को हि भारः समर्थानां - सक्षमता की शक्ति

4 मई 2026

को हि भारः समर्थानां किं दूरं व्यवसायिनाम्। को विदेशः सुविद्यानां कः परः प्रियवादिनाम्॥

ko hi bhāraḥ samarthānāṁ kiṁ dūraṁ vyavasāyinām । ko videśaḥ suvidyānāṁ kaḥ paraḥ priyavādinām ॥

प्रधानमंत्री का संदेश

कौशल, परिश्रम और करुणा हमारे जीवन की अद्भुत शक्तियां हैं। इनके माध्यम से हम न केवल हर चुनौती को पार कर सकते हैं, बल्कि ये हमारे लक्ष्यों की प्राप्ति में भी मददगार हैं।

को हि भारः समर्थानां का अर्थ

कुशल व्यक्ति के लिए कोई कार्य कठिन नहीं होता, उद्योगी लोगों के लिए कोई लक्ष्य दूर नहीं होता, शिक्षित व्यक्ति के लिए कोई देश-विदेश नहीं होता, और मधुरभाषी के लिए कोई पराया नहीं होता।

शब्दार्थ

कः हिko hi

क्या भला

किम्

भारःbhāraḥ

भार

√भृ

समर्थानाम्samarthānām

समर्थों के लिए

सम् + अर्थ

किम्kim

क्या

किम्

दूरम्dūram

दूर

दूर

व्यवसायिनाम्vyavasāyinām

उद्यमियों के लिए

वि + अव + √सो

कः विदेशःko videśaḥ

कौन-सा परदेश

वि + देश

सुविद्यानाम्suvidyānām

सुविद्य जनों के लिए

सु + √विद्

कः परःkaḥ paraḥ

कौन पराया

पर

प्रियवादिनाम्priyavādinām

मधुरभाषियों के लिए

प्रिय + √वद्

व्याख्या

यह श्लोक चार प्रश्नों के माध्यम से उन गुणों को सामने रखता है जो सामान्य सीमाओं को कम बाधक बना देते हैं। समर्थ के लिए कोई भार भारी नहीं, उद्यमी के लिए कोई दूरी बहुत दूर नहीं और सुविद्य व्यक्ति के लिए कोई देश वास्तव में विदेश नहीं रहता। अंतिम प्रश्न ‘कः परः प्रियवादिनाम्’ का आशय है कि मधुर बोलने वाले के लिए कोई पराया नहीं रहता; यह नहीं कहता कि उसका कभी कोई शत्रु नहीं होगा। इस प्रकार श्लोक सामर्थ्य, निरंतर उद्यम, विद्या और प्रिय वाणी को संसार से अधिक सहज और आत्मीय संबंध बनाने वाले गुणों के रूप में रखता है।

स्रोत और पाठभेद

मूल पोस्ट

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चाणक्य नीति से और सुभाषित

स्रोत पृष्ठ देखें
5 अक्टू॰ 2026
हितोपदेश

शुचित्वं त्यागिता शौर्यं सामान्यं सुखदुःखयोः। दाक्षिण्यं चानुरक्तिश्च सत्यता च सुहृद्गुणाः॥

śucitvaṃ tyāgitā śauryaṃ sāmānyaṃ sukhaduḥkhayoḥ । dākṣiṇyaṃ cānuraktiśca satyatā ca suhṛdguṇāḥ ॥

निर्मलता, त्याग, साहस, सुख-दुःख में समान भाव, शिष्टता, अनुराग और सत्यता सच्चे मित्र के गुण हैं।

चरित्रनैतिकतासाहस
29 सित॰ 2026
सुभाषितरत्नभाण्डागारम्

उद्यमः साहसं धैर्यं बुद्धिः शक्तिः पराक्रमः। षडेते यत्र वर्तन्ते तत्र दैवं सहायकृत्॥

udyamaḥ sāhasaṃ dhairyaṃ buddhiḥ śaktiḥ parākramaḥ । ṣaḍete yatra vartante tatra daivaṃ sahāyakṛt ॥

उद्यम, साहस, धैर्य, बुद्धि, शक्ति और पराक्रम से युक्त व्यक्ति को दैव का सहयोग भी प्राप्त होता है।

दृढ़तासाहसविद्याशक्ति
18 सित॰ 2026
आर्यासप्तशती

स्वाधीनैव समृद्धिर्जनोपजीव्यत्वमुच्छ्रयश्छाया। सत्पुंसो मरुभूरिव जीवनमात्रं समाशास्यम्॥

svādhīnaiva samṛddhir janopajīvyatvam ucchrayaś chāyā । satpuṃso marubhūr iva jīvanamātraṁ samāśāsyam ॥

मरुभूमि में खड़े वृक्ष की तरह सत्पुरुष के लिए स्वाधीन समृद्धि, दूसरों का आधार, ऊँचाई और छाया सहज हैं, इसलिए उसका जीवित रहना ही कामना के योग्य है।

चरित्रनिःस्वार्थ सेवास्वतंत्रतासमृद्धि

सामर्थ्य पर और सुभाषित

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6 अक्टू॰ 2026
समराङ्गणसूत्रधार

ज्ञानवांश्च तथा वाग्मी कर्मस्वपि च निष्ठितः। एवं युक्तोऽपि न श्रेयान् यदि शीलविवर्जितः॥

jñānavāṃśca tathā vāgmī karmasvapi ca niṣṭhitaḥ । evaṃ yukto'pi na śreyān yadi śīlavivarjitaḥ ॥

ज्ञान, वाक्पटुता और कर्मकुशलता होने पर भी सदाचार से रहित व्यक्ति श्रेष्ठ नहीं होता।

विद्यासामर्थ्यचरित्रनैतिकता
5 अक्टू॰ 2026
हितोपदेश

शुचित्वं त्यागिता शौर्यं सामान्यं सुखदुःखयोः। दाक्षिण्यं चानुरक्तिश्च सत्यता च सुहृद्गुणाः॥

śucitvaṃ tyāgitā śauryaṃ sāmānyaṃ sukhaduḥkhayoḥ । dākṣiṇyaṃ cānuraktiśca satyatā ca suhṛdguṇāḥ ॥

निर्मलता, त्याग, साहस, सुख-दुःख में समान भाव, शिष्टता, अनुराग और सत्यता सच्चे मित्र के गुण हैं।

चरित्रनैतिकतासाहस
2 अक्टू॰ 2026
भगवद् गीता

अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च। निर्ममो निरहङ्कारः समदुःखसुखः क्षमी॥

adveṣṭā sarvabhūtānāṃ maitraḥ karuṇa eva ca । nirmamo nirahaṅkāraḥ samaduḥkhasukhaḥ kṣamī ॥

भगवद् गीता द्वेष और अहंकार से मुक्त, सभी प्राणियों के प्रति मैत्री रखने वाले और सुख-दुःख में सम रहने वाले व्यक्ति के गुण बताती है।

चरित्रविनम्रतासामंजस्य