एतावज्जन्मसाफल्यं - जन्म की सार्थकता

19 अग॰ 2026

एतावज्जन्मसाफल्यं देहिनामिह देहिषु। प्राणैरर्थैर्धिया वाचा श्रेय एवाचरेत् सदा॥

etāvaj janmasāphalyaṁ dehinām iha dehiṣu । prāṇair arthair dhiyā vācā śreya evācaret sadā ॥

एतावज्जन्मसाफल्यं देहिनामिह देहिषु का अर्थ

इस संसार में मनुष्यों के जन्म की पूर्ण सार्थकता इसी में निहित है कि वे अन्य प्राणियों के प्रति अपने शारीरिक सामर्थ्य, धन-सम्पत्ति, बुद्धि तथा वाणी के माध्यम से सदैव परोपकार एवं कल्याणकारी कर्मों का ही सम्पादन करें।

शब्दार्थ

एतावत्etāvat

इतना ही, मात्र इतना

एतावत्

सन्धि: एतावत् + जन्मसाफल्यम् = एतावज्जन्मसाफल्यम्।

जन्मसाफल्यम्janmasāphalyam

जन्म की सफलता या सार्थकता

जन्मन् + सफल

देहिनाम्dehinām

देहधारी प्राणियों का

देहिन्

सन्धि: देहिनाम् + इह = देहिनामिह।

इहiha

यहाँ, इस लोक में

देहिषुdehiṣu

देहधारी प्राणियों के प्रति

देहिन्

प्राणैःprāṇaiḥ

प्राण से, जीवन-शक्ति से

प्राण

सन्धि: प्राणैः + अर्थैः = प्राणैरर्थैः।

अर्थैःarthaiḥ

धन से

अर्थ

सन्धि: अर्थैः + धिया = अर्थैर्धिया।

धियाdhiyā

बुद्धि से

धी

वाचाvācā

वाणी से

वाच्

श्रेयःśreyaḥ

कल्याण, श्रेयस्

श्रेयस्

सन्धि: श्रेयः + एव = श्रेय एव।

एवeva

ही, केवल

आचरेत्ācaret

आचरण करे

आ + √चर्

सदाsadā

सदा

व्याख्या

यह श्लोक सफल जन्म की पूरी कसौटी देता है। 'एतावत् जन्मसाफल्यम्' कहता है कि जन्म का फल इतना ही है: मनुष्य सदा 'श्रेयस्', अर्थात सच्चा कल्याण, अन्य 'देहिन्' अर्थात् देहधारी प्राणियों के प्रति करे। आगे गिनाए चार साधन—प्राण, अर्थ, धी और वाच्—जीवन की सारी पूँजी समेटते हैं: प्राणशक्ति, धन, बुद्धि और वाणी। 'एव' और 'सदा' नियम को निश्चित करते हैं। यही कल्याण करना चाहिए, और सदा करना चाहिए। कृष्ण ये शब्द उन वृक्षों की ओर संकेत करके कहते हैं जो धूप, वर्षा और वायु सहकर भी छाया और फल देते हैं। मनुष्य का जीवन भी तब सार्थक होता है जब वह अपने लिए रोककर नहीं, इसी तरह दूसरों के हित में लगाया जाए। दिया गया अर्थ इसे परोपकार और कल्याणकारी कर्म की दैनिक नीति बनाता है। यह श्लोक के अनुकूल है, पर संस्कृत कुछ व्यापक भी है: 'देहिनाम्' और 'देहिषु' सब देहधारियों को कहते हैं, और 'प्राणैः' केवल शारीरिक बल नहीं, जीवन स्वयं है।

स्रोत और पाठभेद

मूल पोस्ट

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सुभाषितरत्नभाण्डागारम्

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udyamaḥ sāhasaṃ dhairyaṃ buddhiḥ śaktiḥ parākramaḥ । ṣaḍete yatra vartante tatra daivaṃ sahāyakṛt ॥

उद्यम, साहस, धैर्य, बुद्धि, शक्ति और पराक्रम से युक्त व्यक्ति को दैव का सहयोग भी प्राप्त होता है।

दृढ़तासाहसविद्याशक्ति
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एको धर्मः परं श्रेयः क्षमैका शान्तिरुत्तमा। विद्यैका परमा तृप्तिरहिंसैका सुखावहा॥

eko dharmaḥ paraṁ śreyaḥ kṣamaikā śāntir uttamā । vidyaikā paramā tṛptir ahiṁsaikā sukhāvahā ॥

महाभारत की विदुर नीति का यह श्लोक चार गुणों को उनके फल से जोड़ता है: धर्म परम कल्याण देता है, क्षमा उत्तम शांति, विद्या सच्ची तृप्ति और अहिंसा स्थाई सुख।

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advaidhamanasaṃ yuktaṃ śūraṃ dhīraṃ vipaścitam । na śrīḥ santyajate nityam ādityamiva raśmayaḥ ॥

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