नान्तर्बहिश्च लोकेषु - परम शांति का मार्ग

1 मई 2026

नान्तर्बहिश्च लोकेषु त्वात्मानं दृष्टवान् क्वचित्। आष्टाङ्गिकेन मार्गेण परमां शान्तिमाययौ॥

nāntar bahiśca lokeṣu tvātmānaṁ dṛṣṭavān kvacit । āṣṭāṅgikena mārgeṇa paramāṁ śāntim āyayau ॥

प्रधानमंत्री का संदेश

सभी देशवासियों को बुद्ध पूर्णिमा की असीम शुभकामनाएं। शांति, करुणा और सद्भावना के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देने वाले इस पावन अवसर पर आइए, भगवान बुद्ध के जीवन मूल्यों को अपनाने का संकल्प दोहराएं।

नान्तर्बहिश्च लोकेषु त्वात्मानं दृष्टवान् का अर्थ

गौतम बुद्ध के अनुसार जब व्यक्ति यह समझ लेता है कि कोई स्थायी आत्म-तत्व भीतर या बाहर स्वतंत्र रूप से नहीं है और वह सही दृष्टि, सही संकल्प, सही आचरण आदि अष्टांगिक मार्ग का पालन करता है, तब वह दुःख से मुक्त होकर परम शांति को प्राप्त करता है।

शब्दार्थ

न अन्तःnāntaḥ

न भीतर

अन्तर्

बहिः चbahiś ca

न बाहर

बहिस्

लोकेषुlokeṣu

लोकों में

लोक

तु आत्मानम्tv ātmānam

आत्मा को

आत्मन्

दृष्टवान्dṛṣṭavān

देखा

√दृश्

क्वचित्kvacit

कहीं

आष्टाङ्गिकेनāṣṭāṅgikena

अष्टाङ्ग

अष्टन् + अङ्ग

मार्गेणmārgeṇa

मार्ग से

√मृग्

परमाम् शान्तिम्paramāṁ śāntim

परम शान्ति

परम + √शम्

आययौāyayau

प्राप्त की

आ + √या

व्याख्या

यह श्लोक दो स्पष्ट बौद्ध विचारों को साथ रखता है—स्थायी और स्वतंत्र आत्मा का अभाव तथा अष्टांगिक मार्ग का अनुशासन। भीतर या बाहर किसी स्थिर आत्मतत्त्व को न देखना अहंकार और आसक्ति को ढीला करता है, जबकि मार्ग उस बोध को नैतिक और ध्यानपरक जीवन में रूप देता है। इस प्रकार परम शांति निष्क्रिय मौन नहीं, समझ और साधना से प्राप्त मुक्ति है। संग्रहीत अर्थ इस शिक्षा को गौतम बुद्ध से जोड़ता है, पर अभी किसी विशिष्ट संस्कृत बौद्ध ग्रंथ में इसका स्रोत सत्यापित नहीं हुआ है। सिद्धान्तगत व्याख्या संभव है, किन्तु ग्रंथ, अध्याय और पद मिलने तक प्रत्यक्ष श्रेय को सावधानी से देखना चाहिए।

मूल पोस्ट

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शांति पर और सुभाषित

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