यद्यदेव प्रसक्तं - अभ्यास से मन की दिशा

31 अग॰ 2026

यद् यदेव प्रसक्तं हि वितर्कयति मानवः। अभ्यासात् तेन तेनास्य नतिर्भवति चेतसः॥

yad yad eva prasaktaṃ hi vitarkayati mānavaḥ । abhyāsāt tena tenāsya natir bhavati cetasaḥ ॥

यद् यदेव प्रसक्तं हि का अर्थ

मनुष्य जिस विषय या वस्तु के बारे में बार-बार सोचता है, उसका मन धीरे-धीरे उसी ओर आकर्षित होने लगता है। इसलिए हमें हमेशा अच्छे, शुभ और कल्याणकारी विचारों का ही चिन्तन करना चाहिए।

शब्दार्थ

यद्यदेवyad yad eva

जो कुछ भी

यद् + यद् + एव

प्रसक्तम्prasaktam

जिसमें निरन्तर लगा या आसक्त हो

प्र + √सञ्ज्

हिhi

निश्चय ही

वितर्कयतिvitarkayati

विचार करता है, मन में बार-बार सोचता है

वि + √तर्क्

मानवःmānavaḥ

मनुष्य

मानव

अभ्यासात्abhyāsāt

अभ्यास से, पुनरावृत्ति के कारण

अभ्यास

तेन तेनtena tena

उसी-उसी विषय की ओर

तद्

अस्यasya

उस मनुष्य के

इदम्

नतिःnatiḥ

झुकाव, प्रवृत्ति

√नम्

भवतिbhavati

हो जाती है

√भू

चेतसःcetasaḥ

चित्त की

चेतस्

व्याख्या

यह श्लोक बार-बार किए जाने वाले चिन्तन और चित्त की प्रवृत्ति के बीच सीधा सम्बन्ध बताता है। ‘यद्यदेव’ से सिद्धान्त को व्यापक रूप मिलता है—मनुष्य जिस किसी विषय को लगातार मन में दोहराता है, वह उसके लिए संस्कारकारी बन जाता है। ‘वितर्कयति’ किसी बात पर विचार करते रहने या उसे मन में विस्तार देने का संकेत करता है, जबकि ‘अभ्यासात्’ निरन्तर पुनरावृत्ति पर बल देता है। इसका परिणाम ‘नतिर्भवति चेतसः’ में कहा गया है: चित्त का झुकाव उसी दिशा में बनने लगता है। श्लोक का शाब्दिक आशय यह नहीं कि एक क्षणिक विचार ही मनुष्य को निर्धारित कर देता है, बल्कि यह कि बार-बार दोहराया गया चिन्तन मन की आदत बनता है। जिस विचार-पद्धति का अभ्यास होता है, वही धीरे-धीरे अधिक प्रभावशाली होकर मानसिक चरित्र को आकार देती है। इस दृष्टि से यह शिक्षा अपने दैनिक विचारों को सजगता से देखने और यह पहचानने का आग्रह करती है कि हम पुनरावृत्ति द्वारा किन प्रवृत्तियों को मजबूत कर रहे हैं।

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2 अक्टू॰ 2026
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adveṣṭā sarvabhūtānāṃ maitraḥ karuṇa eva ca । nirmamo nirahaṅkāraḥ samaduḥkhasukhaḥ kṣamī ॥

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भगवद् गीता

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