आत्मज्ञानं समारम्भस्तितिक्षा - पंडित के लक्षण

8 अप्रैल 2026

आत्मज्ञानं समारम्भस्तितिक्षा धर्मनित्यता। यमर्था नापकर्षन्ति स वै पण्डित उच्यते॥

ātmajñānaṁ samārambhas titikṣā dharmanityatā । yam arthā nāpakarṣanti sa vai paṇḍita ucyate ॥

प्रधानमंत्री का संदेश

आज से ठीक 11 वर्ष पहले शुरू की गई प्रधानमंत्री मुद्रा योजना युवाओं के स्वरोजगार में बहुत मददगार साबित हुई है। इस योजना की सफलता बताती है कि सही अवसर मिलने पर व्यक्ति न सिर्फ आत्मनिर्भर बन सकता है, बल्कि राष्ट्र की प्रगति में भी योगदान दे सकता है।

आत्मज्ञानं समारम्भस्तितिक्षा धर्मनित्यता का अर्थ

जो व्यक्ति अपनी योग्यता से भली-भांति परिचित हो, आत्मनिर्भर होकर कल्याणकारी कर्म करने में तत्पर हो, विपरीत परिस्थितियों को धैर्यपूर्वक सहन करता हो और सदा सदाचार का पालन करता हो, जिसे लोभ अपने मार्ग से विचलित नहीं कर पाता, वही वास्तव में बुद्धिमान कहलाता है।

शब्दार्थ

आत्मज्ञानम्ātmajñānam

आत्मज्ञान

आत्मन् + √ज्ञा

समारम्भःsamārambhaḥ

समारम्भ

सम् + आ + √रभ्

तितिक्षाtitikṣā

तितिक्षा

√तिज्

धर्मनित्यताdharmanityatā

धर्म में नित्यता

धर्म + नित्य

यम्yam

जिसे

यद्

अर्थाःarthāḥ

अर्थ, धन

अर्थ

न अपकर्षन्तिnāpakarṣanti

विचलित नहीं करते

अप + √कृष्

सः वैsa vai

वही

तद्

पण्डितः उच्यतेpaṇḍita ucyate

पण्डित कहा जाता है

पण्डा + √वच्

व्याख्या

विदुर नीति में ‘पण्डित’ की पहचान केवल विद्या से नहीं, बल्कि आत्मबोध और स्थिर आचरण के मेल से की गई है। ‘आत्मज्ञान’ स्वयं की समझ, ‘समारम्भ’ सार्थक कार्य आरम्भ करने की तत्परता, ‘तितिक्षा’ कठिनाई सहने की क्षमता और ‘धर्मनित्यता’ उचित मार्ग पर स्थिरता है। अंतिम कसौटी यह है कि लोभ या इच्छा ऐसे व्यक्ति को इन गुणों से विचलित न कर सके। ये गुण एक व्यावहारिक क्रम बनाते हैं—स्वयं को जानें, उचित कार्य आरम्भ करें, कठिनाई सहें और नैतिक आधार न छोड़ें। सार्वजनिक या राष्ट्रीय जीवन में इसे आत्मनिर्भरता और स्थिर प्रयास से जोड़ा जा सकता है, पर वह श्लोक की व्यापक विवेक-दृष्टि का आधुनिक अनुप्रयोग है।

मूल पोस्ट

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विदुर नीति से और सुभाषित

स्रोत पृष्ठ देखें
7 अक्टू॰ 2026
महाभारत

नित्यं परिचरेच्चैव तद्वै सुकृतमुत्तमम्। कीर्तिं पुण्यं यशो लोकान् प्राप्स्यसे राजसत्तम॥

nityaṃ paricareccaiva tadvai sukṛtamuttamam । kīrtiṃ puṇyaṃ yaśo lokān prāpsyase rājasattama ॥

नित्य सेवा को श्रेष्ठ पुण्य कर्म बताया गया है, जिससे कीर्ति, यश और उत्तम लोकों की प्राप्ति होती है।

कर्तव्यकर्मसफलता
2 अक्टू॰ 2026
भगवद् गीता

अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च। निर्ममो निरहङ्कारः समदुःखसुखः क्षमी॥

adveṣṭā sarvabhūtānāṃ maitraḥ karuṇa eva ca । nirmamo nirahaṅkāraḥ samaduḥkhasukhaḥ kṣamī ॥

भगवद् गीता द्वेष और अहंकार से मुक्त, सभी प्राणियों के प्रति मैत्री रखने वाले और सुख-दुःख में सम रहने वाले व्यक्ति के गुण बताती है।

चरित्रविनम्रतासामंजस्य
30 सित॰ 2026
भगवद् गीता

स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः संसिद्धिं लभते नरः। स्वकर्मनिरतः सिद्धिं यथा विन्दति तच्छृणु॥

sve sve karmaṇyabhirataḥ saṁsiddhiṁ labhate naraḥ । svakarmanirataḥ siddhiṁ yathā vindati tacchṛṇu ॥

भगवद् गीता बताती है कि अपने कर्म में निष्ठा मनुष्य को सिद्धि की ओर ले जाती है।

कर्मकर्तव्यसफलता

ज्ञान पर और सुभाषित

विषय पृष्ठ देखें
6 अक्टू॰ 2026
समराङ्गणसूत्रधार

ज्ञानवांश्च तथा वाग्मी कर्मस्वपि च निष्ठितः। एवं युक्तोऽपि न श्रेयान् यदि शीलविवर्जितः॥

jñānavāṃśca tathā vāgmī karmasvapi ca niṣṭhitaḥ । evaṃ yukto'pi na śreyān yadi śīlavivarjitaḥ ॥

ज्ञान, वाक्पटुता और कर्मकुशलता होने पर भी सदाचार से रहित व्यक्ति श्रेष्ठ नहीं होता।

विद्यासामर्थ्यचरित्रनैतिकता
5 अक्टू॰ 2026
हितोपदेश

शुचित्वं त्यागिता शौर्यं सामान्यं सुखदुःखयोः। दाक्षिण्यं चानुरक्तिश्च सत्यता च सुहृद्गुणाः॥

śucitvaṃ tyāgitā śauryaṃ sāmānyaṃ sukhaduḥkhayoḥ । dākṣiṇyaṃ cānuraktiśca satyatā ca suhṛdguṇāḥ ॥

निर्मलता, त्याग, साहस, सुख-दुःख में समान भाव, शिष्टता, अनुराग और सत्यता सच्चे मित्र के गुण हैं।

चरित्रनैतिकतासाहस
2 अक्टू॰ 2026
भगवद् गीता

अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च। निर्ममो निरहङ्कारः समदुःखसुखः क्षमी॥

adveṣṭā sarvabhūtānāṃ maitraḥ karuṇa eva ca । nirmamo nirahaṅkāraḥ samaduḥkhasukhaḥ kṣamī ॥

भगवद् गीता द्वेष और अहंकार से मुक्त, सभी प्राणियों के प्रति मैत्री रखने वाले और सुख-दुःख में सम रहने वाले व्यक्ति के गुण बताती है।

चरित्रविनम्रतासामंजस्य