दृढ़ता पर सुभाषित
यह विषय 6 स्रोतों से आए 48 सुभाषितों को एक साथ लाता है।
नवीनतम अद्यतन: 1 अक्टू॰ 2026
रत्नैर्महाब्धेस्तुतुषुर्न देवा न भेजिरे भीमविषेण भीतिम्। सुधां विना न प्रययुर्विरामं न निश्चितार्थाद्विरमन्ति धीराः॥
ratnair mahābdhes tutuṣur na devā na bhejire bhīmaviṣeṇa bhītim । sudhāṃ vinā na prayayur virāmaṃ na niścitārthād viramanti dhīrāḥ ॥
भर्तृहरि समुद्र-मन्थन के प्रसंग से बताते हैं कि धीर व्यक्ति न बीच की उपलब्धियों पर रुकते हैं, न संकट के कारण अपने निश्चित लक्ष्य से हटते हैं।
उद्यमः साहसं धैर्यं बुद्धिः शक्तिः पराक्रमः। षडेते यत्र वर्तन्ते तत्र दैवं सहायकृत्॥
udyamaḥ sāhasaṃ dhairyaṃ buddhiḥ śaktiḥ parākramaḥ । ṣaḍete yatra vartante tatra daivaṃ sahāyakṛt ॥
उद्यम, साहस, धैर्य, बुद्धि, शक्ति और पराक्रम से युक्त व्यक्ति को दैव का सहयोग भी प्राप्त होता है।
यथा यथा प्रयत्नः स्याद्भवेदाशु फलं तथा। इति पौरुषमेवास्ति दैवमस्तु तदेव च॥
yathā yathā prayatnaḥ syād bhaved āśu phalaṃ tathā । iti pauruṣam evāsti daivam astu tad eva ca ॥
योगवासिष्ठ का यह श्लोक फल को मनुष्य के प्रयत्न से जोड़ता है और पुरुषार्थ को ही दैव मानने की शिक्षा देता है।
अद्वैधमनसं युक्तं शूरं धीरं विपश्चितम्। न श्रीः सन्त्यजते नित्यमादित्यमिव रश्मयः॥
advaidhamanasaṃ yuktaṃ śūraṃ dhīraṃ vipaścitam । na śrīḥ santyajate nityam ādityamiva raśmayaḥ ॥
महाभारत समृद्धि को सूर्य की अविच्छिन्न किरणों के समान बताता है—वह एकाग्र, शूर, धीर और विवेकी व्यक्ति का साथ नहीं छोड़ती।
कारुण्येनात्मनो मानं तृष्णां च परितोषतः। उत्थानेन जयेत्तन्द्रीं वितर्कं निश्चयाज्जयेत्॥
kāruṇyenātmano mānaṃ tṛṣṇāṃ ca paritoṣataḥ । utthānena jayettandrīṃ vitarkaṃ niścayājjayet ॥
महाभारत का यह उपदेश करुणा से मान, सन्तोष से तृष्णा, पुरुषार्थ से आलस्य और निश्चय से वितर्क को जीतने की राह दिखाता है।
आपत्काले च कष्टेऽपि नोत्साहस्त्यज्यते बुधैः। इति प्रबोधितस्तेन कथञ्चिद् दृढबुद्धिना॥
āpatkāle ca kaṣṭe’pi notsāhas tyajyate budhaiḥ । iti prabodhitastena kathañcid dṛḍhabuddhinā ॥
कथासरित्सागर का यह अंश सिखाता है कि बुद्धिमान लोग संकट और कठिनाई में भी अपना उत्साह नहीं छोड़ते।
उद्यच्छेदेव न नमेदुद्यमो ह्येव पौरुषम्। अप्यपर्वणि भज्येत न नमेदिह कस्यचित्॥
udyacched eva na named udyamo hy eva pauruṣam । apy aparvaṇi bhajyeta na named iha kasyacit ॥
महाभारत का यह श्लोक उद्यम को ही पौरुष बताता है: मनुष्य निरंतर प्रयत्न करे और कभी न झुके, चाहे उसे झुकने के बजाय टूटना ही क्यों न पड़े।
उद्यमस्य प्रसादेन दृश्यन्ते विविधाः कलाः। कातरा एव जल्पन्ति यद् भाव्यं तद् भविष्यति॥
udyamasya prasādena dṛśyante vividhāḥ kalāḥ । kātarā eva jalpanti yad bhāvyaṁ tad bhaviṣyati ॥
महासुभाषितसंग्रह का यह श्लोक कहता है कि उद्यम से विविध कलाएँ प्रकट होती हैं, जबकि कातर लोग भाग्य की बात भर करते हैं।
दैवं पुरुषकारेण यः समर्थः प्रबाधितुम्। न दैवेन विपन्नार्थः पुरुषः सोऽवसीदति॥
daivaṁ puruṣakāreṇa yaḥ samarthaḥ prabādhitum । na daivena vipannārthaḥ puruṣaḥ so’vasīdati ॥
वाल्मीकि रामायण का यह श्लोक सिखाता है कि जो मनुष्य पुरुषार्थ से दैव का सामना करने में समर्थ है, वह विपरीत परिस्थितियों में निराश नहीं होता।
त्याज्यं न धैर्यं विधुरेऽपि दैवे धैर्यात्कदाचित्स्थितिमाप्नुयात्सः। याते समुद्रेऽपि च पोतभङ्गे सांयात्रिको वाञ्छति कर्म एव॥
tyājyaṁ na dhairyaṁ vidhure'pi daive dhairyāt kadācit sthitim āpnuyāt saḥ । yāte samudre'pi ca potabhaṅge sāṁyātriko vāñchati karma eva ॥
प्रतिकूल भाग्य में भी धैर्य और कर्म मनुष्य को पुनः संभलने की राह देते हैं, जैसे पोत टूटने पर भी समुद्रयात्री प्रयास करता रहता है।
न जातु शौर्यं पुरुषस्य भानुरस्तं गतो भवति कदापि शश्वत्। यथा पुनस्तपति दिवाकरोऽयं तथा पुनर्विक्रमते स वीरः॥
na jātu śauryaṁ puruṣasya bhānurastaṁ gato bhavati kadāpi śaśvat । yathā punastapati divākaro'yaṁ tathā punarvikramate sa vīraḥ ॥
वीर पुरुष का शौर्य कुछ समय के लिए ओझल हो सकता है, पर लौटते सूर्य की तरह वह फिर उदित होकर नए साहस से सक्रिय होता है।
एकाग्रताथ सङ्कल्पः स्नायुवद् वर्द्धनक्षमौ। नित्याभ्यासप्रयोगाभ्याम् अधिकाधिकमृध्यतः॥
ekāgratātha saṅkalpaḥ snāyuvad varddhanakṣamau । nityābhyāsaprayogābhyām adhikādhikamṛdhyataḥ ॥
एकाग्रता और संकल्प स्थिर गुण नहीं, बल्कि नियमित अभ्यास और सार्थक प्रयोग से स्नायुओं की तरह निरंतर विकसित होने वाली क्षमताएँ हैं।
प्राप्यापदं न व्यथते कदाचिदुद्योगमन्विच्छति चाप्रमत्तः। दुःखं च काले सहते महात्मा धुरन्धरस्तस्य जिताः सपत्नाः॥
prāpyāpadaṁ na vyathate kadācidudyogamanvicchati cāpramattaḥ । duḥkhaṁ ca kāle sahate mahātmā dhurandharastasya jitāḥ sapatnāḥ ॥
विदुर नीति का यह श्लोक संकट में अविचल रहकर सावधानीपूर्वक पुरुषार्थ करने और दुःख सहते हुए विजय पाने की शिक्षा देता है।
प्रभूतं कार्यमल्पं वा यन्नरः कर्तुमिच्छति। सर्वारम्भेण तत्कार्यं सिंहादेकं प्रचक्षते॥
prabhūtaṁ kāryamalpaṁ vā yannaraḥ kartumicchati । sarvārambheṇa tatkāryaṁ siṁhādekaṁ pracakṣate ॥
चाणक्य नीति का यह श्लोक सिखाता है कि कार्य छोटा हो या बड़ा, उसे सिंह की तरह पूर्ण समर्पण और पूरे प्रयास से करना चाहिए।
अनिर्वेदः श्रियो मूलमनिर्वेदः परं सुखम्। अनिर्वेदो हि सततं सर्वार्थेषु प्रवर्तकः॥
anirvedaḥ śriyo mūlam anirvedaḥ paraṁ sukham । anirvedo hi satataṁ sarvārtheṣu pravartakaḥ ॥
वाल्मीकि रामायण के सुन्दर काण्ड का यह श्लोक बताता है कि निराशा से मुक्त उत्साह, दृढ़ विश्वास और सतत प्रयास ही उन्नति और सफलता का आधार हैं।
चलन्ति गिरयः कामं युगान्तपवनाहताः। कृच्छ्रेऽपि न चलत्येव धीराणां निश्चलं मनः॥
calanti girayaḥ kāmaṃ yugāntapavanāhatāḥ । kṛcchre'pi na calatyeva dhīrāṇāṃ niścalaṃ manaḥ ॥
यह श्लोक धैर्य की शक्ति बताता है: प्रलयकालीन वायु से पर्वत भी हिल सकते हैं, पर धीरों का मन विपत्ति में भी अचल रहता है।
नानाश्रान्ताय श्रीरस्तीति रोहित शुश्रुम। पापो नृषद्वरो जन इन्द्र इच्चरतः सखा चरैवेति॥
nānāśrāntāya śrīr astīti rohita śuśruma । pāpo nṛṣadvaro jana indra ic carataḥ sakhā caraiveti ॥
ऐतरेय ब्राह्मण की चरैवेति परंपरा का यह मंत्र बताता है कि समृद्धि निरंतर प्रयत्न करने वाले को मिलती है, निष्क्रिय रहने वाले को नहीं।
यत्रोत्साहसमारम्भो यत्रालस्यविहीनता। नयविक्रमसंयोगस्तत्र श्रीरचला ध्रुवम्॥
yatrotsāhasamārambho yatrālasyavihīnatā । nayavikramasaṃyogas tatra śrīr acalā dhruvam ॥
पञ्चतन्त्र का यह श्लोक बताता है कि उत्साह, आलस्यहीनता, नीति और पराक्रम के मेल से समृद्धि स्थिर और चिरस्थायी बनती है।
निश्चित्य यः प्रक्रमते नान्तर्वसति कर्मणः। अवन्ध्यकालो वश्यात्मा स वै पण्डित उच्यते॥
niścitya yaḥ prakramate nāntarvasati karmaṇaḥ । avandhyakālo vaśyātmā sa vai paṇḍita ucyate ॥
विदुर नीति का यह श्लोक सच्चे बुद्धिमान व्यक्ति को वह मानता है जो विचारपूर्वक कार्य आरम्भ करे, उसे पूरा करे, समय का सदुपयोग करे और आत्म-संयम बनाए रखे।
यो यमर्थं प्रार्थयते तदर्थं चेहते क्रमात्। अवश्यं स तमाप्नोति न चेदर्धान्निवर्तते॥
yo yam arthaṃ prārthayate tadarthaṃ cehate kramāt । avaśyaṃ sa tam āpnoti na ced ardhān nivartate ॥
योगवासिष्ठ का यह श्लोक बताता है कि सच्ची इच्छा, क्रमबद्ध प्रयास और मार्ग से बीच में न लौटने का धैर्य मनुष्य को उसके लक्ष्य तक पहुँचाता है।
जलबिन्दुनिपातेन क्रमशः पूर्यते घटः। स हेतुः सर्वविद्यानां धर्मस्य च धनस्य च॥
jalabindunipātena kramaśaḥ pūryate ghaṭaḥ । sa hetuḥ sarvavidyānāṁ dharmasya ca dhanasya ca ॥
यह नीति-वचन बताता है कि जैसे घड़ा बूँद-बूँद से भरता है, वैसे ही निरंतर छोटे प्रयासों से विद्या, धर्म और धन का संचय होता है।
स्वधर्ममपि चावेक्ष्य न विकम्पितुमर्हसि। धर्म्याद्धि युद्धाच्छ्रेयोऽन्यत्क्षत्रियस्य न विद्यते॥
svadharmamapi cāvekṣya na vikampitumarhasi । dharmyāddhi yuddhācchreyo'nyatkṣatriyasya na vidyate ॥
अर्जुन को दिए गए भगवान श्रीकृष्ण के इस उपदेश में स्पष्ट किया गया है कि एक योद्धा के लिए धर्मयुद्ध से बढ़कर कोई कल्याणकारी मार्ग नहीं है।
न तथा बलवीर्याभ्यां जयन्ति विजिगीषवः। यथा सत्यानृशंस्याभ्यां धर्मेणैवोद्यमेन च॥
na tathā balavīryābhyāṁ jayanti vijigīṣavaḥ । yathā satyānṛśaṁsyābhyāṁ dharmeṇaivodyamena ca ॥
यह श्लोक बताता है कि सच्ची और स्थायी विजय केवल शारीरिक बल या पराक्रम से नहीं, बल्कि सत्य, दया, धर्म और उद्यम से प्राप्त होती है।
को हि भारः समर्थानां किं दूरं व्यवसायिनाम्। को विदेशः सुविद्यानां कः परः प्रियवादिनाम्॥
ko hi bhāraḥ samarthānāṁ kiṁ dūraṁ vyavasāyinām । ko videśaḥ suvidyānāṁ kaḥ paraḥ priyavādinām ॥
यह श्लोक बताता है कि कैसे कौशल, परिश्रम, शिक्षा और मधुर वाणी सफलता और अपनेपन की सभी बाधाओं को दूर कर देते हैं।
अनिर्वेदो हि सततं सर्वार्थेषु प्रवर्तकः। करोति सफलं जन्तोः कर्म यच्च करोति सः॥
anirvedo hi satataṁ sarvārtheṣu pravartakaḥ । karoti saphalaṁ jantoḥ karma yacca karoti saḥ ॥
वाल्मीकि रामायण का यह श्लोक सिखाता है कि किस प्रकार उत्साह और सकारात्मक ऊर्जा किसी भी कार्य को सफल बनाने के लिए आवश्यक हैं।
उत्थानं संयमो दाक्ष्यमप्रमादो धृतिः स्मृतिः। समीक्ष्य च समारम्भो विद्धिमूलं भवस्य तु॥
utthānaṁ saṁyamo dākṣyam apramādo dhṛtiḥ smṛtiḥ । samīkṣya ca samārambho viddhi mūlaṁ bhavasya tu ॥
विदुर नीति का यह श्लोक उन्नति के उन सात आधारभूत स्तंभों का वर्णन करता है जो व्यक्ति और राष्ट्र की समृद्धि के लिए अनिवार्य हैं।
इत्थं फलति शुद्धेन सिक्तं सङ्कल्पवारिणा। पुण्यबीजमपि स्वल्पं पुंसां कृषिकृतामिव॥
itthaṁ phalati śuddhena siktaṁ saṅkalpavāriṇā । puṇyabījamapi svalpaṁ puṁsāṁ kṛṣikṛtāmiva ॥
जिस प्रकार किसान द्वारा बोया गया छोटा-सा बीज भरपूर फसल देता है, उसी प्रकार शुद्ध संकल्प के साथ किया गया छोटा-सा प्रयास भी महान सफलता दिलाता है।
व्यसने वाऽर्थकृच्छ्रे वा भये वा जीवनान्तके। विमृशन् वै स्वया बुद्ध्या धृतिमान् नावसीदति॥
vyasane vā’rthakṛcchre vā bhaye vā jīvanāntake । vimṛśan vai svayā buddhyā dhṛtimān nāvasīdati ॥
वाल्मीकि रामायण का यह श्लोक सिखाता है कि आर्थिक संकट या प्राणों के भय की स्थिति में कैसे धैर्य और स्वयं के विवेक द्वारा दुःख और मानसिक अवसाद से बचा जा सकता है।
आत्मज्ञानं समारम्भस्तितिक्षा धर्मनित्यता। यमर्था नापकर्षन्ति स वै पण्डित उच्यते॥
ātmajñānaṁ samārambhas titikṣā dharmanityatā । yam arthā nāpakarṣanti sa vai paṇḍita ucyate ॥
विदुर नीति का यह श्लोक एक बुद्धिमान व्यक्ति के गुणों का वर्णन करता है: आत्मज्ञान, दृढ़ निश्चय, सहनशीलता और प्रलोभनों से ऊपर उठकर जनकल्याण के मार्ग पर अडिग रहना।
सिद्धिः साध्ये सतामस्तु प्रसादात्तस्य धूर्जटेः। जाह्नवीफेनलेखेव यन्मूर्ध्नि शशिनः कला॥
siddhiḥ sādhye satām astu prasādāt tasya dhūrjaṭeḥ । jāhnavī-phena-lekheva yan-mūrdhni śaśinaḥ kalā ॥
जिन महादेव के मस्तक पर चन्द्रमा की कला गंगा के झाग के समान सुशोभित है, उनकी कृपा से सज्जनों के संकल्प सिद्ध हों।
अभीप्सां स्वात्मनो रक्षाऽविरतं सुस्थिरं तया। यत्नमातिष्ठ धैर्येण ततः सिद्धिर्भवेद् ध्रुवम्॥
abhīpsāṁ svātmano rakṣā’virataṃ susthiraṁ tayā । yatnam ātiṣṭha dhairyeṇa tataḥ siddhir bhaved dhruvam ॥
दृढ़ संकल्प, धैर्यपूर्ण प्रयास और आत्मसंयम श्रेष्ठ अभिलाषा की रक्षा करते हुए उसे सफलता तक पहुँचाते हैं।
यद् दूरं यद् दुराराध्यं यच्च दूरे व्यवस्थितम्। तत् सर्वं तपसा साध्यं तपो हि दुरतिक्रमम्॥
yad dūraṃ yad durārādhyaṃ yacca dūre vyavasthitam । tat sarvaṃ tapasā sādhyaṃ tapo hi duratikramam ॥
चाणक्य नीति का यह श्लोक बताता है कि "तप" यानी कठिन परिश्रम से हर उस लक्ष्य को पाया जा सकता है जो दूर या असंभव प्रतीत होता है।
उत्साहो बलवानार्य नास्त्युत्साहात् परं बलम्। सोत्साहस्यास्ति लोकेऽस्मिन् न किञ्चिदपि दुर्लभम्॥
utsāho balavān ārya nāsty utsāhāt paraṃ balam । sotsāhasyāsti loke’smin na kiñcid api durlabham ॥
उत्साह ही सबसे बड़ा बल है। रामायण का यह श्लोक हमें याद दिलाता है कि एक उत्साही व्यक्ति के लिए कोई भी लक्ष्य दुर्लभ नहीं है।
न वा उ मां वृजने वारयन्ते न पर्वतासो यदहं मनस्ये। मम स्वनात् कृधुकर्णो भयात एवेदनु द्यून्किरणः समेजात्॥
na vā u māṃ vṛjane vārayante na parvatāso yad ahaṃ manasye । mama svanāt kṛdhukarṇo bhayāta eved anu dyūn kiraṇaḥ samejāt ॥
ऋग्वेद का यह मंत्र अदम्य इच्छाशक्ति और आत्मविश्वास की महिमा का गान करता है, जो बड़े से बड़े पहाड़ों जैसी बाधाओं को भी पार करने में सक्षम है।
धीराः शोकं तरिष्यन्ति लभन्ते सिद्धिमुत्तमाम्। धीरैः सम्प्राप्यते लक्ष्मीर्धैर्यं सर्वत्र साधनम्॥
dhīrāḥ śokaṃ tariṣyanti labhante siddhimuttamām । dhīraiḥ samprāpyate lakṣmīrdhairyaṃ sarvatra sādhanam ॥
धीर व्यक्ति साहस से शोक पार करते, धैर्य से कठिनाइयाँ सहते और निराशा के आगे झुके बिना अपने लक्ष्य की ओर बढ़ते हैं।
यथैकेन न हस्तेन तालिका सम्प्रपद्यते। तथोद्यमपरित्यक्तं न फलं कर्मणः स्मृतम्॥
yathaikena na hastena tālikā samprapadyate । tathodyamaparityaktaṃ na phalaṃ karmaṇaḥ smṛtam ॥
जिस प्रकार एक हाथ से ताली नहीं बजती, उसी प्रकार बिना परिश्रम के किसी भी कार्य में सफलता फलित नहीं होती।
अविज्ञातस्य विज्ञानं विज्ञातस्य च निश्चयः। आरम्भः कर्मणां शश्वदारब्धस्यान्तदर्शनम्॥
avijñātasya vijñānaṃ vijñātasya ca niścayaḥ । ārambhaḥ karmaṇāṃ śaśvadārabdhasyāntadarśanam ॥
अज्ञात की खोज, ज्ञात का निश्चय, कार्य का दृढ़ आरंभ और उसे पूर्ण करना ही वास्तविक बुद्धिमत्ता के लक्षण हैं।
चरन् वै मधु विन्दति चरन् स्वादुमुदुम्बरम्। सूर्यस्य पश्य श्रेमाणं यो न तन्द्रयते चरंश्चरैवेति॥
caran vai madhu vindati caran svādum udumbaram । sūryasya paśya śremāṇaṃ yo na tandrayate caraṃś caraiveti ॥
गतिशील रहने और कर्मठता का संदेश देता यह श्लोक बताता है कि सूर्य की तरह निरंतर चलते रहने वाला ही यश प्राप्त करता है।
चरैवेति चरैवेति चरन्वै मधु विन्दति। सूर्यास्य पश्य श्रेमाणं न मामार न जीर्यति॥
caraiveti caraiveti caranvai madhu vindati । sūryāsya paśya śremāṇaṃ na māmāra na jīryati ॥
वैदिक उद्घोष ‘चरैवेति’ सूर्य की अविराम गति से प्रेरणा लेकर सतत कर्म को प्रगति का मार्ग बताता है।
अनुत्थाने ध्रुवो नाशः प्राप्तस्यानागतस्य च। प्राप्यते फलमुत्थानाल्लभते चार्थसम्पदम्॥
anutthāne dhruvo nāśaḥ prāptasyānāgatasya ca । prāpyate phalam utthānāl labhate cārthasampadam ॥
निष्क्रियता निश्चित अवनति लाती है, जबकि उद्यम और परिश्रम से ही समृद्धि तथा सार्थक फल प्राप्त होते हैं।
दुर्लभान्यपि कार्याणि सिद्ध्यन्ति प्रोद्यमेन हि। शिलाऽपि तनुतां याति प्रपातेनार्णसो मुहुः॥
durlabhāny api kāryāṇi siddhyanti prodyamena hi । śilā'pi tanutāṁ yāti prapātenārṇaso muhuḥ ॥
निरंतर प्रयास कठिन कार्यों को भी सिद्ध कर देता है, जैसे बार-बार गिरती जलधारा धीरे-धीरे पत्थर को घिस देती है।
उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत। क्षुरस्य धारा निशिता दुरत्यया दुर्गं पथस्तत्कवयो वदन्ति॥
uttiṣṭhata jāgrata prāpya varān nibodhata । kṣurasya dhārā niśitā duratyayā durgaṁ pathas tat kavayo vadanti ॥
कठोपनिषद् साधक को उठने, जागने, ज्ञानी गुरु के पास जाने और आत्मबोध के सूक्ष्म तथा कठिन मार्ग पर चलने का आह्वान करता है।
अङ्गणवेदी वसुधा कुल्या जलधिः स्थली च पातालम्। वल्मीकश्च सुमेरुः कृतप्रतिज्ञस्य वीरस्य॥
aṅgaṇavedī vasudhā kulyā jaladhiḥ sthalī ca pātālam । valmīkaśca sumeruḥ kṛtapratijñasya vīrasya ॥
दृढ़ संकल्पी वीर के लिए कुछ भी असंभव नहीं। जानिए कैसे एक मजबूत इच्छाशक्ति बाधाओं को अवसरों में बदल देती है।
उत्थातव्यं जागृतव्यं योक्तव्यं भूतिकर्मसु। भविष्यतीत्येव मनः कृत्वा सततमव्यथैः॥
utthātavyaṃ jāgṛtavyaṃ yoktavyaṃ bhūtikarmasu । bhaviṣyatītyeva manaḥ kṛtvā satatam avyathaiḥ ॥
उठें, जागरूक रहें, विषाद त्यागें और इस विश्वास के साथ कर्म में लगें कि सार्थक प्रयास अवश्य फल दे सकता है।
सामर्थ्यमूलं स्वातन्त्र्यं श्रममूलं च वैभवम्। न्यायमूलं सुराज्यं स्यात् सङ्घमूलं महाबलम्॥
sāmarthyamūlaṁ svātantryaṁ śramamūlaṁ ca vaibhavam । nyāyamūlaṁ surājyaṁ syāt saṅghamūlaṁ mahābalaṁ ॥
शक्ति स्वतंत्रता का, परिश्रम समृद्धि का, न्याय सुशासन का और संगठित एकता सामूहिक बल का आधार बनती है।
नात्युच्चशिखरो मेरुर्नातिनीचं रसातलम्। व्यवसायद्वितीयानां नात्यपारो महोदधिः॥
na aty ucca śikharaḥ meru na atīnīcaṁ rasātalam । vyavasāya-dvitīyānāṁ na aty-apāro mahodadhiḥ ॥
दृढ़ संकल्प वाले व्यक्ति के लिए न कोई शिखर बहुत ऊँचा है, न सागर बहुत विशाल और न कोई कार्य पुरुषार्थ से परे।
बन्धनं मरणं वापि जयो वापि पराजयः। उभयत्र समो वीरः वीरभावो हि वीरता॥
bandhanaṁ maraṇaṁ vāpi jayo vāpi parājayaḥ । ubhayatra samo vīraḥ vīrabhāvo hi vīratā ॥
बंधन या मृत्यु, विजय या पराजय—हर परिस्थिति में साहस और समभाव बनाए रखना ही सच्ची वीरता है।
यस्य कृत्यं न विघ्नन्ति शीतमुष्णं भयं रतिः। समृद्धिरसमृद्धिर्वा स वै पण्डित उच्यते॥
yasya kṛtyaṁ na vighnanti śītamuṣṇaṁ bhayaṁ ratiḥ । samṛddhir asamṛddhir vā sa vai paṇḍita ucyate ॥
सच्चा ज्ञानी सर्दी-गर्मी, भय-इच्छा और संपत्ति-विपत्ति के बीच भी अपने कर्तव्य से विचलित नहीं होता।