यथा यथा प्रयत्नः स्याद्भवेदाशु फलं तथा। इति पौरुषमेवास्ति दैवमस्तु तदेव च॥
yathā yathā prayatnaḥ syād bhaved āśu phalaṃ tathā । iti pauruṣam evāsti daivam astu tad eva ca ॥
प्रधानमंत्री का संदेशराष्ट्रसेवा के सच्चे साधक पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी को उनकी जयंती पर सादर नमन। उन्होंने समाज की अंतिम पंक्ति में खड़े व्यक्ति के उत्थान को राष्ट्र निर्माण का आधार माना और अंत्योदय की एक ऐसी विचारधारा दी, जिससे आज भी जनकल्याण की अद्भुत प्रेरणा मिलती है। आइए, इस विशेष अवसर पर उनके विचारों और आदर्शों को आत्मसात कर सामाजिक और राष्ट्रीय दायित्वों को पूरा करने का संकल्प दोहराएं।
यथा यथा प्रयत्नः स्याद्भवेदाशु का अर्थ
मनुष्य जितना अधिक पुरुषार्थ और प्रयास करता है, उतनी ही शीघ्र सफलता प्राप्त करता है। इसलिए केवल भाग्य नहीं बल्कि कर्म, साहस और नए विचारों को साकार करने का पुरुषार्थ ही सफलता और नवाचार का मार्ग प्रशस्त करता है।
शब्दार्थ
- यथा यथाyathā yathā
जिस-जिस मात्रा में
- प्रयत्नःprayatnaḥ
प्रयास
प्र + √यत्
- स्यात्syāt
हो
√अस्
- भवेत्bhavet
होता है
√भू
- आशुāśu
शीघ्र
- फलम्phalam
फल, परिणाम
फल
- तथाtathā
उसी प्रकार
- इतिiti
इस प्रकार
- पौरुषम् एवpauruṣam eva
पुरुषार्थ ही
पुरुष
- अस्तिasti
है
√अस्
- दैवम्daivam
भाग्य
देव
- अस्तुastu
माना जाए
√अस्
- तत् एव चtad eva ca
वही भी
तद्
व्याख्या
यह श्लोक प्रयत्न और फल के बीच सीधा संबंध रखता है: जितना प्रयत्न होगा, फल भी उसी के अनुसार और शीघ्र प्राप्त होगा। यहाँ 'पौरुष' का अर्थ मनुष्य का अपना पुरुषार्थ और सक्रिय प्रयास है, जिसे स्वतंत्र भाग्य के भरोसे बैठने के विपरीत रखा गया है। दूसरी पंक्ति इस बात को और स्पष्ट करती है कि जिसे दैव कहा जाता है, उसे भी पुरुषार्थ का ही फल समझना चाहिए। श्लोक यह नहीं कहता कि हर इच्छा अपने आप पूरी हो जाती है; वह मनुष्य को भाग्य के आगे जिम्मेदारी छोड़ने के बजाय कर्म करने को कहता है। साथ के संदेश में समाज की अंतिम पंक्ति में खड़े व्यक्ति की सेवा का आह्वान इस शिक्षा को सार्वजनिक जीवन से जोड़ता है, जहाँ विचारों को निरंतर कार्य और दायित्व-पालन में बदलना पड़ता है।
मूल पोस्ट
योगवासिष्ठ से और सुभाषित
स्रोत पृष्ठ देखेंयो यमर्थं प्रार्थयते तदर्थं चेहते क्रमात्। अवश्यं स तमाप्नोति न चेदर्धान्निवर्तते॥
yo yam arthaṃ prārthayate tadarthaṃ cehate kramāt । avaśyaṃ sa tam āpnoti na ced ardhān nivartate ॥
योगवासिष्ठ का यह श्लोक बताता है कि सच्ची इच्छा, क्रमबद्ध प्रयास और मार्ग से बीच में न लौटने का धैर्य मनुष्य को उसके लक्ष्य तक पहुँचाता है।
दृढ़ता पर और सुभाषित
विषय पृष्ठ देखेंरत्नैर्महाब्धेस्तुतुषुर्न देवा न भेजिरे भीमविषेण भीतिम्। सुधां विना न प्रययुर्विरामं न निश्चितार्थाद्विरमन्ति धीराः॥
ratnair mahābdhes tutuṣur na devā na bhejire bhīmaviṣeṇa bhītim । sudhāṃ vinā na prayayur virāmaṃ na niścitārthād viramanti dhīrāḥ ॥
भर्तृहरि समुद्र-मन्थन के प्रसंग से बताते हैं कि धीर व्यक्ति न बीच की उपलब्धियों पर रुकते हैं, न संकट के कारण अपने निश्चित लक्ष्य से हटते हैं।
स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः संसिद्धिं लभते नरः। स्वकर्मनिरतः सिद्धिं यथा विन्दति तच्छृणु॥
sve sve karmaṇyabhirataḥ saṁsiddhiṁ labhate naraḥ । svakarmanirataḥ siddhiṁ yathā vindati tacchṛṇu ॥
भगवद् गीता बताती है कि अपने कर्म में निष्ठा मनुष्य को सिद्धि की ओर ले जाती है।
उद्यमः साहसं धैर्यं बुद्धिः शक्तिः पराक्रमः। षडेते यत्र वर्तन्ते तत्र दैवं सहायकृत्॥
udyamaḥ sāhasaṃ dhairyaṃ buddhiḥ śaktiḥ parākramaḥ । ṣaḍete yatra vartante tatra daivaṃ sahāyakṛt ॥
उद्यम, साहस, धैर्य, बुद्धि, शक्ति और पराक्रम से युक्त व्यक्ति को दैव का सहयोग भी प्राप्त होता है।