अनन्तोद्भूतभूतौघसङ्कुले भूतलेऽखिले। शस्त्रे शास्त्रे त्रिचतुराश्चतुरा यदि मादृशाः॥
anantodbhūtabhūtaughasaṅkule bhūtale'khile । śastre śāstre tricaturāś caturā yadi mādṛśāḥ ॥
प्रधानमंत्री का संदेशमहान क्रांतिकारी और प्रखर राष्ट्रवादी चिंतक वीर सावरकर जी को उनकी जयंती पर सादर नमन! वीरता और बौद्धिकता से भरा उनका व्यक्तित्व देश की हर पीढ़ी को प्रेरित करता रहेगा।
अनन्तोद्भूतभूतौघसङ्कुले भूतलेऽखिले का अर्थ
संसार में अनेक लोग केवल ज्ञान या केवल शक्ति के लिए प्रसिद्ध होते हैं, किन्तु वास्तव में वे धीर गंभीर व्यक्तित्व अत्यन्त विरले होते हैं जो ज्ञान और पराक्रम दोनों से युक्त हों।
शब्दार्थ
- अनन्तोद्भूतभूतौघसङ्कुलेanantodbhūtabhūtaughasaṅkule
अनन्त प्राणि-समूह से भरे
अनन्त + उद् + √भू + ओघ
- भूतलेbhūtale
पृथ्वी पर
भू + तल
- अखिलेakhile
समस्त
अ + खिल
- शस्त्रेśastre
शस्त्र में
√शस्
- शास्त्रेśāstre
शास्त्र में
√शास्
- त्रिचतुराःtricaturāḥ
तीन-चार
त्रि + चतुर्
- चतुराःcaturāḥ
निपुण जन
चतुर
- यदिyadi
यदि
- मादृशाःmādṛśāḥ
मुझ जैसे
मद् + √दृश्
व्याख्या
यह सुभाषित 'शस्त्र' और 'शास्त्र' के गहरे संबंध को सामने रखता है। शस्त्र पराक्रम, साहस और रक्षा-सामर्थ्य का प्रतीक है, जबकि शास्त्र ज्ञान, विचार और अनुशासित बुद्धि का प्रतिनिधि है। वक्ता कहता है कि पूरी पृथ्वी असंख्य प्राणियों से भरी है, फिर भी शस्त्र और शास्त्र दोनों में निपुण केवल तीन-चार ही मिलते हैं—और 'मादृशाः' कहकर वह स्वयं को भी उनमें रखता है। दिया गया अर्थ इस दुर्लभता को तो व्यक्त करता है, पर श्लोक के इस आत्मकथन को छोड़ देता है। ज्ञान के बिना पराक्रम उतावलापन बन सकता है, और पराक्रम के बिना ज्ञान निष्क्रिय रह सकता है; महानता इन दोनों के संतुलन में है। सार्वजनिक जीवन में यह आदर्श और भी महत्त्वपूर्ण हो जाता है, क्योंकि श्रेष्ठ नेतृत्व के लिए विचार की स्पष्टता और बड़े उद्देश्य के लिए कर्म करने का साहस, दोनों आवश्यक हैं।
स्रोत और पाठभेद
मूल पोस्ट
सुभाषितावलि से और सुभाषित
स्रोत पृष्ठ देखेंशुचित्वं त्यागिता शौर्यं सामान्यं सुखदुःखयोः। दाक्षिण्यं चानुरक्तिश्च सत्यता च सुहृद्गुणाः॥
śucitvaṃ tyāgitā śauryaṃ sāmānyaṃ sukhaduḥkhayoḥ । dākṣiṇyaṃ cānuraktiśca satyatā ca suhṛdguṇāḥ ॥
निर्मलता, त्याग, साहस, सुख-दुःख में समान भाव, शिष्टता, अनुराग और सत्यता सच्चे मित्र के गुण हैं।
उद्यमः साहसं धैर्यं बुद्धिः शक्तिः पराक्रमः। षडेते यत्र वर्तन्ते तत्र दैवं सहायकृत्॥
udyamaḥ sāhasaṃ dhairyaṃ buddhiḥ śaktiḥ parākramaḥ । ṣaḍete yatra vartante tatra daivaṃ sahāyakṛt ॥
उद्यम, साहस, धैर्य, बुद्धि, शक्ति और पराक्रम से युक्त व्यक्ति को दैव का सहयोग भी प्राप्त होता है।
एको धर्मः परं श्रेयः क्षमैका शान्तिरुत्तमा। विद्यैका परमा तृप्तिरहिंसैका सुखावहा॥
eko dharmaḥ paraṁ śreyaḥ kṣamaikā śāntir uttamā । vidyaikā paramā tṛptir ahiṁsaikā sukhāvahā ॥
महाभारत की विदुर नीति का यह श्लोक चार गुणों को उनके फल से जोड़ता है: धर्म परम कल्याण देता है, क्षमा उत्तम शांति, विद्या सच्ची तृप्ति और अहिंसा स्थाई सुख।
ज्ञान पर और सुभाषित
विषय पृष्ठ देखेंवत्सराजोऽपि तं प्राप्तं प्रदत्तोपायनं नृपम्। प्रीत्या सम्मानयामास शूरा हि प्रणतिप्रियाः॥
vatsarājo 'pi taṃ prāptaṃ pradattopāyanaṃ nṛpam । prītyā sammānayāmāsa śūrā hi praṇatipriyāḥ ॥
भेंट लेकर आए राजा का वत्सराज स्नेह से सम्मान करते हैं। श्लोक वीरों के मन में विनम्र प्रणाम के प्रति आदर बताता है।
भस्मीकृतस्वार्थसौख्यपरिचर्चितविग्रहाः। स्वराज्ययोगनिर्मग्ना धन्यास्ते वीरयोगिनः॥
bhasmīkṛtasvārthasaukhyaparicarcitavigrahāḥ । svarājyayoganirmagnā dhanyās te vīrayoginaḥ ॥
यह श्लोक उन वीर साधकों को धन्य कहता है जो निजी सुख त्यागकर स्वराज्य की साधना में पूरी तरह समर्पित हैं।
ज्ञानवांश्च तथा वाग्मी कर्मस्वपि च निष्ठितः। एवं युक्तोऽपि न श्रेयान् यदि शीलविवर्जितः॥
jñānavāṃśca tathā vāgmī karmasvapi ca niṣṭhitaḥ । evaṃ yukto'pi na śreyān yadi śīlavivarjitaḥ ॥
ज्ञान, वाक्पटुता और कर्मकुशलता होने पर भी सदाचार से रहित व्यक्ति श्रेष्ठ नहीं होता।