वाल्मीकि रामायण से सुभाषित
यह स्रोत 6 विषयों में फैले 8 सुभाषित प्रदान करता है।
नवीनतम अद्यतन: 13 अग॰ 2026
संबंधित मार्गदर्शिकाएँ और श्लोक चयन
दैवं पुरुषकारेण यः समर्थः प्रबाधितुम्। न दैवेन विपन्नार्थः पुरुषः सोऽवसीदति॥
daivaṁ puruṣakāreṇa yaḥ samarthaḥ prabādhitum । na daivena vipannārthaḥ puruṣaḥ so’vasīdati ॥
वाल्मीकि रामायण का यह श्लोक सिखाता है कि जो मनुष्य पुरुषार्थ से दैव का सामना करने में समर्थ है, वह विपरीत परिस्थितियों में निराश नहीं होता।
लोकपालाश्च ते सर्वे वासवप्रमुखास्तथा। ऋतवः षट् च ते सर्वे मासाः संवत्सराः क्षपाः॥ दिनानि च मुहूर्ताश्च स्वस्ति कुर्वन्तु ते सदा। श्रुतिः स्मृतिश्च धर्मश्च पातु त्वां पुत्र सर्वतः॥
lokapālāśca te sarve vāsavapramukhāstathā । ṛtavaḥ ṣaṭ ca te sarve māsāḥ saṁvatsarāḥ kṣapāḥ ॥ dināni ca muhūrtāśca svasti kurvantu te sadā । śrutiḥ smṛtiśca dharmaśca pātu tvāṁ putra sarvataḥ ॥
अयोध्या काण्ड के इस आशीर्वचन में लोकपालों, कालचक्र, श्रुति-स्मृति और धर्म से निरंतर मंगल तथा सर्वांगीण रक्षा की प्रार्थना की गई है।
अनिर्वेदः श्रियो मूलमनिर्वेदः परं सुखम्। अनिर्वेदो हि सततं सर्वार्थेषु प्रवर्तकः॥
anirvedaḥ śriyo mūlam anirvedaḥ paraṁ sukham । anirvedo hi satataṁ sarvārtheṣu pravartakaḥ ॥
वाल्मीकि रामायण के सुन्दर काण्ड का यह श्लोक बताता है कि निराशा से मुक्त उत्साह, दृढ़ विश्वास और सतत प्रयास ही उन्नति और सफलता का आधार हैं।
अनिर्वेदो हि सततं सर्वार्थेषु प्रवर्तकः। करोति सफलं जन्तोः कर्म यच्च करोति सः॥
anirvedo hi satataṁ sarvārtheṣu pravartakaḥ । karoti saphalaṁ jantoḥ karma yacca karoti saḥ ॥
वाल्मीकि रामायण का यह श्लोक सिखाता है कि किस प्रकार उत्साह और सकारात्मक ऊर्जा किसी भी कार्य को सफल बनाने के लिए आवश्यक हैं।
व्यसने वाऽर्थकृच्छ्रे वा भये वा जीवनान्तके। विमृशन् वै स्वया बुद्ध्या धृतिमान् नावसीदति॥
vyasane vā’rthakṛcchre vā bhaye vā jīvanāntake । vimṛśan vai svayā buddhyā dhṛtimān nāvasīdati ॥
वाल्मीकि रामायण का यह श्लोक सिखाता है कि आर्थिक संकट या प्राणों के भय की स्थिति में कैसे धैर्य और स्वयं के विवेक द्वारा दुःख और मानसिक अवसाद से बचा जा सकता है।
उत्साहो बलवानार्य नास्त्युत्साहात् परं बलम्। सोत्साहस्यास्ति लोकेऽस्मिन् न किञ्चिदपि दुर्लभम्॥
utsāho balavān ārya nāsty utsāhāt paraṃ balam । sotsāhasyāsti loke’smin na kiñcid api durlabham ॥
उत्साह ही सबसे बड़ा बल है। रामायण का यह श्लोक हमें याद दिलाता है कि एक उत्साही व्यक्ति के लिए कोई भी लक्ष्य दुर्लभ नहीं है।
न मर्षयन्ति चात्मानं सम्भावयितुमात्मना। अदर्शयित्वा शूरास्तु कर्म कुर्वन्ति दुष्करम्॥
na marśayanti cātmānaṁ sambhāvayitum ātmana । adarśayitvā śūrāstu karma kurvanti duṣkaraṁ ॥
सच्चे वीर अपनी महानता का स्वयं बखान नहीं करते; उनके कठिन कर्म और मौन साहस ही उनका मूल्य प्रकट करते हैं।
क्रोधः प्राणहरः शत्रुः क्रोधो मित्रमुखो रिपुः। क्रोधो ह्यसिर्महातीक्ष्णः सर्वं क्रोधोऽपकर्षति॥
krodhaḥ prāṇaharaḥ śatruḥ krodho mitramukho ripuḥ । krodho hy asir mahātīkṣṇaḥ sarvaṃ krodho ’pakarṣati ॥
क्रोध भीतर बसने वाला ऐसा शत्रु है जो विनाशकारी, दुर्जेय और अंततः उसे धारण करने वाले व्यक्ति के पतन का कारण बनता है।