्वी, द्युलोक और अदिति को सुरक्षित दिव्य नौका के रूप में देखता है, जो मनुष्य को कल्याण की ओर ले जाती है।
एको धर्मः परं श्रेयः क्षमैका शान्तिरुत्तमा। विद्यैका परमा तृप्तिरहिंसैका सुखावहा॥
eko dharmaḥ paraṁ śreyaḥ kṣamaikā śāntir uttamā । vidyaikā paramā tṛptir ahiṁsaikā sukhāvahā ॥
महाभारत की विदुर नीति का यह श्लोक चार गुणों को उनके फल से जोड़ता है: धर्म परम कल्याण देता है, क्षमा उत्तम शांति, विद्या सच्ची तृप्ति और अहिंसा स्थाई सुख।