अविज्ञातस्य विज्ञानं - बुद्धि के चार स्तंभ

23 फ़र॰ 2026

अविज्ञातस्य विज्ञानं विज्ञातस्य च निश्चयः। आरम्भः कर्मणां शश्वदारब्धस्यान्तदर्शनम्॥

avijñātasya vijñānaṃ vijñātasya ca niścayaḥ । ārambhaḥ karmaṇāṃ śaśvadārabdhasyāntadarśanam ॥

प्रधानमंत्री का संदेश

दिल्ली में हुए ऐतिहासिक AI समिट में पूरी दुनिया ने भारत के सामर्थ्य की जमकर सराहना की है। इससे पता चलता है कि टेक्नोलॉजी को लेकर हमारे युवा साथियों की सोच पूरी मानवता के बहुत काम आने वाली है।

अविज्ञातस्य विज्ञानं विज्ञातस्य च का अर्थ

अज्ञात ज्ञान को खोजने के लिए प्रयोग और अनुसंधान आवश्यक हैं। ज्ञात तथ्यों पर निर्णय और विश्लेषण ही शोध की शुरुआत है और अनुभव एवं अवलोकन से ही वह ज्ञान सत्यापित होता है।

शब्दार्थ

अविज्ञातस्यavijñātasya

अज्ञात का

अ + वि + √ज्ञा

विज्ञानम्vijñānam

ज्ञान प्राप्त करना

वि + √ज्ञा

विज्ञातस्यvijñātasya

ज्ञात का

वि + √ज्ञा

चca

और

निश्चयःniścayaḥ

निश्चय

निस् + √चि

आरम्भःārambhaḥ

आरम्भ

आ + √रभ्

कर्मणाम्karmaṇām

कर्मों का

√कृ

शश्वत्śaśvat

निरन्तर

आरब्धस्यārabdhasya

आरम्भ किए हुए का

आ + √रभ्

अन्तदर्शनम्antadarśanam

अन्त तक देखना

अन्त + √दृश्

व्याख्या

कामन्दकीय नीतिसार का यह श्लोक बुद्धिमत्तापूर्ण कर्म का पूरा चक्र बताता है। ‘अविज्ञातस्य विज्ञानम्’ अज्ञात की खोज, ‘विज्ञातस्य निश्चयः’ प्राप्त ज्ञान की दृढ़ समझ, ‘आरम्भः कर्मणाम्’ कार्य का निर्णायक आरम्भ और ‘आरब्धस्यान्तदर्शनम्’ आरम्भ किए काम को अंत तक पहुँचाना है। इस प्रकार बुद्धि की परीक्षा केवल अनुसंधान से नहीं, विवेकपूर्ण निर्णय और पूर्णता से भी होती है। पोस्ट में इस क्रम को भारत की एआई आकांक्षाओं और शोध को जनहित में बदलने से जोड़ा गया है। वह उपयुक्त आधुनिक उदाहरण है, जबकि श्लोक स्वयं किसी भी क्षेत्र में खोज और कार्यान्वयन का सामान्य अनुशासन प्रस्तुत करता है।

मूल पोस्ट

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कामन्दकीय नीतिसार से और सुभाषित

स्रोत पृष्ठ देखें
5 अक्टू॰ 2026
हितोपदेश

शुचित्वं त्यागिता शौर्यं सामान्यं सुखदुःखयोः। दाक्षिण्यं चानुरक्तिश्च सत्यता च सुहृद्गुणाः॥

śucitvaṃ tyāgitā śauryaṃ sāmānyaṃ sukhaduḥkhayoḥ । dākṣiṇyaṃ cānuraktiśca satyatā ca suhṛdguṇāḥ ॥

निर्मलता, त्याग, साहस, सुख-दुःख में समान भाव, शिष्टता, अनुराग और सत्यता सच्चे मित्र के गुण हैं।

चरित्रनैतिकतासाहस
10 जून 2026
कामन्दकीय नीतिसार

सदानुरक्तप्रकृतिः प्रजापालनतत्परः। विनीतात्मा हि नृपतिर्भूयसी श्रियमश्नुते॥

sadānuraktaprakṛtiḥ prajāpālanatatparaḥ । vinītātmā hi nṛpatir bhūyasī śriyam aśnute ॥

यह सुभाषित बताता है कि जनता के कल्याण, सुरक्षा और उन्नति के लिए विनम्र भाव से समर्पित नेतृत्व ही यश और समृद्धि पाता है।

सुशासननेतृत्वकर्तव्यनैतिकता
17 मार्च 2026
कामन्दकीय नीतिसार

एकोऽपि सिंहः साहस्रं यूथं मथ्नाति दन्तिनाम्। तस्मात् सिंहमिवोदारमात्मानं वीक्ष्य सम्पतेत्॥

eko'pi siṁhaḥ sāhasraṁ yūthaṁ mathnāti dantinām । tasmāt siṁham ivodāram ātmānaṁ vīkṣya sampatet ॥

जैसे एक अकेला सिंह हाथियों के झुंड पर भारी पड़ता है, वैसे ही साहस और संकल्प से मनुष्य कठिनतम चुनौतियों को पार कर सकता है।

साहसआत्मविश्वासचरित्रशक्ति

विद्या पर और सुभाषित

विषय पृष्ठ देखें
6 अक्टू॰ 2026
समराङ्गणसूत्रधार

ज्ञानवांश्च तथा वाग्मी कर्मस्वपि च निष्ठितः। एवं युक्तोऽपि न श्रेयान् यदि शीलविवर्जितः॥

jñānavāṃśca tathā vāgmī karmasvapi ca niṣṭhitaḥ । evaṃ yukto'pi na śreyān yadi śīlavivarjitaḥ ॥

ज्ञान, वाक्पटुता और कर्मकुशलता होने पर भी सदाचार से रहित व्यक्ति श्रेष्ठ नहीं होता।

विद्यासामर्थ्यचरित्रनैतिकता
1 अक्टू॰ 2026
नीतिशतकम्

रत्नैर्महाब्धेस्तुतुषुर्न देवा न भेजिरे भीमविषेण भीतिम्। सुधां विना न प्रययुर्विरामं न निश्चितार्थाद्विरमन्ति धीराः॥

ratnair mahābdhes tutuṣur na devā na bhejire bhīmaviṣeṇa bhītim । sudhāṃ vinā na prayayur virāmaṃ na niścitārthād viramanti dhīrāḥ ॥

भर्तृहरि समुद्र-मन्थन के प्रसंग से बताते हैं कि धीर व्यक्ति न बीच की उपलब्धियों पर रुकते हैं, न संकट के कारण अपने निश्चित लक्ष्य से हटते हैं।

दृढ़तासाहस
29 सित॰ 2026
सुभाषितरत्नभाण्डागारम्

उद्यमः साहसं धैर्यं बुद्धिः शक्तिः पराक्रमः। षडेते यत्र वर्तन्ते तत्र दैवं सहायकृत्॥

udyamaḥ sāhasaṃ dhairyaṃ buddhiḥ śaktiḥ parākramaḥ । ṣaḍete yatra vartante tatra daivaṃ sahāyakṛt ॥

उद्यम, साहस, धैर्य, बुद्धि, शक्ति और पराक्रम से युक्त व्यक्ति को दैव का सहयोग भी प्राप्त होता है।

दृढ़तासाहसविद्याशक्ति