यो यमर्थं प्रार्थयते - क्रमबद्ध प्रयास की शक्ति

27 मई 2026

यो यमर्थं प्रार्थयते तदर्थं चेहते क्रमात्। अवश्यं स तमाप्नोति न चेदर्धान्निवर्तते॥

yo yam arthaṃ prārthayate tadarthaṃ cehate kramāt । avaśyaṃ sa tam āpnoti na ced ardhān nivartate ॥

प्रधानमंत्री का संदेश

निरंतर प्रयास, धैर्य और दृढ़ संकल्प के साथ बड़े से बड़े लक्ष्य को हासिल किया जा सकता है। आज देशवासी इसी भावना से भारतवर्ष को नई ऊंचाइयों की ओर ले जा रहे हैं।

यो यमर्थं प्रार्थयते तदर्थं का अर्थ

जो व्यक्ति जिस लक्ष्य की प्रार्थना या इच्छा करता है और उसे पाने के लिए निरंतर क्रमबद्ध प्रयास करता है, वह उस लक्ष्य को निश्चित रूप से प्राप्त कर लेता है, बशर्ते वह बीच में हार मानकर अपने मार्ग से पीछे न हटे।

शब्दार्थ

यःyaḥ

जो

यद्

यम् अर्थम्yam artham

जिस प्रयोजन को

अर्थ

प्रार्थयतेprārthayate

चाहता है

प्र + √अर्थ्

तदर्थम्tadartham

उसी के लिए

तद् + अर्थ

च ईहतेceha te

और प्रयत्न करता है

√ईह्

क्रमात्kramāt

क्रमशः

√क्रम्

अवश्यम्avaśyam

अवश्य

अ + वश

सः तम् आप्नोतिsa tam āpnoti

वह उसे पाता है

√आप्

न चेत्na cet

यदि न

अर्धात् निवर्ततेardhān nivartate

आधे से लौटे

निस् + √वृत्

व्याख्या

यह श्लोक भारतीय दर्शन में दैववाद के स्थान पर पुरुषार्थ की महत्ता को स्थापित करता है। यहाँ सफलता को तीन जुड़े हुए चरणों में देखा गया है: लक्ष्य की स्पष्ट इच्छा, उस लक्ष्य के लिए क्रमबद्ध प्रयास, और मार्ग के बीच से वापस न लौटने का धैर्य। 'अर्थ' का भाव लक्ष्य, उद्देश्य या प्राप्तव्य वस्तु से है, और 'क्रमात्' बताता है कि प्रयास धीरे-धीरे, सही विधि से और निरंतर होना चाहिए। यह शिक्षा केवल इच्छा करने की नहीं, बल्कि इच्छा को अनुशासित कर्म में बदलने की प्रेरणा देती है। श्लोक की अंतिम शर्त 'न चेदर्धान्निवर्तते' इसका मूल संदेश है, क्योंकि अनेक लक्ष्य असंभव होने के कारण नहीं, बल्कि अधूरे प्रयास के कारण छूट जाते हैं। व्यक्तिगत जीवन हो या राष्ट्र-निर्माण, यह सुभाषित बताता है कि धैर्य, दृढ़ संकल्प और निरंतर कर्म से बड़े से बड़े संकल्प सिद्ध हो सकते हैं।

मूल पोस्ट

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योगवासिष्ठ से और सुभाषित

स्रोत पृष्ठ देखें
25 सित॰ 2026
योगवासिष्ठ

यथा यथा प्रयत्नः स्याद्भवेदाशु फलं तथा। इति पौरुषमेवास्ति दैवमस्तु तदेव च॥

yathā yathā prayatnaḥ syād bhaved āśu phalaṃ tathā । iti pauruṣam evāsti daivam astu tad eva ca ॥

योगवासिष्ठ का यह श्लोक फल को मनुष्य के प्रयत्न से जोड़ता है और पुरुषार्थ को ही दैव मानने की शिक्षा देता है।

दृढ़तासफलता

दृढ़ता पर और सुभाषित

विषय पृष्ठ देखें
7 अक्टू॰ 2026
महाभारत

नित्यं परिचरेच्चैव तद्वै सुकृतमुत्तमम्। कीर्तिं पुण्यं यशो लोकान् प्राप्स्यसे राजसत्तम॥

nityaṃ paricareccaiva tadvai sukṛtamuttamam । kīrtiṃ puṇyaṃ yaśo lokān prāpsyase rājasattama ॥

नित्य सेवा को श्रेष्ठ पुण्य कर्म बताया गया है, जिससे कीर्ति, यश और उत्तम लोकों की प्राप्ति होती है।

कर्तव्यकर्मसफलता
1 अक्टू॰ 2026
नीतिशतकम्

रत्नैर्महाब्धेस्तुतुषुर्न देवा न भेजिरे भीमविषेण भीतिम्। सुधां विना न प्रययुर्विरामं न निश्चितार्थाद्विरमन्ति धीराः॥

ratnair mahābdhes tutuṣur na devā na bhejire bhīmaviṣeṇa bhītim । sudhāṃ vinā na prayayur virāmaṃ na niścitārthād viramanti dhīrāḥ ॥

भर्तृहरि समुद्र-मन्थन के प्रसंग से बताते हैं कि धीर व्यक्ति न बीच की उपलब्धियों पर रुकते हैं, न संकट के कारण अपने निश्चित लक्ष्य से हटते हैं।

दृढ़तासाहस
30 सित॰ 2026
भगवद् गीता

स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः संसिद्धिं लभते नरः। स्वकर्मनिरतः सिद्धिं यथा विन्दति तच्छृणु॥

sve sve karmaṇyabhirataḥ saṁsiddhiṁ labhate naraḥ । svakarmanirataḥ siddhiṁ yathā vindati tacchṛṇu ॥

भगवद् गीता बताती है कि अपने कर्म में निष्ठा मनुष्य को सिद्धि की ओर ले जाती है।

कर्मकर्तव्यसफलता