सहसा विदधीत न क्रियामविवेकः परमापदां पदम्। वृणते हि विमृश्यकारिणं गुणलुब्धाः स्वयमेव सम्पदः॥
sahasā vidadhīta na kriyām avivekaḥ paramāpadāṃ padam । vṛṇate hi vimṛśyakāriṇaṃ guṇalubdhāḥ svayameva sampadaḥ ॥
प्रधानमंत्री का संदेशधैर्य, विवेक और दूरदर्शिता से किए गए कार्यों से ही सुख-समृद्धि के द्वार खुलते हैं। इसलिए हर निर्णय में पूरी समझदारी जरूरी है, क्योंकि सोच-समझकर उठाया गया कदम ही सफलता का आधार बनता है।
सहसा विदधीत न क्रियामविवेकः का अर्थ
किसी भी कार्य को बिना सोचे-समझे नहीं करना चाहिए, क्योंकि बिना विचार किए काम को करना, बड़ी विपत्तियों का कारण होता है। इसके विपरीत, जो व्यक्ति अच्छी तरह सोच-विचार कर काम करता है, गुणों की सफलता और लक्ष्मी स्वयं ढूंढते हुए उसका चुनाव करती हैं।
शब्दार्थ
- सहसाsahasā
सहसा
सहस्
- विदधीत नvidadhīta na
न करे
वि + √धा
- क्रियाम्kriyām
क्रिया
√कृ
- अविवेकःavivekaḥ
अविवेक
अ + वि + √विच्
- परम आपदाम्parama āpadām
परम आपत्तियों का
परम + आपद्
- पदम्padam
स्थान है
पद
- वृणतेvṛṇate
वरण करती हैं
√वृ
- हिhi
निश्चय ही
- विमृश्यकारिणम्vimṛśyakāriṇam
विचारपूर्वक कर्म करने वाले को
वि + √मृश् + √कृ
- गुणलुब्धाःguṇalubdhāḥ
गुणों की लोभी
गुण + √लुभ्
- स्वयम् एवsvayam eva
स्वयं ही
- सम्पदःsampadaḥ
सम्पत्तियाँ
सम् + √पद्
व्याख्या
भारवि के किरातार्जुनीयम् का यह श्लोक 'सहसा' अर्थात् जल्दबाज़ी में किए गए काम और 'विमृश्यकारिणम्' अर्थात् विचारपूर्वक कार्य करने वाले व्यक्ति के बीच स्पष्ट भेद करता है। यहाँ 'अविवेक' को साधारण भूल नहीं, बल्कि बड़ी विपत्तियों का द्वार बताया गया है। श्लोक का दूसरा भाग सकारात्मक शिक्षा देता है कि गुण, सफलता और समृद्धि उसी व्यक्ति की ओर आकर्षित होते हैं, जिसके निर्णय विचार, संयम और सद्बुद्धि से निर्देशित होते हैं। प्रधानमंत्री के संदेश के संदर्भ में यह श्लोक याद दिलाता है कि निर्णायक होना और उतावला होना एक ही बात नहीं है। धैर्य, विवेक और दूरदर्शिता हर निर्णय को गहराई और स्थिरता देते हैं, चाहे वह व्यक्तिगत जीवन का निर्णय हो या समाज और राष्ट्र से जुड़ा हुआ। इस दृष्टि से सोच-समझकर किया गया कर्म कमजोरी नहीं, बल्कि स्थायी सफलता का अनुशासित आधार है।
स्रोत और पाठभेद
मूल पोस्ट
किरातार्जुनीयम् से और सुभाषित
स्रोत पृष्ठ देखेंशुचित्वं त्यागिता शौर्यं सामान्यं सुखदुःखयोः। दाक्षिण्यं चानुरक्तिश्च सत्यता च सुहृद्गुणाः॥
śucitvaṃ tyāgitā śauryaṃ sāmānyaṃ sukhaduḥkhayoḥ । dākṣiṇyaṃ cānuraktiśca satyatā ca suhṛdguṇāḥ ॥
निर्मलता, त्याग, साहस, सुख-दुःख में समान भाव, शिष्टता, अनुराग और सत्यता सच्चे मित्र के गुण हैं।
उद्यमः साहसं धैर्यं बुद्धिः शक्तिः पराक्रमः। षडेते यत्र वर्तन्ते तत्र दैवं सहायकृत्॥
udyamaḥ sāhasaṃ dhairyaṃ buddhiḥ śaktiḥ parākramaḥ । ṣaḍete yatra vartante tatra daivaṃ sahāyakṛt ॥
उद्यम, साहस, धैर्य, बुद्धि, शक्ति और पराक्रम से युक्त व्यक्ति को दैव का सहयोग भी प्राप्त होता है।
स्वाधीनैव समृद्धिर्जनोपजीव्यत्वमुच्छ्रयश्छाया। सत्पुंसो मरुभूरिव जीवनमात्रं समाशास्यम्॥
svādhīnaiva samṛddhir janopajīvyatvam ucchrayaś chāyā । satpuṃso marubhūr iva jīvanamātraṁ samāśāsyam ॥
मरुभूमि में खड़े वृक्ष की तरह सत्पुरुष के लिए स्वाधीन समृद्धि, दूसरों का आधार, ऊँचाई और छाया सहज हैं, इसलिए उसका जीवित रहना ही कामना के योग्य है।
ज्ञान पर और सुभाषित
विषय पृष्ठ देखेंनित्यं परिचरेच्चैव तद्वै सुकृतमुत्तमम्। कीर्तिं पुण्यं यशो लोकान् प्राप्स्यसे राजसत्तम॥
nityaṃ paricareccaiva tadvai sukṛtamuttamam । kīrtiṃ puṇyaṃ yaśo lokān prāpsyase rājasattama ॥
नित्य सेवा को श्रेष्ठ पुण्य कर्म बताया गया है, जिससे कीर्ति, यश और उत्तम लोकों की प्राप्ति होती है।
ज्ञानवांश्च तथा वाग्मी कर्मस्वपि च निष्ठितः। एवं युक्तोऽपि न श्रेयान् यदि शीलविवर्जितः॥
jñānavāṃśca tathā vāgmī karmasvapi ca niṣṭhitaḥ । evaṃ yukto'pi na śreyān yadi śīlavivarjitaḥ ॥
ज्ञान, वाक्पटुता और कर्मकुशलता होने पर भी सदाचार से रहित व्यक्ति श्रेष्ठ नहीं होता।
शुचित्वं त्यागिता शौर्यं सामान्यं सुखदुःखयोः। दाक्षिण्यं चानुरक्तिश्च सत्यता च सुहृद्गुणाः॥
śucitvaṃ tyāgitā śauryaṃ sāmānyaṃ sukhaduḥkhayoḥ । dākṣiṇyaṃ cānuraktiśca satyatā ca suhṛdguṇāḥ ॥
निर्मलता, त्याग, साहस, सुख-दुःख में समान भाव, शिष्टता, अनुराग और सत्यता सच्चे मित्र के गुण हैं।