पूर्णमदः पूर्णमिदं - ज्ञान की अनंतता

20 फ़र॰ 2026

पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुदच्यते। पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते॥

pūrṇam adaḥ pūrṇam idaṃ pūrṇāt pūrṇam udacyate । pūrṇasya pūrṇam ādāya pūrṇam evāvaśiṣyate ॥

पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुदच्यते का अर्थ

ज्ञान का स्रोत जितना भी साझा किया जाए, वह कम नहीं होता। ज्ञान को बार-बार विकसित, विस्तारित और साझा करने पर भी मूल ज्ञान समाप्त नहीं होता बल्कि नई-नई संभावनाएँ उत्पन्न होती रहती हैं। ज्ञान की पूर्णता से अनन्त नवाचार जन्म लेते हैं।

शब्दार्थ

पूर्णम्pūrṇam

पूर्ण, सम्पूर्ण

√पॄ

अदःadaḥ

वह

अदस्

इदम्idam

यह

इदम्

पूर्णात्pūrṇāt

पूर्ण से

पूर्ण

पञ्चमी विभक्ति—जिससे उत्पन्न होता है।

उदच्यतेudacyate

उद्भूत होता है

उद् + √अञ्च्

पूर्णस्यpūrṇasya

पूर्ण का

पूर्ण

आदायādāya

लेकर

आ + √दा

एवeva

ही

एव

अवशिष्यतेavaśiṣyate

शेष रहता है

अव + √शिष्

व्याख्या

ईशावास्य और बृहदारण्यक उपनिषदों के साथ परंपरागत रूप से पढ़ा जाने वाला यह मंत्र ‘पूर्ण’ की वेदान्त-दृष्टि व्यक्त करता है। ‘वह’ और ‘यह’ दोनों पूर्ण हैं, क्योंकि समस्त प्रकट जगत ब्रह्म के बाहर नहीं, उसी में उदित होता है। पूर्ण में से पूर्ण लेने पर भी पूर्ण शेष रहने की भाषा साधारण गणित नहीं, उस अविभाज्य सत्य की ओर संकेत करती है जो अनेक रूपों में दिखाई देकर भी अखण्ड रहता है। पोस्ट में इस बिंब को ज्ञान और तकनीक पर लागू किया गया है, जहाँ किसी विचार को साझा करने से उसका स्रोत घटता नहीं और सामूहिक समझ बढ़ सकती है। यह उपयोगी आधुनिक उपमा है, पर मंत्र का मूल विषय आध्यात्मिक पूर्णता है, कृत्रिम बुद्धिमत्ता या सूचना-अर्थव्यवस्था नहीं।

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28 सित॰ 2026
चरक संहिता

सुखोपविष्टास्ते तत्र पुण्यां चक्रुः कथामिमाम्। धर्मार्थकाममोक्षाणामारोग्यं मूलमुत्तमम्॥

sukhopaviṣṭās te tatra puṇyāṃ cakruḥ kathām imām । dharmārthakāmamokṣāṇām ārogyaṃ mūlam uttamam ॥

चरक संहिता आरोग्य को धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष इन चारों पुरुषार्थों की प्राप्ति का सर्वोत्तम आधार बताती है।

स्वास्थ्यधर्मसमृद्धिआध्यात्मिकता
17 सित॰ 2026
विश्वकर्माष्टकम्

अनादिरप्रमेयश्च अरूपश्च जयाजयः। लोकरूपो जगन्नाथः विश्वकर्मन्नमो नमः॥

anādir aprameyaś ca arūpaś ca jayājayaḥ । lokarūpo jagannāthaḥ viśvakarman namo namaḥ ॥

विश्वकर्माष्टकम् का यह श्लोक अनादि, अप्रमेय और अरूप प्रभु को नमन करता है, जिनका स्वरूप सम्पूर्ण जगत है।

भक्तिआध्यात्मिकता
14 सित॰ 2026
गणेशपञ्चरत्नम्

मुदाकरात्तमोदकं सदा विमुक्तिसाधकं कलाधरावतंसकं विलासिलोकरक्षकम्। अनायकैकनायकं विनाशितेभदैत्यकं नताशुभाशुनाशकं नमामि तं विनायकम्॥

mudākarāttamodakaṁ sadā vimuktisādhakaṁ kalādharāvataṁsakaṁ vilāsilokarakṣakam । anāyakaikanāyakaṁ vināśitebhadaityakaṁ natāśubhāśunāśakaṁ namāmi taṁ vināyakam ॥

श्रीविनायक की यह भक्तिपूर्ण स्तुति उन्हें मुक्ति के साधक, जगत् के रक्षक और अशुभ के शीघ्र नाशक के रूप में नमन करती है।

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