अभयस्यैव यो दाता तस्यैव सुमहत्फलम् । न हि प्राणसमं दानं त्रिषु लोकेषु विद्यते ॥
abhayasyaiva yo dātā tasyaiva sumahatphalam । na hi prāṇasamaṃ dānaṃ triṣu lokeṣu vidyate ॥
अभयस्यैव यो दाता तस्यैव का अर्थ
जो व्यक्ति लोगों के भय को दूर करता है, वह विशेष पुण्य प्राप्त करता है, तीनों लोकों में जीवन की रक्षा से बढ़कर कोई मूल्यवान उपहार नहीं है।
शब्दार्थ
- अभयस्य एवabhayasyaiva
अभय का ही, भय से मुक्ति का ही
अभय + एव
सन्धि: अभयस्य + एव = अभयस्यैव।
- यःyaḥ
जो व्यक्ति
यद्
- दाताdātā
देने वाला
दातृ; √दा
- तस्य एवtasyaiva
उसी व्यक्ति के लिए
तद् + एव
सन्धि: तस्य + एव = तस्यैव।
- सुमहत् फलम्sumahat phalam
अत्यन्त महान फल या पुण्य
सु + महत्; फल
- न हिna hi
क्योंकि निश्चय ही नहीं
- प्राणसमम्prāṇasamam
प्राण के समान
प्राण + सम
- दानम्dānam
दान, उपहार
√दा
- त्रिषु लोकेषुtriṣu lokeṣu
तीनों लोकों में
त्रि; लोक
- विद्यतेvidyate
विद्यमान है, पाया जाता है
√विद्
व्याख्या
यह श्लोक ‘अभय’, अर्थात् भय से मुक्ति, को मनुष्य द्वारा दूसरे को दिए जा सकने वाले सर्वोच्च उपहारों में रखता है। इसका मुख्य पात्र ‘दाता’ है, किन्तु यहाँ दान केवल कोई वस्तु नहीं, बल्कि ऐसी स्थिति है जिसमें दूसरे प्राणी को अपने जीवन या सुरक्षा के लिए भयभीत न होना पड़े। ‘एव’ का बल अभय देने के कर्म को ‘सुमहत् फलम्’, अत्यन्त महान फल, से जोड़ता है। दूसरी पंक्ति तीनों लोकों का उल्लेख करके कारण बताती है: प्राण के समान कोई दान विद्यमान नहीं है। इस प्रकार दोनों पंक्तियाँ रक्षा को दान का एक नैतिक रूप बताती हैं, जिसका महत्त्व दूसरे के सबसे मूल हित—जीवन—को सुरक्षित रखने में है। दिया गया अर्थ इस शिक्षा को लोगों का भय दूर करने और जीवन बचाने के रूप में व्यक्त करता है। यह ‘अभय’ और ‘प्राण’ के संयुक्त भाव का स्वाभाविक आधुनिक अनुप्रयोग है, यद्यपि संस्कृत में शाब्दिक रूप से अभय देने और प्राण के समान दान की बात कही गई है। श्लोक सेवा पर एक व्यापक किन्तु गम्भीर विचार प्रस्तुत करता है: भौतिक सहायता महत्त्वपूर्ण है, पर संकटग्रस्त व्यक्ति के लिए सुरक्षा उत्पन्न करना उससे भी अधिक मूलभूत हो सकता है। यहाँ प्रशंसा दूसरों पर शक्ति दिखाने की नहीं, बल्कि अपनी सामर्थ्य का ऐसा उपयोग करने की है जिससे दूसरा निर्भय होकर जी सके।
मूल पोस्ट
महाभारत से और सुभाषित
स्रोत पृष्ठ देखेंअद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च। निर्ममो निरहङ्कारः समदुःखसुखः क्षमी॥
adveṣṭā sarvabhūtānāṃ maitraḥ karuṇa eva ca । nirmamo nirahaṅkāraḥ samaduḥkhasukhaḥ kṣamī ॥
भगवद् गीता द्वेष और अहंकार से मुक्त, सभी प्राणियों के प्रति मैत्री रखने वाले और सुख-दुःख में सम रहने वाले व्यक्ति के गुण बताती है।
स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः संसिद्धिं लभते नरः। स्वकर्मनिरतः सिद्धिं यथा विन्दति तच्छृणु॥
sve sve karmaṇyabhirataḥ saṁsiddhiṁ labhate naraḥ । svakarmanirataḥ siddhiṁ yathā vindati tacchṛṇu ॥
भगवद् गीता बताती है कि अपने कर्म में निष्ठा मनुष्य को सिद्धि की ओर ले जाती है।
उद्यमः साहसं धैर्यं बुद्धिः शक्तिः पराक्रमः। षडेते यत्र वर्तन्ते तत्र दैवं सहायकृत्॥
udyamaḥ sāhasaṃ dhairyaṃ buddhiḥ śaktiḥ parākramaḥ । ṣaḍete yatra vartante tatra daivaṃ sahāyakṛt ॥
उद्यम, साहस, धैर्य, बुद्धि, शक्ति और पराक्रम से युक्त व्यक्ति को दैव का सहयोग भी प्राप्त होता है।
नैतिकता पर और सुभाषित
विषय पृष्ठ देखेंअनुद्वेगकरं वाक्यं सत्यं प्रियहितं च यत्। स्वाध्यायाभ्यसनं चैव वाङ्मयं तप उच्यते॥
anudvegakaraṁ vākyaṁ satyaṁ priyahitaṁ ca yat । svādhyāyābhyasanaṁ caiva vāṅmayaṁ tapa ucyate ॥
भगवद् गीता सत्य, प्रिय, हितकारी और उद्वेगरहित वाणी तथा नियमित स्वाध्याय को वाणी का तप कहती है।
स्वाधीनैव समृद्धिर्जनोपजीव्यत्वमुच्छ्रयश्छाया। सत्पुंसो मरुभूरिव जीवनमात्रं समाशास्यम्॥
svādhīnaiva samṛddhir janopajīvyatvam ucchrayaś chāyā । satpuṃso marubhūr iva jīvanamātraṁ samāśāsyam ॥
मरुभूमि में खड़े वृक्ष की तरह सत्पुरुष के लिए स्वाधीन समृद्धि, दूसरों का आधार, ऊँचाई और छाया सहज हैं, इसलिए उसका जीवित रहना ही कामना के योग्य है।
सद्भिरेव सहासीत सद्भिः कुर्वीत सङ्गतिम्। सद्भिर्विवादं मैत्रीं च नासद्भिः किञ्चिदाचरेत्॥
sadbhir eva sahāsīta sadbhiḥ kurvīta saṅgatim । sadbhir vivādaṃ maitrīṃ ca nāsadbhiḥ kiṃcid ācaret ॥
गरुड पुराण का यह श्लोक सज्जनों के साथ रहने, संवाद करने और मैत्री रखने की सीख देता है।