राज्ञो हि व्रतमुत्थानं यज्ञः कार्यानुशासनम्। दक्षिणा वृत्तिसाम्यं च दीक्षितस्याभिषेचनम्॥
rājño hi vratamutthānaṁ yajñaḥ kāryānuśāsanam । dakṣiṇā vṛttisāmyaṁ ca dīkṣitasyābhiṣecanam ॥
प्रधानमंत्री का संदेशदेश के एक सजग नागरिक के रूप में हमारा कर्तव्य है कि हम लोकतंत्र को और अधिक सशक्त बनाने के लिए रिकॉर्ड मतदान सुनिश्चित करें। इस तरह हम न केवल भारतवर्ष के नवनिर्माण में अपनी सक्रिय भागीदारी निभा सकते हैं, बल्कि एक समर्थ और समृद्ध राष्ट्र की नींव को और मजबूत कर सकते हैं।
राज्ञो हि व्रतमुत्थानं यज्ञः का अर्थ
लोककल्याण की दृष्टि से प्रजा का सतत उत्थान करना, यज्ञरूप कर्तव्यों का निष्ठापूर्वक पालन करना, न्यायपूर्ण निर्णय करना, उदारतापूर्वक दान देना, सभी के साथ समभाव रखना तथा दीक्षित भाव से स्वयं को शुद्ध, संयमित और समर्पित बनाए रखना-यही जनप्रतिनिधि का वास्तविक संकल्प है।
शब्दार्थ
- राज्ञःrājñaḥ
राजा का
राजन्
- हिhi
निश्चय ही
- व्रतम्vratam
व्रत
√वृ
- उत्थानम्utthānam
उद्यम
उद् + √स्था
- यज्ञःyajñaḥ
यज्ञ
√यज्
- कार्यानुशासनम्kāryānuśāsanam
कार्यों का अनुशासन
√कृ + अनु + √शास्
- दक्षिणाdakṣiṇā
दक्षिणा
दक्षिणा
- वृत्तिसाम्यम्vṛttisāmyam
वृत्ति में समता
√वृत् + सम
- चca
और
- दीक्षितस्यdīkṣitasya
दीक्षित का
√दीक्ष्
- अभिषेचनम्abhiṣecanam
अभिषेक
अभि + √सिच्
व्याख्या
चाणक्य (कौटिल्य) इस श्लोक में शासन को एक 'यज्ञ' के रूप में परिभाषित करते हैं। यहाँ 'उत्थान' का अर्थ केवल जागना नहीं, बल्कि प्रजा के कार्यों के लिए सदैव तत्पर रहना है। 'वृत्तिसाम्यम्' (समान व्यवहार) को यज्ञ की दक्षिणा बताकर कौटिल्य यह स्पष्ट करते हैं कि बिना निष्पक्षता के शासन अधूरा है। यह श्लोक आधुनिक लोकतंत्र में मतदान के महत्व को भी पुष्ट करता है, जहाँ नागरिक और प्रतिनिधि दोनों ही राष्ट्र निर्माण के इस महायज्ञ में दीक्षित होते हैं।
मूल पोस्ट
अर्थशास्त्र से और सुभाषित
स्रोत पृष्ठ देखेंप्रजासुखे सुखं राज्ञः प्रजानां च हिते हितम्। नात्मप्रियं प्रियं राज्ञः प्रजानां तु प्रियं प्रियम्॥
prajāsukhe sukhaṁ rājñaḥ prajānāṁ ca hite hitam । nātmapriyaṁ priyaṁ rājñaḥ prajānāṁ tu priyaṁ priyam ॥
कौटिल्य के अर्थशास्त्र का यह श्लोक सुशासन के मूल सिद्धांत को परिभाषित करता है: जनता की खुशी में ही नेतृत्व की सार्थकता है।
अनुत्थाने ध्रुवो नाशः प्राप्तस्यानागतस्य च। प्राप्यते फलमुत्थानाल्लभते चार्थसम्पदम्॥
anutthāne dhruvo nāśaḥ prāptasyānāgatasya ca । prāpyate phalam utthānāl labhate cārthasampadam ॥
निष्क्रियता निश्चित अवनति लाती है, जबकि उद्यम और परिश्रम से ही समृद्धि तथा सार्थक फल प्राप्त होते हैं।
सुशासन पर और सुभाषित
विषय पृष्ठ देखेंनित्यं परिचरेच्चैव तद्वै सुकृतमुत्तमम्। कीर्तिं पुण्यं यशो लोकान् प्राप्स्यसे राजसत्तम॥
nityaṃ paricareccaiva tadvai sukṛtamuttamam । kīrtiṃ puṇyaṃ yaśo lokān prāpsyase rājasattama ॥
नित्य सेवा को श्रेष्ठ पुण्य कर्म बताया गया है, जिससे कीर्ति, यश और उत्तम लोकों की प्राप्ति होती है।
ज्ञानवांश्च तथा वाग्मी कर्मस्वपि च निष्ठितः। एवं युक्तोऽपि न श्रेयान् यदि शीलविवर्जितः॥
jñānavāṃśca tathā vāgmī karmasvapi ca niṣṭhitaḥ । evaṃ yukto'pi na śreyān yadi śīlavivarjitaḥ ॥
ज्ञान, वाक्पटुता और कर्मकुशलता होने पर भी सदाचार से रहित व्यक्ति श्रेष्ठ नहीं होता।
शुचित्वं त्यागिता शौर्यं सामान्यं सुखदुःखयोः। दाक्षिण्यं चानुरक्तिश्च सत्यता च सुहृद्गुणाः॥
śucitvaṃ tyāgitā śauryaṃ sāmānyaṃ sukhaduḥkhayoḥ । dākṣiṇyaṃ cānuraktiśca satyatā ca suhṛdguṇāḥ ॥
निर्मलता, त्याग, साहस, सुख-दुःख में समान भाव, शिष्टता, अनुराग और सत्यता सच्चे मित्र के गुण हैं।