गोपायितारं दातारं धर्मनित्यमतन्द्रितम्। अकामद्वेषसंयुक्तमनुरज्यन्ति मानवाः॥
gopāyitāraṁ dātāraṁ dharmanityamatandritam । akāmadveṣasaṁyuktam anurajyanti mānavāḥ ॥
प्रधानमंत्री का संदेशछत्रपति शिवाजी महाराज ने जन-जन के कल्याण को सदैव सर्वोपरि रखा और उनकी सुरक्षा के लिए स्वयं को समर्पित कर दिया। इसलिए उनका जीवन आज भी भारतवर्ष के लिए पथ-प्रदर्शक बना हुआ है।
गोपायितारं दातारं धर्मनित्यमतन्द्रितम् का अर्थ
लोग उसी जनप्रतिनिधि से स्नेह करते हैं, जो उनकी सुरक्षा को अपना कर्तव्य मानता है, लोककल्याण में तत्पर रहता है, धर्मनिष्ठ न्यायप्रिय एवं सदैव सजग रहता है तथा कामना और द्वेष जैसी आसक्तियों से ऊपर उठकर निष्पक्ष भाव से राज्य का संचालन करता है।
शब्दार्थ
- गोपायितारम्gopāyitāram
रक्षा करने वाले को
√गुप्
- दातारम्dātāram
देने वाले को
√दा
- धर्मनित्यम्dharmanityam
धर्म में नित्य
धर्म + नित्य
- अतन्द्रितम्atandritam
आलस्यरहित
अ + √तन्द्र्
- अकामद्वेषसंयुक्तम्akāmadveṣasaṁyuktam
काम और द्वेष से रहित
अ + काम + द्वेष + सम् + √युज्
- अनुरज्यन्तिanurajyanti
अनुराग करते हैं
अनु + √रञ्ज्
√रञ्ज् अर्थात् रँगना—धीरे-धीरे उतरता अनुराग।
- मानवाःmānavāḥ
मनुष्य
मनु
व्याख्या
महाभारत के शान्ति पर्व का यह श्लोक 'राजधर्म' के मूलभूत सिद्धांतों को परिभाषित करता है। यह स्पष्ट करता है कि एक शासक या नेता की लोकप्रियता और सफलता उसके पद पर नहीं, बल्कि उसके चरित्र और कर्तव्य-परायणता पर निर्भर करती है। 'गोपायितारम्' (रक्षक) और 'धर्मनित्यम्' (सदा धर्मपरायण) जैसे शब्द यह दर्शाते हैं कि नेता का प्राथमिक उत्तरदायित्व समाज का संरक्षण और न्याय है। 'अकामद्वेषसंयुक्तम्' यानी इच्छा और द्वेष से मुक्त होकर शासन करना ही सुशासन की वास्तविक कसौटी है, जिसे छत्रपति शिवाजी महाराज ने अपने जीवन में चरितार्थ किया। अन्त की क्रिया इस श्लोक का सबसे सटीक शब्द है। 'अनुरज्यन्ति' √रञ्ज् से बना है अर्थात् रँगा जाना—अतः कहा गया है कि प्रजा ऐसे शासक की ओर रँग जाती है। इस प्रकार का अनुराग समय के साथ भीतर उतरता है और माँगा नहीं जा सकता; यही कारण है कि उससे पूर्व के चारों गुण कर्म नहीं, निरन्तर बनी रहने वाली अवस्थाएँ हैं—रक्षा करना, देना, धर्म में नित्य रहना, अतन्द्रित रहना।
स्रोत और पाठभेद
यह श्लोक यहाँ भी उपलब्ध है
मूल पोस्ट
महाभारत से और सुभाषित
स्रोत पृष्ठ देखेंनित्यं परिचरेच्चैव तद्वै सुकृतमुत्तमम्। कीर्तिं पुण्यं यशो लोकान् प्राप्स्यसे राजसत्तम॥
nityaṃ paricareccaiva tadvai sukṛtamuttamam । kīrtiṃ puṇyaṃ yaśo lokān prāpsyase rājasattama ॥
नित्य सेवा को श्रेष्ठ पुण्य कर्म बताया गया है, जिससे कीर्ति, यश और उत्तम लोकों की प्राप्ति होती है।
अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च। निर्ममो निरहङ्कारः समदुःखसुखः क्षमी॥
adveṣṭā sarvabhūtānāṃ maitraḥ karuṇa eva ca । nirmamo nirahaṅkāraḥ samaduḥkhasukhaḥ kṣamī ॥
भगवद् गीता द्वेष और अहंकार से मुक्त, सभी प्राणियों के प्रति मैत्री रखने वाले और सुख-दुःख में सम रहने वाले व्यक्ति के गुण बताती है।
स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः संसिद्धिं लभते नरः। स्वकर्मनिरतः सिद्धिं यथा विन्दति तच्छृणु॥
sve sve karmaṇyabhirataḥ saṁsiddhiṁ labhate naraḥ । svakarmanirataḥ siddhiṁ yathā vindati tacchṛṇu ॥
भगवद् गीता बताती है कि अपने कर्म में निष्ठा मनुष्य को सिद्धि की ओर ले जाती है।
सुशासन पर और सुभाषित
विषय पृष्ठ देखेंनित्यं परिचरेच्चैव तद्वै सुकृतमुत्तमम्। कीर्तिं पुण्यं यशो लोकान् प्राप्स्यसे राजसत्तम॥
nityaṃ paricareccaiva tadvai sukṛtamuttamam । kīrtiṃ puṇyaṃ yaśo lokān prāpsyase rājasattama ॥
नित्य सेवा को श्रेष्ठ पुण्य कर्म बताया गया है, जिससे कीर्ति, यश और उत्तम लोकों की प्राप्ति होती है।
ज्ञानवांश्च तथा वाग्मी कर्मस्वपि च निष्ठितः। एवं युक्तोऽपि न श्रेयान् यदि शीलविवर्जितः॥
jñānavāṃśca tathā vāgmī karmasvapi ca niṣṭhitaḥ । evaṃ yukto'pi na śreyān yadi śīlavivarjitaḥ ॥
ज्ञान, वाक्पटुता और कर्मकुशलता होने पर भी सदाचार से रहित व्यक्ति श्रेष्ठ नहीं होता।
शुचित्वं त्यागिता शौर्यं सामान्यं सुखदुःखयोः। दाक्षिण्यं चानुरक्तिश्च सत्यता च सुहृद्गुणाः॥
śucitvaṃ tyāgitā śauryaṃ sāmānyaṃ sukhaduḥkhayoḥ । dākṣiṇyaṃ cānuraktiśca satyatā ca suhṛdguṇāḥ ॥
निर्मलता, त्याग, साहस, सुख-दुःख में समान भाव, शिष्टता, अनुराग और सत्यता सच्चे मित्र के गुण हैं।