यद् यदेव प्रसक्तं हि वितर्कयति मानवः। अभ्यासात् तेन तेनास्य नतिर्भवति चेतसः॥
yad yad eva prasaktaṃ hi vitarkayati mānavaḥ । abhyāsāt tena tenāsya natir bhavati cetasaḥ ॥
यद् यदेव प्रसक्तं हि का अर्थ
मनुष्य जिस विषय या वस्तु के बारे में बार-बार सोचता है, उसका मन धीरे-धीरे उसी ओर आकर्षित होने लगता है। इसलिए हमें हमेशा अच्छे, शुभ और कल्याणकारी विचारों का ही चिन्तन करना चाहिए।
शब्दार्थ
- यद्यदेवyad yad eva
जो कुछ भी
यद् + यद् + एव
- प्रसक्तम्prasaktam
जिसमें निरन्तर लगा या आसक्त हो
प्र + √सञ्ज्
- हिhi
निश्चय ही
- वितर्कयतिvitarkayati
विचार करता है, मन में बार-बार सोचता है
वि + √तर्क्
- मानवःmānavaḥ
मनुष्य
मानव
- अभ्यासात्abhyāsāt
अभ्यास से, पुनरावृत्ति के कारण
अभ्यास
- तेन तेनtena tena
उसी-उसी विषय की ओर
तद्
- अस्यasya
उस मनुष्य के
इदम्
- नतिःnatiḥ
झुकाव, प्रवृत्ति
√नम्
- भवतिbhavati
हो जाती है
√भू
- चेतसःcetasaḥ
चित्त की
चेतस्
व्याख्या
यह श्लोक बार-बार किए जाने वाले चिन्तन और चित्त की प्रवृत्ति के बीच सीधा सम्बन्ध बताता है। ‘यद्यदेव’ से सिद्धान्त को व्यापक रूप मिलता है—मनुष्य जिस किसी विषय को लगातार मन में दोहराता है, वह उसके लिए संस्कारकारी बन जाता है। ‘वितर्कयति’ किसी बात पर विचार करते रहने या उसे मन में विस्तार देने का संकेत करता है, जबकि ‘अभ्यासात्’ निरन्तर पुनरावृत्ति पर बल देता है। इसका परिणाम ‘नतिर्भवति चेतसः’ में कहा गया है: चित्त का झुकाव उसी दिशा में बनने लगता है। श्लोक का शाब्दिक आशय यह नहीं कि एक क्षणिक विचार ही मनुष्य को निर्धारित कर देता है, बल्कि यह कि बार-बार दोहराया गया चिन्तन मन की आदत बनता है। जिस विचार-पद्धति का अभ्यास होता है, वही धीरे-धीरे अधिक प्रभावशाली होकर मानसिक चरित्र को आकार देती है। इस दृष्टि से यह शिक्षा अपने दैनिक विचारों को सजगता से देखने और यह पहचानने का आग्रह करती है कि हम पुनरावृत्ति द्वारा किन प्रवृत्तियों को मजबूत कर रहे हैं।
स्रोत और पाठभेद
मूल पोस्ट
अनुशासन पर और सुभाषित
विषय पृष्ठ देखेंअद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च। निर्ममो निरहङ्कारः समदुःखसुखः क्षमी॥
adveṣṭā sarvabhūtānāṃ maitraḥ karuṇa eva ca । nirmamo nirahaṅkāraḥ samaduḥkhasukhaḥ kṣamī ॥
भगवद् गीता द्वेष और अहंकार से मुक्त, सभी प्राणियों के प्रति मैत्री रखने वाले और सुख-दुःख में सम रहने वाले व्यक्ति के गुण बताती है।
अनुद्वेगकरं वाक्यं सत्यं प्रियहितं च यत्। स्वाध्यायाभ्यसनं चैव वाङ्मयं तप उच्यते॥
anudvegakaraṁ vākyaṁ satyaṁ priyahitaṁ ca yat । svādhyāyābhyasanaṁ caiva vāṅmayaṁ tapa ucyate ॥
भगवद् गीता सत्य, प्रिय, हितकारी और उद्वेगरहित वाणी तथा नियमित स्वाध्याय को वाणी का तप कहती है।
स्वाधीनैव समृद्धिर्जनोपजीव्यत्वमुच्छ्रयश्छाया। सत्पुंसो मरुभूरिव जीवनमात्रं समाशास्यम्॥
svādhīnaiva samṛddhir janopajīvyatvam ucchrayaś chāyā । satpuṃso marubhūr iva jīvanamātraṁ samāśāsyam ॥
मरुभूमि में खड़े वृक्ष की तरह सत्पुरुष के लिए स्वाधीन समृद्धि, दूसरों का आधार, ऊँचाई और छाया सहज हैं, इसलिए उसका जीवित रहना ही कामना के योग्य है।