ज्ञानं विरक्तिरैश्वर्यं शौर्यं तेजो बलं स्मृतिः। स्वातन्त्र्यं कौशलं कान्तिर्धैर्यं मार्दवमेव च॥
jñānaṁ viraktiḥ aiśvaryam śauryaṁ tejo balaṁ smṛtiḥ । svātantryaṁ kauśalaṁ kāntiḥ dhairyaṁ mārdavaṁ eva ca ॥
प्रधानमंत्री का संदेश2026 की आप सभी को बहुत-बहुत शुभकामनाएं। कामना करते हैं कि यह वर्ष हर किसी के लिए नई आशाएं, नए संकल्प और एक नया आत्मविश्वास लेकर आए।
ज्ञानं विरक्तिरैश्वर्यं शौर्यं तेजो का अर्थ
ज्ञान, वैराग्य, धन, शौर्य, शक्ति, बल, स्मृति तथा स्वतन्त्रता, कौशल, दीप्ति, धैर्य एवं कोमलता से युक्त होना ही जीवन का लक्ष्य होना चाहिए।
शब्दार्थ
- ज्ञानम्jñānam
ज्ञान
√ज्ञा
- विरक्तिःviraktiḥ
विरक्ति
वि + √रञ्ज्
- ऐश्वर्यम्aiśvaryam
ऐश्वर्य
√ईश्
- शौर्यम्śauryam
शौर्य
√शूर्
- तेजःtejaḥ
तेज
√तिज्
- बलम्balam
बल
बल
- स्मृतिःsmṛtiḥ
स्मृति
√स्मृ
- स्वातन्त्र्यम्svātantryam
स्वातन्त्र्य
स्व + तन्त्र
- कौशलम्kauśalam
कौशल
कुशल
- कान्तिःkāntiḥ
कान्ति
√कम्
- धैर्यम्dhairyam
धैर्य
√धृ
- मार्दवम्mārdavam
मार्दव
मृदु
- एव चeva ca
भी
व्याख्या
यह श्लोक बारह पूरक गुणों का वर्णन करता है—ज्ञान, वैराग्य, ऐश्वर्य या प्रभुता, शौर्य, तेज, बल, स्मृति, स्वतंत्रता, कौशल, कान्ति, धैर्य और मार्दव। इनकी व्यापकता महत्त्वपूर्ण है। पूर्णता को केवल शक्ति या बुद्धि तक सीमित नहीं किया गया; संयम, स्मृति, सहनशीलता और कोमलता भी बाहरी सामर्थ्य के साथ रखी गई हैं। भागवत पुराण के कथात्मक संदर्भ में ये वर्णित गुण हैं, सीधे नए वर्ष का संकल्प लेने की आज्ञा नहीं। आज इन्हें प्रेरक आदर्श के रूप में अपनाया जा सकता है, बशर्ते आधुनिक अनुप्रयोग को श्लोक के मूल वर्णनात्मक संदर्भ से अलग समझा जाए।
मूल पोस्ट
श्रीमद्भागवत पुराण से और सुभाषित
स्रोत पृष्ठ देखेंअणुभ्यश्च महद्भ्यश्च शास्त्रेभ्यः कुशलो नरः। सर्वतः सारमादद्यात् पुष्पेभ्य इव षट्पदः॥
aṇubhyaśca mahadbhyaśca śāstrebhyaḥ kuśalo naraḥ । sarvataḥ sāramādadyāt puṣpebhya iva ṣaṭpadaḥ ॥
श्रीमद्भागवत पुराण का श्लोक: कुशल व्यक्ति छोटे-बड़े हर शास्त्र से सार ग्रहण करे, जैसे भ्रमर अनेक पुष्पों से मधु लेता है।
एतावज्जन्मसाफल्यं देहिनामिह देहिषु। प्राणैरर्थैर्धिया वाचा श्रेय एवाचरेत् सदा॥
etāvaj janmasāphalyaṁ dehinām iha dehiṣu । prāṇair arthair dhiyā vācā śreya evācaret sadā ॥
श्रीमद्भागवत पुराण का यह श्लोक कहता है कि जन्म तब सार्थक होता है जब मनुष्य प्राण, धन, बुद्धि और वाणी से सदा दूसरों का कल्याण करे।
चरित्र पर और सुभाषित
विषय पृष्ठ देखेंवत्सराजोऽपि तं प्राप्तं प्रदत्तोपायनं नृपम्। प्रीत्या सम्मानयामास शूरा हि प्रणतिप्रियाः॥
vatsarājo 'pi taṃ prāptaṃ pradattopāyanaṃ nṛpam । prītyā sammānayāmāsa śūrā hi praṇatipriyāḥ ॥
भेंट लेकर आए राजा का वत्सराज स्नेह से सम्मान करते हैं। श्लोक वीरों के मन में विनम्र प्रणाम के प्रति आदर बताता है।
भस्मीकृतस्वार्थसौख्यपरिचर्चितविग्रहाः। स्वराज्ययोगनिर्मग्ना धन्यास्ते वीरयोगिनः॥
bhasmīkṛtasvārthasaukhyaparicarcitavigrahāḥ । svarājyayoganirmagnā dhanyās te vīrayoginaḥ ॥
यह श्लोक उन वीर साधकों को धन्य कहता है जो निजी सुख त्यागकर स्वराज्य की साधना में पूरी तरह समर्पित हैं।
ज्ञानवांश्च तथा वाग्मी कर्मस्वपि च निष्ठितः। एवं युक्तोऽपि न श्रेयान् यदि शीलविवर्जितः॥
jñānavāṃśca tathā vāgmī karmasvapi ca niṣṭhitaḥ । evaṃ yukto'pi na śreyān yadi śīlavivarjitaḥ ॥
ज्ञान, वाक्पटुता और कर्मकुशलता होने पर भी सदाचार से रहित व्यक्ति श्रेष्ठ नहीं होता।