यस्य कृत्यं न जानन्ति - मौन कर्म की बुद्धिमत्ता

1 सित॰ 2026

यस्य कृत्यं न जानन्ति मन्त्रं वा मन्त्रितं परे। कृतमेवास्य जानन्ति स वै पण्डित उच्यते॥

yasya kṛtyaṃ na jānanti mantraṃ vā mantritaṃ pare । kṛtam evāsya jānanti sa vai paṇḍita ucyate ॥

यस्य कृत्यं न जानन्ति का अर्थ

जिस व्यक्ति के कार्यों, योजनाओं, गोपनीय विचारों और रणनीतियों का ज्ञान दूसरों को तब तक नहीं होता, जब तक कि वे सफलतापूर्वक पूर्ण न हो जाएँ, ऐसे संयमी, विवेकी और गंभीर व्यक्ति को ही वास्तव में बुद्धिमान कहा जाता है।

शब्दार्थ

यस्यyasya

जिसका, जिस व्यक्ति का

यद्

कृत्यम्kṛtyam

करने योग्य कार्य, भावी कर्म

√कृ

नna

नहीं

जानन्तिjānanti

वे जानते हैं

√ज्ञा

मन्त्रम्mantram

मन्त्रणा, परामर्श या योजना

मन्त्र

वाvā

अथवा

मन्त्रितम्mantritam

जिस पर विचार या मन्त्रणा की गई हो

√मन्त्र्

परेpare

दूसरे लोग

पर

कृतम् एव अस्यkṛtam evāsya

केवल उसके द्वारा पूरा किया हुआ कार्य

√कृ + एव + इदम्

सन्धि: कृतम् + एव + अस्य = कृतमेवास्य।

जानन्तिjānanti

वे जानते हैं

√ज्ञा

सः वैsa vai

वही व्यक्ति निश्चय ही

तद् + वै

वै से पहले सः का रूप स हो गया है।

पण्डितःpaṇḍitaḥ

बुद्धिमान व्यक्ति

पण्डित

उच्यतेucyate

कहा जाता है

√वच्

व्याख्या

यह श्लोक मन्त्रणा और पूर्ण कर्म के सम्बन्ध से बुद्धिमत्ता की पहचान कराता है। ‘कृत्य’ उस कार्य को कहता है जो किया जाना है, जबकि ‘मन्त्र’ और ‘मन्त्रित’ यहाँ परामर्श, विचार-विमर्श अथवा सोची गई योजना के अर्थ में हैं। दूसरे लोग न तो भावी कार्य को जानते हैं और न उसके पीछे हुई मन्त्रणा को; वे केवल ‘कृतम्’, अर्थात् सम्पन्न हो चुके कर्म को जान पाते हैं। ‘जानन्ति’ की पुनरावृत्ति इस अन्तर को स्पष्ट करती है: समय से पहले योजना प्रकट नहीं होती, पर पूरा हुआ कार्य स्वयं उसका परिचय बन जाता है। ऐसे व्यक्ति को ‘पण्डित’ इसलिए कहा गया है कि वह विचार और क्रियान्वयन को संयमपूर्वक एक साथ साधता है। इस शिक्षा का आशय अपने-आप में गोपनीयता की प्रशंसा करना या अनुचित कर्म छिपाना नहीं है। इसका शाब्दिक बल अधिक सीमित है: सुचिन्तित योजना को कार्यरूप लेने से पहले अनावश्यक रूप से उजागर न किया जाए। आज के जीवन में इसका अर्थ किसी योजना को दिखावे, विकर्षण या अनावश्यक हस्तक्षेप से बचाना हो सकता है, साथ ही पूर्ण कर्म के प्रति उत्तरदायी बने रहना भी आवश्यक है। दिया गया अर्थ इस व्यवहार से संयम और विवेक का स्वाभाविक निष्कर्ष निकालता है, जबकि संस्कृत में मुख्य बल मौन मन्त्रणा, सम्पन्न कर्म और बुद्धिमत्ता की पहचान पर है।

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विदुर नीति से और सुभाषित

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2 अक्टू॰ 2026
भगवद् गीता

अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च। निर्ममो निरहङ्कारः समदुःखसुखः क्षमी॥

adveṣṭā sarvabhūtānāṃ maitraḥ karuṇa eva ca । nirmamo nirahaṅkāraḥ samaduḥkhasukhaḥ kṣamī ॥

भगवद् गीता द्वेष और अहंकार से मुक्त, सभी प्राणियों के प्रति मैत्री रखने वाले और सुख-दुःख में सम रहने वाले व्यक्ति के गुण बताती है।

चरित्रविनम्रतासामंजस्य
30 सित॰ 2026
भगवद् गीता

स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः संसिद्धिं लभते नरः। स्वकर्मनिरतः सिद्धिं यथा विन्दति तच्छृणु॥

sve sve karmaṇyabhirataḥ saṁsiddhiṁ labhate naraḥ । svakarmanirataḥ siddhiṁ yathā vindati tacchṛṇu ॥

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उद्यमः साहसं धैर्यं बुद्धिः शक्तिः पराक्रमः। षडेते यत्र वर्तन्ते तत्र दैवं सहायकृत्॥

udyamaḥ sāhasaṃ dhairyaṃ buddhiḥ śaktiḥ parākramaḥ । ṣaḍete yatra vartante tatra daivaṃ sahāyakṛt ॥

उद्यम, साहस, धैर्य, बुद्धि, शक्ति और पराक्रम से युक्त व्यक्ति को दैव का सहयोग भी प्राप्त होता है।

दृढ़तासाहसविद्याशक्ति

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30 सित॰ 2026
भगवद् गीता

स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः संसिद्धिं लभते नरः। स्वकर्मनिरतः सिद्धिं यथा विन्दति तच्छृणु॥

sve sve karmaṇyabhirataḥ saṁsiddhiṁ labhate naraḥ । svakarmanirataḥ siddhiṁ yathā vindati tacchṛṇu ॥

भगवद् गीता बताती है कि अपने कर्म में निष्ठा मनुष्य को सिद्धि की ओर ले जाती है।

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श्रीमद्भागवत पुराण

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