जीवनं स्वं परार्थाय - दूसरों के हित में जीवन

21 अग॰ 2026

जीवनं स्वं परार्थाय नित्यं यच्छत मानवाः। इति सन्देशमाख्यातुं समुद्रं यान्ति निम्नगाः॥

jīvanaṃ svaṃ parārthāya nityaṃ yacchata mānavāḥ । iti sandeśamākhyātuṃ samudraṃ yānti nimnagāḥ ॥

प्रधानमंत्री का संदेश

नदियों का अविरल प्रवाह सिखाता है कि हम किस प्रकार अपने सामर्थ्य का उपयोग मानवता की भलाई के लिए कर सकते हैं। निःस्वार्थ सेवा, समर्पण और परोपकार की यही भावना राष्ट्र को नई दिशा देती है।

जीवनं स्वं परार्थाय नित्यं का अर्थ

हे मनुष्यों! अपना जीवन सदैव दूसरों की सेवा और कल्याण के लिए समर्पित करो। जिस प्रकार नदियाँ बिना किसी स्वार्थ के निरन्तर बहती हुई अपने जल से मार्ग में आने वाले असंख्य प्राणियों का जीवन पोषित करती हैं और अन्ततः समुद्र में विलीन हो जाती हैं, उसी प्रकार मनुष्य को भी अपने जीवन और सामर्थ्य का उपयोग दूसरों के हित में करना चाहिए। निःस्वार्थ सेवा, परोपकार और लोककल्याण में ही मानव-जीवन की वास्तविक सार्थकता है।

शब्दार्थ

जीवनम्jīvanam

जीवन

√जीव

स्वम्svam

अपना

स्व

परार्थायparārthāya

दूसरों के प्रयोजन के लिए

पर + अर्थ

समास परार्थ का चतुर्थी रूप।

नित्यम्nityam

सदा

नित्य

यच्छतyacchata

दो

√यम्

यच्छति का मध्यम पुरुष बहुवचन आज्ञार्थ।

मानवाःmānavāḥ

हे मनुष्यो

मानव

सम्बोधन बहुवचन।

इतिiti

इस प्रकार

सन्देशम्sandeśam

सन्देश

सम् + √दिश्

सन्धि: सन्देशम् + आख्यातुम् = सन्देशमाख्यातुम्।

आख्यातुम्ākhyātum

कहने के लिए

आ + √ख्या

समुद्रम्samudram

समुद्र को

समुद्र

यान्तिyānti

जाती हैं

√या

निम्नगाःnimnagāḥ

नदियाँ

निम्न + √गम्

शाब्दिक अर्थ: नीचे की ओर जाने वाली।

व्याख्या

श्लोक सम्बोधन से खुलता है: मानवाः, हे मनुष्यो। माँग भावना की नहीं, दान की है। जीवनं स्वं परार्थाय नित्यं यच्छत: अपना जीवन सदा दूसरों के प्रयोजन के लिए दो। 'परार्थ' यहाँ कुंजी है। यह ऐसा प्रयोजन है जो दूसरे का है, अपना संग्रह नहीं। 'नित्यम्' इस दान को एक बार की दया नहीं रहने देता। दूसरी पंक्ति फिर शिक्षक दिखाती है। इति सन्देशमाख्यातुं समुद्रं यान्ति निम्नगाः: यही सन्देश कहने के लिए नदियाँ समुद्र की ओर जाती हैं। 'निम्नगा' नदी का पुराना नाम है, नीचे की ओर जाने वाली। श्लोक नदियों को दृश्य नहीं बनाता। वह उनकी पूरी धारा को एक सार्वजनिक शिक्षा बना देता है। वे अपना जल रोकती नहीं। उसे समुद्र तक ले जाती हैं, और यही ले जाना सन्देश है। पोस्ट इसी चित्र को वर्तमान में पढ़ता है। नदियों का अविरल प्रवाह, उसमें कहा गया है, सिखाता है कि हम अपना सामर्थ्य मानवता की भलाई में कैसे लगाएँ, और निःस्वार्थ सेवा, समर्पण और परोपकार की यही भावना राष्ट्र को नई दिशा देती है। उद्धृत संस्कृत में राष्ट्र नहीं है। उसमें मनुष्य, सन्देश, नदियाँ और समुद्र हैं। आधुनिक पाठ ठीक है, पर वह अनुप्रयोग है। दिए गए अर्थ में यह भी जुड़ता है कि नदियाँ असंख्य प्राणियों का जीवन पोषित कर अन्त में समुद्र में विलीन हो जाती हैं। नदी के कार्य का यह स्वाभाविक विस्तार है, पर दूसरी पंक्ति केवल इतना कहती है कि वे सन्देश कहने को समुद्र जाती हैं। शिक्षा स्वयं निश्चित रहती है: अपना जीवन दूसरों के लिए दो, और सदा दो। इस श्लोक का मूल रचयिता और ग्रन्थ-स्रोत अभी अज्ञात है।

मूल पोस्ट

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