न तथा बलवीर्याभ्यां - सच्ची विजय का आधार

5 मई 2026

न तथा बलवीर्याभ्यां जयन्ति विजिगीषवः। यथा सत्यानृशंस्याभ्यां धर्मेणैवोद्यमेन च॥

na tathā balavīryābhyāṁ jayanti vijigīṣavaḥ । yathā satyānṛśaṁsyābhyāṁ dharmeṇaivodyamena ca ॥

प्रधानमंत्री का संदेश

अथक परिश्रम और सत्य के मार्ग पर चलकर प्राप्त की गई सफलता स्थायी होती है। इससे जहां आत्मविश्वास बढ़ता है, वहीं मन को अद्भुत संतोष भी मिलता है।

न तथा बलवीर्याभ्यां जयन्ति का अर्थ

विजय की इच्छा रखने वाले लोग वैसी विजय बल और पराक्रम से प्राप्त नहीं करते, जैसी विजय वे सत्य, दया, कर्तव्य और निरंतर प्रयत्न के द्वारा प्राप्त कर लेते हैं।

शब्दार्थ

न तथाna tathā

उतना नहीं

बलवीर्याभ्याम्balavīryābhyām

बल और वीर्य से

बल + वीर्य

जयन्तिjayanti

जीतते हैं

√जि

विजिगीषवःvijigīṣavaḥ

विजय के इच्छुक

वि + √जि

यथाyathā

जितना

सत्यानृशंस्याभ्याम्satyānṛśaṁsyābhyām

सत्य और आनृशंस्य से

सत्य + अ + नृशंस

'आनृशंस्य' महाभारत का अपना शब्द है।

धर्मेण एवdharmeṇaiva

धर्म से ही

√धृ

उद्यमेनudyamena

उद्यम से

उद् + √यम्

चca

और

व्याख्या

महाभारत के भीष्म पर्व का यह श्लोक कहता है कि विजय बल और वीर्य से उस प्रकार प्राप्त नहीं होती, जिस प्रकार सत्य, आनृशंस्य, धर्म और उद्यम से होती है। ‘आनृशंस्य’ नृशंसता या हानि पहुँचाने की प्रवृत्ति का अभाव है और महाभारत में मानवीय आचरण का महत्त्वपूर्ण शब्द है। साथ दिए अर्थ में ‘स्थायी विजय’ और ‘आत्मिक संतोष’ का जो विस्तार है, वह संस्कृत में सीधे नहीं कहा गया; वहाँ न अवधि का उल्लेख है, न अंतःसंतोष का। युद्ध के आरम्भ में रखा यह कथन कच्ची शक्ति से ध्यान हटाकर आचरण की नैतिकता और प्रयत्न पर ले जाता है।

मूल पोस्ट

पोस्ट लोड हो रहा है...
इन चयनित श्लोक पृष्ठों में शामिल

महाभारत से और सुभाषित

स्रोत पृष्ठ देखें
7 अक्टू॰ 2026
महाभारत

नित्यं परिचरेच्चैव तद्वै सुकृतमुत्तमम्। कीर्तिं पुण्यं यशो लोकान् प्राप्स्यसे राजसत्तम॥

nityaṃ paricareccaiva tadvai sukṛtamuttamam । kīrtiṃ puṇyaṃ yaśo lokān prāpsyase rājasattama ॥

नित्य सेवा को श्रेष्ठ पुण्य कर्म बताया गया है, जिससे कीर्ति, यश और उत्तम लोकों की प्राप्ति होती है।

कर्तव्यकर्मसफलता
2 अक्टू॰ 2026
भगवद् गीता

अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च। निर्ममो निरहङ्कारः समदुःखसुखः क्षमी॥

adveṣṭā sarvabhūtānāṃ maitraḥ karuṇa eva ca । nirmamo nirahaṅkāraḥ samaduḥkhasukhaḥ kṣamī ॥

भगवद् गीता द्वेष और अहंकार से मुक्त, सभी प्राणियों के प्रति मैत्री रखने वाले और सुख-दुःख में सम रहने वाले व्यक्ति के गुण बताती है।

चरित्रविनम्रतासामंजस्य
30 सित॰ 2026
भगवद् गीता

स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः संसिद्धिं लभते नरः। स्वकर्मनिरतः सिद्धिं यथा विन्दति तच्छृणु॥

sve sve karmaṇyabhirataḥ saṁsiddhiṁ labhate naraḥ । svakarmanirataḥ siddhiṁ yathā vindati tacchṛṇu ॥

भगवद् गीता बताती है कि अपने कर्म में निष्ठा मनुष्य को सिद्धि की ओर ले जाती है।

कर्मकर्तव्यसफलता

धर्म पर और सुभाषित

विषय पृष्ठ देखें
7 अक्टू॰ 2026
महाभारत

नित्यं परिचरेच्चैव तद्वै सुकृतमुत्तमम्। कीर्तिं पुण्यं यशो लोकान् प्राप्स्यसे राजसत्तम॥

nityaṃ paricareccaiva tadvai sukṛtamuttamam । kīrtiṃ puṇyaṃ yaśo lokān prāpsyase rājasattama ॥

नित्य सेवा को श्रेष्ठ पुण्य कर्म बताया गया है, जिससे कीर्ति, यश और उत्तम लोकों की प्राप्ति होती है।

कर्तव्यकर्मसफलता
6 अक्टू॰ 2026
समराङ्गणसूत्रधार

ज्ञानवांश्च तथा वाग्मी कर्मस्वपि च निष्ठितः। एवं युक्तोऽपि न श्रेयान् यदि शीलविवर्जितः॥

jñānavāṃśca tathā vāgmī karmasvapi ca niṣṭhitaḥ । evaṃ yukto'pi na śreyān yadi śīlavivarjitaḥ ॥

ज्ञान, वाक्पटुता और कर्मकुशलता होने पर भी सदाचार से रहित व्यक्ति श्रेष्ठ नहीं होता।

विद्यासामर्थ्यचरित्रनैतिकता
5 अक्टू॰ 2026
हितोपदेश

शुचित्वं त्यागिता शौर्यं सामान्यं सुखदुःखयोः। दाक्षिण्यं चानुरक्तिश्च सत्यता च सुहृद्गुणाः॥

śucitvaṃ tyāgitā śauryaṃ sāmānyaṃ sukhaduḥkhayoḥ । dākṣiṇyaṃ cānuraktiśca satyatā ca suhṛdguṇāḥ ॥

निर्मलता, त्याग, साहस, सुख-दुःख में समान भाव, शिष्टता, अनुराग और सत्यता सच्चे मित्र के गुण हैं।

चरित्रनैतिकतासाहस