अनिर्वेदो हि सततं सर्वार्थेषु प्रवर्तकः। करोति सफलं जन्तोः कर्म यच्च करोति सः॥
anirvedo hi satataṁ sarvārtheṣu pravartakaḥ । karoti saphalaṁ jantoḥ karma yacca karoti saḥ ॥
प्रधानमंत्री का संदेशकर्मशील और ऊर्जावान देशवासी ही राष्ट्र की सबसे बड़ी शक्ति हैं, जिनके परिश्रम से विकास की नई राहें तय होती हैं। इनके प्रयासों से देश समृद्धि, आत्मनिर्भरता और उन्नति के शिखर को छूता है।
अनिर्वेदो हि सततं सर्वार्थेषु का अर्थ
उत्साह और सकारात्मक ऊर्जा मनुष्य को निरंतर कर्मशील रहने की प्रेरणा देते हैं। यही अटूट उत्साह व्यक्ति के उन सभी प्रयासों को सफलता तक पहुँचाता है, जिन्हें वह पूर्ण करने का संकल्प लेता है।
शब्दार्थ
- अनिर्वेदःanirvedaḥ
अनिर्वेद, विषाद का अभाव
अ + निस् + √विद्
नञ् समास—उत्साह का शब्द नहीं।
- हिhi
निश्चय ही
- सततम्satatam
सदा
सम् + √तन्
- सर्वार्थेषुsarvārtheṣu
सभी प्रयोजनों में
सर्व + अर्थ
- प्रवर्तकःpravartakaḥ
प्रवर्तक
प्र + √वृत्
- करोतिkaroti
करता है
√कृ
- सफलम्saphalam
सफल
स + फल
- जन्तोःjantoḥ
प्राणी का
√जन्
- कर्मkarma
कर्म
√कृ
- यत् च करोति सःyac ca karoti saḥ
जो भी वह करता है
√कृ
व्याख्या
यह श्लोक वाल्मीकि रामायण के सुन्दर काण्ड में हनुमान जी द्वारा उस समय कहा गया है जब वे लंका में सीता जी को खोजते हुए निराश हो जाते हैं। इस श्लोक के माध्यम से वे स्वयं को प्रेरित करते हैं कि 'अनिर्वेद' (निराशा का अभाव या उत्साह) ही सभी सिद्धियों का मूल है। यह स्पष्ट करता है कि बिना थके और बिना निराश हुए लगातार प्रयास करना ही किसी भी कार्य में सफलता दिलाता है। साझा अर्थ में 'अनिर्वेद' को उत्साह और सकारात्मक ऊर्जा कहा गया है, जबकि यह नकारात्मक समास है—निर्वेद अर्थात् विषाद, और अनिर्वेद अर्थात् विषाद का अभाव। हनुमान यह वचन अशोकवाटिका में अपनी सबसे कठिन घड़ी में कहते हैं; श्लोक का बल उत्साह जगाने में नहीं, हार न मानने में है।
मूल पोस्ट
वाल्मीकि रामायण से और सुभाषित
स्रोत पृष्ठ देखेंदैवं पुरुषकारेण यः समर्थः प्रबाधितुम्। न दैवेन विपन्नार्थः पुरुषः सोऽवसीदति॥
daivaṁ puruṣakāreṇa yaḥ samarthaḥ prabādhitum । na daivena vipannārthaḥ puruṣaḥ so’vasīdati ॥
वाल्मीकि रामायण का यह श्लोक सिखाता है कि जो मनुष्य पुरुषार्थ से दैव का सामना करने में समर्थ है, वह विपरीत परिस्थितियों में निराश नहीं होता।
लोकपालाश्च ते सर्वे वासवप्रमुखास्तथा। ऋतवः षट् च ते सर्वे मासाः संवत्सराः क्षपाः॥ दिनानि च मुहूर्ताश्च स्वस्ति कुर्वन्तु ते सदा। श्रुतिः स्मृतिश्च धर्मश्च पातु त्वां पुत्र सर्वतः॥
lokapālāśca te sarve vāsavapramukhāstathā । ṛtavaḥ ṣaṭ ca te sarve māsāḥ saṁvatsarāḥ kṣapāḥ ॥ dināni ca muhūrtāśca svasti kurvantu te sadā । śrutiḥ smṛtiśca dharmaśca pātu tvāṁ putra sarvataḥ ॥
अयोध्या काण्ड के इस आशीर्वचन में लोकपालों, कालचक्र, श्रुति-स्मृति और धर्म से निरंतर मंगल तथा सर्वांगीण रक्षा की प्रार्थना की गई है।
अनिर्वेदः श्रियो मूलमनिर्वेदः परं सुखम्। अनिर्वेदो हि सततं सर्वार्थेषु प्रवर्तकः॥
anirvedaḥ śriyo mūlam anirvedaḥ paraṁ sukham । anirvedo hi satataṁ sarvārtheṣu pravartakaḥ ॥
वाल्मीकि रामायण के सुन्दर काण्ड का यह श्लोक बताता है कि निराशा से मुक्त उत्साह, दृढ़ विश्वास और सतत प्रयास ही उन्नति और सफलता का आधार हैं।
दृढ़ता पर और सुभाषित
विषय पृष्ठ देखेंवत्सराजोऽपि तं प्राप्तं प्रदत्तोपायनं नृपम्। प्रीत्या सम्मानयामास शूरा हि प्रणतिप्रियाः॥
vatsarājo 'pi taṃ prāptaṃ pradattopāyanaṃ nṛpam । prītyā sammānayāmāsa śūrā hi praṇatipriyāḥ ॥
भेंट लेकर आए राजा का वत्सराज स्नेह से सम्मान करते हैं। श्लोक वीरों के मन में विनम्र प्रणाम के प्रति आदर बताता है।
भस्मीकृतस्वार्थसौख्यपरिचर्चितविग्रहाः। स्वराज्ययोगनिर्मग्ना धन्यास्ते वीरयोगिनः॥
bhasmīkṛtasvārthasaukhyaparicarcitavigrahāḥ । svarājyayoganirmagnā dhanyās te vīrayoginaḥ ॥
यह श्लोक उन वीर साधकों को धन्य कहता है जो निजी सुख त्यागकर स्वराज्य की साधना में पूरी तरह समर्पित हैं।
नित्यं परिचरेच्चैव तद्वै सुकृतमुत्तमम्। कीर्तिं पुण्यं यशो लोकान् प्राप्स्यसे राजसत्तम॥
nityaṃ paricareccaiva tadvai sukṛtamuttamam । kīrtiṃ puṇyaṃ yaśo lokān prāpsyase rājasattama ॥
नित्य सेवा को श्रेष्ठ पुण्य कर्म बताया गया है, जिससे कीर्ति, यश और उत्तम लोकों की प्राप्ति होती है।